साक्ष्यों में सुधार और विरोधाभासी बयानों के कारण पीड़िता ‘स्टर्लिंग विटनेस’ नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म मामले में आरोपियों को किया बरी

दिल्ली हाईकोर्ट ने मनोज (A1) और मुकेश (A3) नामक दो व्यक्तियों की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया है, जिन पर लगभग एक वर्ष तक एक महिला को बंधक बनाने और उसके साथ बार-बार दुष्कर्म करने का आरोप था। हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता (PW3) की गवाही में समय-समय पर महत्वपूर्ण सुधार (Material Improvements) किए गए और बयानों में भारी विसंगतियां थीं, जिसके कारण उसे ‘स्टर्लिंग विटनेस’ (अति विश्वसनीय गवाह) नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की एकल पीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 374(2) के तहत दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के अपराध को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष का मामला 12 जून 2012 को दर्ज किए गए प्रथम सूचना विवरण (FIS) पर आधारित था। आरोप था कि अपीलकर्ताओं ने बबीता (A2) और एक ऑटो चालक जाकिर (A4) के साथ मिलकर पीड़िता को गोविंद पुरी, नई दिल्ली के एक घर में बंधक बनाकर रखा था।

शुरुआती शिकायत के अनुसार, पीड़िता को उसकी रिहाई से सात दिन पहले उस घर में ले जाया गया था। हालांकि, मुकदमे के दौरान पीड़िता ने अपने बयान बदल दिए और दावा किया कि उसे पूरे एक साल तक बंधक बनाकर रखा गया और कई लोगों ने उसके साथ दुष्कर्म और शारीरिक शोषण किया। निचली अदालत ने 20 दिसंबर 2016 को मनोज को धारा 376(2)(g) सहित अन्य धाराओं में 11 साल और मुकेश को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

पक्षों की दलीलें

मनोज (A1) के वकील ने तर्क दिया कि पीड़िता की गवाही विरोधाभासी थी और हर स्तर पर उसमें सुधार किए गए थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कथित बंधक अवधि के दौरान पीड़िता के पास मदद मांगने या भागने के कई अवसर थे, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

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मुकेश (A3) के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल का नाम न तो FIS में था और न ही मेडिकल रिपोर्ट (MLC) में। मुकदमे के दौरान पहली बार उस पर इंजेक्शन लगाने और दुष्कर्म के लिए पुरुषों को बुलाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए, जो स्पष्ट रूप से गवाही में सुधार की श्रेणी में आते हैं।

राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने तर्क दिया कि भले ही पीड़िता ‘स्टर्लिंग विटनेस’ न हो, लेकिन उसकी बात की पुष्टि स्वतंत्र गवाहों (PW12 और PW14) ने की है, जिन्होंने उसे बाथरूम की खिड़की से मदद मांगते देखा था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने राय संदीप बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली), (2012) 8 SCC 21 के कानूनी मानक का हवाला देते हुए इस बात पर विचार किया कि क्या पीड़िता को ‘स्टर्लिंग विटनेस’ माना जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल एक गवाह की गवाही पर दोषसिद्धि के लिए बयान का स्वाभाविक और सुसंगत होना अनिवार्य है।

न्यायमूर्ति सुधा ने अपराध की अवधि में आए भारी बदलाव पर गौर किया:

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“FIS में पीड़िता ने आरोप लगाया कि घटना उसकी रिहाई से सात दिन पहले हुई थी। हालांकि, कोर्ट में गवाही के दौरान उसने बयान बदल दिया और कहा कि उसे लगभग एक साल तक बंधक बनाकर रखा गया था। इस तरह के बड़े बदलाव को मामूली विसंगति नहीं माना जा सकता।”

मुकेश (A3) के खिलाफ आरोपों पर हाईकोर्ट ने कहा:

“A3 का नाम मेडिकल हिस्ट्री में नहीं है… FIS में भी पीड़िता ने उसकी कोई स्पष्ट भूमिका नहीं बताई थी। लेकिन कोर्ट में उसने आरोप लगाया कि मुकेश उसे इंजेक्शन देता था और लड़कों का इंतजाम करता था। ये आरोप पहली बार कोर्ट में सामने आए और ये साक्ष्यों में किए गए सुधार हैं।”

हाईकोर्ट ने एक साल तक बंधक रहने के दावे को अविश्वसनीय पाया, क्योंकि इस दौरान पीड़िता ने एक बच्चे को जन्म दिया था और उसे डॉक्टर के पास भी ले जाया गया था:

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“उसने स्वीकार किया कि उसे कई बार बाहर और डॉक्टर के पास ले जाया गया था। यह विश्वास करना कठिन है कि प्रसव के समय या बाहर जाने के दौरान वह किसी को अपनी स्थिति नहीं बता सकी और उसके लिए भागना या शोर मचाना असंभव था।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष विरोधाभासी बयानों के कारण पैदा हुए संदेह को दूर करने में विफल रहा। हालांकि स्वतंत्र गवाहों ने पीड़िता को रेस्क्यू किए जाने की पुष्टि की, लेकिन उनके बयान लंबे समय तक बंधक बनाने या बार-बार दुष्कर्म के विशिष्ट आरोपों की पुष्टि नहीं करते।

कोर्ट ने निर्णय सुनाया:

“अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के अपराध को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है, इसलिए वे संदेह के लाभ (Benefit of Doubt) के हकदार हैं। अपीलों को स्वीकार किया जाता है और दोषसिद्धि के फैसले को रद्द करते हुए A1 और A3 को बरी किया जाता है।”

  • केस का शीर्षक: मनोज बनाम राज्य (CRL.A. 352/2017) और मुकेश बनाम राज्य एनसीटी दिल्ली (CRL.A. 887/2017)

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