दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: अन्य राज्यों के सेवानिवृत्त न्यायाधीश दिल्ली में ‘सीनियर एडवोकेट’ पदवी नहीं मांग सकते

देशभर के सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे एक फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने “सीनियर एडवोकेट” की पदवी से संबंधित “दिल्ली हाईकोर्ट सीनियर एडवोकेट नामांकन नियम, 2024” के नियम 9बी की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। यह नियम विशेष रूप से दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा (DHJS) से सेवानिवृत्त अधिकारियों को ही इस पदवी के लिए आवेदन करने की अनुमति देता है।

यह फैसला मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ द्वारा 27 मार्च 2025 को W.P.(C) 2045/2025 – श्री विजय प्रताप सिंह बनाम दिल्ली हाईकोर्ट में सुनाया गया।

मामले की पृष्ठभूमि: एक सेवानिवृत्त जज की मान्यता की याचिका

याचिकाकर्ता श्री विजय प्रताप सिंह, उत्तर प्रदेश उच्च न्यायिक सेवा से सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी हैं। उन्होंने NCLT के न्यायिक सदस्य और NCLAT के तकनीकी सदस्य के रूप में भी सेवा दी है। याचिकाकर्ता ने नियम 9बी को मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 का उल्लंघन करार देते हुए चुनौती दी।

अपनी याचिका में, उन्होंने अधिवक्ता श्री उत्कर्ष कांडपाल और श्री भानु गुप्ता के साथ स्वयं पेश होकर यह तर्क दिया कि:

  • नियम 9बी केवल DHJS से सेवानिवृत्त अधिकारियों को आवेदन का विशेषाधिकार देकर अविवेकपूर्ण वर्गीकरण करता है।
  • उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नियमित वकालत की है।
  • NCLT और NCLAT में उनका कार्य, जो दिल्ली हाईकोर्ट की लेखपाल अधिकारिता (Articles 226 और 227) के अधीन आता है, उसे भी समान माना जाना चाहिए।
  • देश के किसी अन्य उच्च न्यायालय में ऐसा क्षेत्राधिकार आधारित प्रतिबंध नहीं है।
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उन्होंने मेनका गांधी बनाम भारत सरकार और तन्वी बेहल बनाम श्रेय गोयल जैसे मामलों पर भरोसा करते हुए तर्क दिया कि भौगोलिक आधार पर पेशेवर अधिकारों में भेदभाव असंवैधानिक है।

प्रतिकर्ता का पक्ष: नियम 9बी के पीछे प्रशासनिक तर्क

डॉ. अमित जॉर्ज, अर्कनेल भौमिक, अधिश्वर सूरी, सुपर्णा जैन, दुष्यंत किशन कौल, इबानसारा सियेमलियाह, रूपम झा और मेधावी भाटिया द्वारा प्रतिनिधित्व कर रहे दिल्ली हाईकोर्ट ने नियम 9बी का समर्थन किया।

उनका तर्क था:

  • DHJS अधिकारियों के ACRs/APARs और सेवा मूल्यांकन रिपोर्ट्स दिल्ली हाईकोर्ट के पास उपलब्ध होते हैं।
  • इससे सेवानिवृत्त DHJS अधिकारियों के प्रदर्शन की संस्थागत और वस्तुपरक समीक्षा संभव हो पाती है।
  • नियम 9बी, Rule 9A की अंक प्रणाली से छूट देकर DHJS अधिकारियों को वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है।
  • 27 फरवरी 2025 को हुई रूल्स कमेटी की बैठक के मिनट्स प्रस्तुत किए गए, जिनमें स्पष्ट कहा गया:
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“दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश अन्य राज्यों के सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों के कार्य और प्रदर्शन का मूल्यांकन नहीं कर सकते; अतः उन्हें सीनियर एडवोकेट पद के लिए उपयुक्त ठहराना संभव नहीं है।”

कोर्ट का फैसला: नियम 9बी संविधान-सम्मत

कोर्ट ने नियम 9बी को वैध ठहराते हुए कहा:

“सीनियर एडवोकेट की पदवी कोई अधिकार नहीं, बल्कि सम्मान और मान्यता है। इस पर संवैधानिक अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया:

  • DHJS और अन्य राज्यों के HJS अधिकारियों के बीच किया गया वर्गीकरण उचित और उद्देश्य से जुड़ा हुआ है।
  • अन्य राज्यों के अधिकारी नियम 9A के तहत आवेदन कर सकते हैं, पर नियम 9B के तहत नहीं, क्योंकि उसमें अंक आधारित मूल्यांकन नहीं होता।
  • NCLT और NCLAT में की गई सेवा, भले ही महत्वपूर्ण हो, दिल्ली हाईकोर्ट की प्रशासनिक अधिकारिता (Article 235) के अंतर्गत नहीं आती।
  • न्यायालय ने कहा:

“सीनियर एडवोकेट पद की प्रतिष्ठा को देखते हुए, व्यक्ति की कार्यशैली, व्यवहार और न्यायिक प्रतिष्ठा का मूल्यांकन आवश्यक है – जो केवल रिकॉर्ड से नहीं, बल्कि न्यायालय के अंदरूनी अनुभव से हो सकता है।”

याचिकाकर्ता द्वारा Article 19(1)(g) के उल्लंघन का तर्क भी खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:

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“सीनियर एडवोकेट पद नहीं मिलने से वकालत के अधिकार पर कोई रोक नहीं लगती। यह केवल एक विशेष मान्यता है, कोई प्रतिबंध नहीं।”

याचिका खारिज, कोई राहत नहीं

कोर्ट ने याचिका को “गैर-योग्य ठहराते हुए” खारिज कर दिया और कहा कि इस चुनौती में कोई कानूनी आधार नहीं है। रूल्स कमेटी की बैठक की कार्यवाही को रिकॉर्ड का हिस्सा बना लिया गया।

कोई लागत (cost) नहीं लगाई गई।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • नियम 9बी केवल DHJS से सेवानिवृत्त अधिकारियों पर लागू है और उन्हें बिना अंक आधारित मूल्यांकन के सीनियर एडवोकेट नामांकन का विशेष मार्ग प्रदान करता है।
  • अन्य राज्यों के सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को 10 वर्ष की वकालत पूरी कर नियम 9A के तहत आवेदन करना होगा।
  • दिल्ली हाईकोर्ट ने दोहराया कि सीनियर एडवोकेट पद कोई मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि सम्मानजनक मान्यता है, जो समग्र मूल्यांकन के आधार पर दी जाती है।

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