दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल एग्रीमेंट टू सेल (Agreement to Sell), जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) और रसीद जैसे दस्तावेजों के आधार पर किसी अचल संपत्ति पर मालिकाना हक (Title) या हिस्सेदारी का दावा नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अमित बंसल की पीठ ने कहा कि कानूनन संपत्ति का हस्तांतरण केवल पंजीकृत कन्वेंस डीड (Sale Deed) के माध्यम से ही संभव है। कोर्ट ने इस आधार पर एक बंटवारे के मुकदमे (Partition Suit) को ‘स्पष्ट रूप से आधारहीन’ (Manifestly Vexatious) बताते हुए खारिज कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद दिल्ली के करावल नगर स्थित 1 बीघा 2 बिस्वा जमीन के बंटवारे को लेकर था। वादी (Plaintiffs) स्वर्गीय दिनेश कुमार भाटिया के कानूनी वारिस हैं, जबकि प्रतिवादी (Defendants) स्वर्गीय अमरीश कुमार भाटिया के वारिस हैं। दिनेश और अमरीश सगे भाई थे।
वादी पक्ष ने कोर्ट में दावा किया कि उनके पूर्वज दिनेश कुमार भाटिया ने अपने भाई अमरीश के साथ मिलकर 7 अप्रैल 1981 को एग्रीमेंट टू सेल, जीपीए और रसीद के जरिए संयुक्त रूप से यह संपत्ति खरीदी थी। इस आधार पर उन्होंने संपत्ति में 50% हिस्सेदारी और बंटवारे की मांग की। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अक्टूबर 2021 में प्रतिवादियों ने बंटवारा करने से इनकार कर दिया। बाद में, वादी पक्ष ने 2 जनवरी 1982 की उस रजिस्टर्ड सेल डीड को रद्द करने की भी मांग की, जो अमरीश कुमार भाटिया के नाम पर थी।
दलीलों का दौर
प्रतिवादी पक्ष के वकीलों ने कोर्ट से सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर VII रूल 11 (a) और (d) के तहत मुकदमा खारिज करने की मांग की। उनकी दलील थी कि:
- सुप्रीम कोर्ट के सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज फैसले के अनुसार, एग्रीमेंट टू सेल और जीपीए से कोई मालिकाना हक नहीं मिलता।
- वादी पक्ष ने ‘स्पेसिफिक परफॉरमेंस’ (Specific Performance) का मुकदमा दायर नहीं किया, जो एग्रीमेंट टू सेल के आधार पर एकमात्र कानूनी रास्ता था।
- 1982 की रजिस्टर्ड सेल डीड को 40 साल बाद चुनौती देना कानूनन समय-सीमा (Limitation) के बाहर है।
इसके जवाब में वादी पक्ष ने तर्क दिया कि उन्हें या उनके पूर्वज को सेल डीड की जानकारी नहीं थी, इसलिए मामले में ट्रायल होना चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण और फैसला
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि वादी पक्ष का पूरा दावा केवल अपंजीकृत (Unregistered) दस्तावेजों पर आधारित था, जबकि प्रतिवादी पक्ष के पास रजिस्टर्ड सेल डीड मौजूद थी।
जस्टिस अमित बंसल ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों, विशेषकर सूरज लैंप और हालिया रमेश चंद बनाम सुरेश चंद (2025) का हवाला देते हुए कहा:
“सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि एग्रीमेंट टू सेल, जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी और रसीद के आधार पर अचल संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा नहीं किया जा सकता। टाइटल केवल पंजीकृत कन्वेंस डीड/सेल डीड के जरिए ही हस्तांतरित हो सकता है।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि वादी पक्ष ने न तो कभी ‘स्पेसिफिक परफॉरमेंस’ का दावा किया और न ही विक्रेता को पक्षकार बनाया। इसके अलावा, 1982 में बनी सेल डीड को वादी के पूर्वज (जिनकी मृत्यु 1985 में हुई) ने अपने जीवनकाल में कभी चुनौती नहीं दी थी।
कोर्ट ने आरबीएएनएमएस एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन बनाम बी. गुनाशेकर (2025) के फैसले पर भरोसा जताते हुए कहा कि जब तक सेल डीड निष्पादित नहीं होती, खरीदार के पास संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता।
मुकदमा खारिज
जस्टिस बंसल ने कहा कि वादी पक्ष ने “चतुराई से की गई ड्राफ्टिंग” (Clever Drafting) के जरिए वाद का कारण (Cause of Action) बनाने की कोशिश की है, लेकिन कानूनन यह टिकने योग्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मुकदमे को जारी रखना न्यायिक समय की बर्बादी होगी।
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने ऑर्डर VII रूल 11(a) के तहत वाद पत्र (Plaint) को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण:
- केस का नाम: नीलम भाटिया और अन्य बनाम रितु भाटिया और अन्य
- केस नंबर: CS(OS) 141/2022
- कोरम: जस्टिस अमित बंसल

