दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कमर्शियल सूट में ‘स्टेटमेंट ऑफ ट्रुथ’ दाखिल न करना या दस्तावेजों के हर पन्ने को सत्यापित न करना एक ऐसी प्रक्रियात्मक कमी है जिसे सुधारा जा सकता है। हाईकोर्ट के अनुसार, सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VI नियम 15A के तहत अनिवार्य इन प्रावधानों के उल्लंघन के आधार पर उस मुकदमे को खारिज नहीं किया जा सकता, जिसका फैसला सबूतों और मेरिट के आधार पर पहले ही हो चुका हो।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें वादी (plaintiff) को राशि का हकदार पाए जाने के बावजूद केवल तकनीकी खामियों के कारण रिकवरी सूट खारिज कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता सुश्री शशि गर्ग (मेसर्स गर्ग पेपर्स की प्रोप्राइटर) ने प्रतिवादी सुश्री रेनु गर्ग (अब उनके कानूनी उत्तराधिकारियों द्वारा प्रतिनिधित्व) के खिलाफ ₹45,35,025 की वसूली के लिए मुकदमा दायर किया था। यह विवाद क्रेडिट पर सप्लाई किए गए क्राफ्ट पेपर के भुगतान न होने से जुड़ा था। प्रतिवादी द्वारा दिए गए 12 चेक बाउंस हो गए थे, जिसके बाद यह मामला पहले समरी सूट के रूप में दर्ज हुआ और बाद में कमर्शियल सूट में बदल गया।
निचली अदालत का निर्णय
तीस हजारी कोर्ट के जिला न्यायाधीश (LDJ) ने मुकदमे के गुण-दोष (मेरिट) पर विचार करते हुए माना कि वादी ₹29,64,404 की मूल राशि और 18% ब्याज पाने की हकदार है। हालांकि, तकनीकी आधार पर विचार करते हुए अदालत ने आदेश VI नियम 15A CPC का पालन न करने के कारण मुकदमे को ‘रखरखाव योग्य’ (maintainable) नहीं माना और इसे खारिज कर दिया। इसके लिए निचली अदालत ने मेसर्स ए.वी. इंडस्ट्रीज बनाम मेसर्स नियोन इलेक्ट्रिकल्स प्राइवेट लिमिटेड मामले के पुराने फैसले का सहारा लिया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (वादी) के वकील ने दलील दी कि चूंकि यह मामला पहले एक सामान्य समरी सूट था और बाद में कमर्शियल सूट में बदला गया, इसलिए तकनीकी कमियां रह गईं। उन्होंने अदालत को आश्वासन दिया कि यदि मौका दिया जाए तो वादी इन कमियों को सुधारने के लिए तैयार है।
वहीं, प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया कि वादी को ट्रायल के दौरान सुधार का पर्याप्त अवसर मिला था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि यह हाईकोर्ट के पिछले फैसलों के अनुरूप है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और तर्क
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि प्रक्रियात्मक कानून (procedural law) न्याय सुनिश्चित करने के लिए है, न कि उसे रोकने के लिए। खंडपीठ ने टिप्पणी की:
“यह स्थापित सिद्धांत है कि प्रक्रियात्मक कानून न्याय का सहायक (handmaid) मात्र है। इसलिए, रूप की कोई कमी तब तक किसी पक्ष के ठोस अधिकारों को प्रभावित नहीं करनी चाहिए जब तक कि वह अदालत के अधिकार क्षेत्र की जड़ पर प्रहार न करती हो या किसी अपूरणीय क्षति का कारण न बनती हो।”
अदालत ने गौर किया कि इस मामले में गवाहों से पूछताछ हुई, दस्तावेजों की जांच हुई और मेरिट पर निष्कर्ष निकाला जा चुका था। ऐसी स्थिति में महज एक ‘स्टेटमेंट ऑफ ट्रुथ’ न होने के कारण सूट खारिज करना “प्रक्रिया को न्याय के सार से ऊपर रखने” जैसा होगा। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश VI नियम 15A (5) में ‘May’ (सकती है) शब्द का प्रयोग किया गया है, जो अदालत को विवेकाधीन शक्ति देता है कि वह किसी याचिका को पूरी तरह खारिज करे या उसे सुधारने का मौका दे।
अदालत ने अपने निष्कर्ष में कहा:
“स्टेटमेंट ऑफ ट्रुथ दाखिल न करना एक गंभीर प्रक्रियात्मक अनियमितता जरूर है, लेकिन यह एक ऐसी कमी है जिसे सुधारा जा सकता है। यह कमी न तो अदालत के अधिकार क्षेत्र को खत्म करती है और न ही पूरी कार्यवाही को शुरू से ही शून्य (void ab initio) बनाती है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए वादी को चार सप्ताह के भीतर आदेश VI नियम 15A CPC की शर्तों को पूरा करने की अनुमति दी है। अदालत ने निर्देश दिया है कि इन औपचारिकताओं के पूरा होते ही जिला न्यायाधीश मेरिट पर दिए गए पुराने निष्कर्षों के आधार पर नई डिक्री पारित करें और ब्याज की राशि निर्धारित करें।
- केस का शीर्षक: सुश्री शशि गर्ग बनाम सुश्री रेनु गर्ग (मृतक) उनके कानूनी वारिसों के माध्यम से।
- केस संख्या: आर.एफ.ए. (कमर्शियल) 17/2024

