दिल्ली हाईकोर्ट ने निजी स्कूलों में फ़ीस रेगुलेशन समिति गठित करने के निर्देश पर रोक से इनकार किया, समयसीमा 10 दिन बढ़ाई

दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को राजधानी के निजी स्कूलों को फ़ीस रेगुलेशन समिति (SLFRC) गठित करने संबंधी अधिसूचना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन इस समिति के गठन और फ़ीस प्रस्ताव सौंपने की समयसीमा में आंशिक राहत देते हुए 10 दिन की मोहलत दी है।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय (DoE) और उपराज्यपाल को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। यह नोटिस उस अधिनियम और नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जारी किया गया है, जो दिल्ली स्कूल शिक्षा (फ़ीस निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 के तहत लागू किए गए हैं।

अदालत ने कहा कि दिसंबर 2025 की अधिसूचना पर रोक नहीं लगाई जाएगी, लेकिन स्कूल स्तर की फ़ीस रेगुलेशन समिति के गठन की अंतिम तिथि 10 जनवरी से बढ़ाकर 20 जनवरी की जाती है। साथ ही, स्कूल प्रबंधन द्वारा समिति को फ़ीस प्रस्ताव सौंपने की समयसीमा 25 जनवरी से बढ़ाकर 5 फरवरी कर दी गई है।

पीठ ने यह स्पष्ट किया कि:

“जब तक इन याचिकाओं में आगे कोई आदेश पारित न हो, तब तक अधिसूचना के तहत की गई कोई भी कार्रवाई अंतरिम आदेश के अधीन रहेगी।”

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2025 अधिनियम के तहत, प्रत्येक निजी स्कूल को एक स्कूल स्तर फ़ीस रेगुलेशन समिति (SLFRC) गठित करनी होगी। इस समिति में निम्नलिखित सदस्य होंगे:

  • स्कूल प्रबंधन के प्रतिनिधि
  • प्रिंसिपल
  • तीन शिक्षक
  • पांच अभिभावक
  • शिक्षा निदेशालय (DoE) का एक प्रतिनिधि

इनमें से अधिकांश सदस्यों का चयन लॉटरी प्रणाली के माध्यम से किया जाएगा और एक पर्यवेक्षक की उपस्थिति में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी। यह समिति स्कूल प्रबंधन द्वारा प्रस्तुत फ़ीस प्रस्तावों की समीक्षा करेगी और 30 दिनों के भीतर निर्णय देगी।

एक्शन कमेटी अनऐडेड रिकग्नाइज्ड प्राइवेट स्कूल्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि यह अधिनियम और इससे जुड़ी अधिसूचना न केवल असंवैधानिक हैं, बल्कि निजी स्कूलों के प्रबंधन के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन भी करते हैं। उन्होंने कहा कि यह अधिसूचना केवल उपराज्यपाल द्वारा जारी की जा सकती थी, लेकिन यहां इसे शिक्षा निदेशालय ने जारी किया है, जो कानूनन गलत है।

उन्होंने अनुरोध किया कि या तो अधिसूचना पर रोक लगाई जाए या फिर स्कूलों के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।

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इसके जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता एस.वी. राजू, जो शिक्षा निदेशालय की ओर से पेश हुए, ने कहा कि अधिसूचना निदेशालय द्वारा जारी की जा सकती है और यह अधिकार उनके पास है। उन्होंने अधिकारियों से परामर्श के बाद कोर्ट के सुझाव के अनुसार समयसीमा बढ़ाने पर सहमति दे दी।

एडवोकेट कमल गुप्ता के माध्यम से दायर एक्शन कमेटी की याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह अधिनियम “पक्षपाती, मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और बिना समुचित विचार के लागू किया गया है।”

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कोर्ट ने दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई उत्तरदाताओं के जवाब मिलने के बाद होगी।

दिल्ली स्कूल शिक्षा (फ़ीस निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 को निजी स्कूलों द्वारा मनमानी फ़ीस वसूली पर लगाम लगाने और फ़ीस निर्धारण में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से लागू किया गया है। हालांकि, निजी स्कूलों की संस्थाएं इस कानून को उनके प्रशासनिक अधिकारों में हस्तक्षेप मानते हुए विरोध कर रही हैं।

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