दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 जनवरी, 2026 को सुनाए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में टिप्पणी की है कि “टेंडर इयर्स डॉक्ट्रिन” (कम उम्र के बच्चों की कस्टडी मां को देने का सिद्धांत) एक “अत्यधिक रूढ़िवादी धारणा” पर आधारित है और आधुनिक युग में यह प्रासंगिक नहीं रह गया है। जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी पिता को सौंपी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “बच्चे का कल्याण और सर्वोत्तम हित” ही सर्वोपरि है, जो किसी भी अनुमानित सिद्धांत से ऊपर है।
हाईकोर्ट ने मां द्वारा फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया और निर्देश दिया कि 12 वर्षीय बेटे और 6 वर्षीय बेटी की कस्टडी पिता के पास रहेगी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील (देबारती भूनिया चक्रवर्ती बनाम सुमन शंकर भूनिया) पटियाला हाउस कोर्ट्स, नई दिल्ली की फैमिली कोर्ट द्वारा 1 जुलाई, 2024 को दिए गए फैसले के खिलाफ दायर की गई थी। पक्षकारों का विवाह 2011 में हुआ था और उनके दो बच्चे हैं—एक बेटा (जन्म 2013) और एक बेटी (जन्म 2019)।
प्रतिवादी-पिता का आरोप था कि 4 सितंबर, 2018 को अपीलकर्ता-मां पश्चिम बंगाल स्थित ससुराल छोड़कर चली गईं और बेटे को वहीं छोड़ दिया, लेकिन बाद में 9 सितंबर, 2018 को उसे अपने साथ ले गईं। दूसरी ओर, मां ने क्रूरता और उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए दावा किया कि उन्हें अपने अजन्मे बच्चे (बेटी) की सुरक्षा के लिए घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
अलगाव के बाद, दोनों पक्षों के बीच कई कानूनी मुदमे चले, जिनमें धारा 498A/506 आईपीसी के तहत एफआईआर और घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कार्यवाही शामिल है। सुप्रीम कोर्ट के 2021 के आदेश के बाद, पश्चिम बंगाल में शुरू हुई गार्जियनशिप कार्यवाही को नई दिल्ली की फैमिली कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया था।
मुकदमे के दौरान, मां को यूनाइटेड किंगडम (यूके) में लेक्चरर की नौकरी मिल गई और वह अगस्त 2023 से वहीं रह रही हैं। हालांकि, बच्चे भारत में ही अपने नाना-नानी के साथ बैंगलोर में रह रहे थे।
फैमिली कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद पिता को एकमात्र कस्टोडियन (संरक्षक) नियुक्त किया था। कोर्ट ने मां द्वारा “लगातार पेरेंटल एलियनेशन” (पिता के प्रति बच्चों के मन में जहर घोलना) और बच्चों को बार-बार एक शहर से दूसरे शहर ले जाने से उनके कल्याण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव का हवाला दिया था।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता-मां का पक्ष: मां ने फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि अलगाव के बाद से वही बच्चों की प्राथमिक देखभालकर्ता (प्राइमरी केयरगिवर) रही हैं। उनके वकील ने “टेंडर इयर्स डॉक्ट्रिन” का हवाला देते हुए कहा कि छोटे बच्चों की कस्टडी सामान्यतः मां के पास ही होनी चाहिए। यह भी कहा गया कि बच्चे, विशेषकर बेटा, मां के साथ ही रहना चाहता है और पिता से मिलने में अनिच्छा जाहिर करता है।
मां ने पिता पर नाबालिग बेटे के साथ यौन शोषण के गंभीर आरोप भी लगाए, जिनके बारे में उन्होंने दावा किया कि बच्चे ने उन्हें बताया था। इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि उनकी आर्थिक स्थिति पिता से काफी बेहतर है, इसलिए वह बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहतर स्थिति में हैं।
प्रतिवादी-पिता का पक्ष: पिता के वकील ने फैमिली कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि मां ने “पिता से बच्चों को अलग करने के लिए जानबूझकर और लगातार प्रयास” किया है। यह दलील दी गई कि मां ने बिना कोर्ट की अनुमति के बच्चों को जोधपुर, विजयवाड़ा और बैंगलोर जैसे कई शहरों में घुमाया, जिससे उनकी स्थिरता बाधित हुई।
यौन शोषण के आरोपों पर पिता ने कहा कि ये “पूरी तरह से आधारहीन” हैं और कस्टडी की कार्यवाही के जवाब में “काउंटरब्लास्ट” (बदले की भावना) के रूप में लगाए गए हैं। उन्होंने बताया कि इन आरोपों का जिक्र शुरुआती याचिकाओं में नहीं था, बल्कि केवल साक्ष्य के चरण में किया गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चूंकि मां यूके में रह रही हैं और बच्चे नाना-नानी के पास हैं, इसलिए भारत में बच्चों का कल्याण उनके जैविक पिता के साथ रहने में ही सुनिश्चित होगा।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
खंडपीठ ने मामले के कानूनी और तथ्यात्मक पहलुओं की व्यापक समीक्षा की:
1. ‘टेंडर इयर्स डॉक्ट्रिन’ की अस्वीकृति हाईकोर्ट ने ‘टेंडर इयर्स डॉक्ट्रिन’ को निर्णायक सिद्धांत मानने से स्पष्ट इनकार कर दिया। पीठ ने टिप्पणी की:
“ऐतिहासिक रूप से, यह सिद्धांत उस समय विकसित हुआ था जब सामाजिक मानदंडों ने पिता को कमाने वाला और मां को गृहिणी व देखभाल करने वाला माना था… माता-पिता की भूमिकाओं का ऐसा कठोर विभाजन अब समकालीन वास्तविकताओं के साथ मेल नहीं खाता… कस्टडी की लड़ाई में टेंडर इयर्स डॉक्ट्रिन का आह्वान अब प्रासंगिक नहीं रह गया है।”
2. बच्चे का कल्याण सर्वोपरि सुप्रीम कोर्ट के गौरव नागपाल बनाम सुमेधा नागपाल और मौसमी मोइत्रा गांगुली बनाम जयंत गांगुली जैसे फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि “बच्चे का कल्याण और सर्वोत्तम हित” ही सबसे महत्वपूर्ण विचार है, जो माता-पिता के अधिकारों से ऊपर है।
3. पेरेंटल एलियनेशन (माता-पिता से अलगाव) कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि मां ने पिता के खिलाफ बच्चों का ब्रेनवॉश किया है। कोर्ट ने नोट किया कि घर छोड़ने के बाद से मां ने पिता को बच्चों से मिलने से रोकने का लगातार प्रयास किया। कोर्ट ने कहा:
“बेटे द्वारा पिता के प्रति दिखाई गई स्पष्ट और अडिग शत्रुता, लंबे समय तक कम संपर्क और व्यवस्थित बहिष्कार की पृष्ठभूमि में, एक स्वतंत्र या स्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं लगती, बल्कि यह एक प्रभावित प्रतिक्रिया (Conditioned Response) है।”
4. यौन शोषण के आरोप कोर्ट ने मां द्वारा पिता पर लगाए गए यौन शोषण के आरोपों की कड़ी निंदा की। पीठ ने नोट किया कि कस्टडी याचिका के जवाब में इन आरोपों का कोई जिक्र नहीं था और ये केवल साक्ष्य हलफनामे में सामने आए। कोर्ट ने कहा:
“याचिकाओं के चरण में इतने गंभीर आरोपों का अभाव हमें यह निष्कर्ष निकालने पर मजबूर करता है कि ये विश्वसनीय नहीं हैं… ये स्पष्ट रूप से प्रेरित और बदले की भावना से लगाए गए प्रतीत होते हैं।”
5. यूके ले जाने की अनुमति खारिज कोर्ट ने मां की रिलोकेशन (बच्चों को यूके ले जाने) की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट का तर्क था कि बच्चों को भारतीय क्षेत्राधिकार से बाहर ले जाने से पिता की भूमिका केवल “कभी-कभार वर्चुअल उपस्थिति” तक सीमित हो जाएगी। जजों ने टिप्पणी की:
“कानून को यह पहचानना होगा कि बचपन स्क्रीन पर नहीं जिया जाता, और माता-पिता और बच्चे के बीच का बंधन केवल डिजिटल माध्यमों से समय क्षेत्रों (Time Zones) के पार कायम नहीं रखा जा सकता।”
6. भाई-बहन को अलग करना गलत कोर्ट ने कहा कि भाई-बहन को अलग करना उनके समग्र विकास और भावनात्मक स्थिरता के लिए हानिकारक होगा। कोर्ट ने माना कि पारिवारिक कलह के बीच भाई-बहन का बंधन “निरंतरता का आधार” होता है।
फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के निर्देशों की पुष्टि की:
- कस्टडी: दोनों नाबालिग बच्चों की कस्टडी प्रतिवादी-पिता को सौंपी गई।
- रिलोकेशन: बच्चों को भारतीय अदालतों के क्षेत्राधिकार से बाहर नहीं ले जाया जाएगा।
- मां की भूमिका: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मां से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी घोषित आर्थिक क्षमता के अनुसार बच्चों की शिक्षा और कल्याण में सार्थक योगदान देना जारी रखेंगी।
- काउंसलिंग: कोर्ट ने निर्देश दिया कि “माता-पिता के बंधन को धीरे-धीरे बहाल करने और मजबूत करने” के लिए बच्चों की काउंसलिंग जारी रहेगी।
कोर्ट ने पिता द्वारा दायर अवमानना याचिका (CONT.CAS(C) 203/2025) का भी निस्तारण कर दिया, यह कहते हुए कि चूंकि मुख्य अपील का फैसला गुण-दोष के आधार पर हो चुका है, इसलिए अंतरिम आदेशों के उल्लंघन पर विचार करना अब आवश्यक नहीं है।
केस विवरण:
- केस टाइटल: देबारती भूनिया चक्रवर्ती बनाम सुमन शंकर भूनिया (अपील) और सुमन शंकर भूनिया बनाम देबारती भूनिया चक्रवर्ती (अवमानना)
- केस नंबर: MAT.APP.(F.C.) 279/2024 और CONT.CAS(C) 203/2025
- कोरम: जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर
- अपीलकर्ता (मां) के वकील: सुश्री पद्मा प्रिया, सुश्री चित्रांगदा राष्ट्रवारा, श्री अभिजीत सिंह, व अन्य।
- प्रतिवादी (पिता) के वकील: श्री प्रसेनजीत बनर्जी, सुश्री श्रेया सिंघल, सुश्री म्हासिलिनुओ केदित्सु, व अन्य।

