दिल्ली हाईकोर्ट ने मेडिकल छात्रों के एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में स्थानांतरण (माइग्रेशन) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाले ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशन, 2023 के रेगुलेशन 18 को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताते हुए कहा कि यह “स्पष्टतः मनमाना और अनुचित” है।
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने यह फैसला एक दृष्टिबाधित मेडिकल छात्र की याचिका पर सुनाया, जिसमें उसने राजस्थान के बाड़मेर स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज से दिल्ली के किसी कॉलेज में स्थानांतरण की मांग की थी।
कोर्ट ने कहा कि मेडिकल शिक्षा में एकरूपता और मानक बनाए रखने के नाम पर छात्रों के स्थानांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध “तर्कसंगत नहीं” है। अदालत ने टिप्पणी की:
“स्थानांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह स्पष्टतः मनमाना और अनुचित है।”
अदालत ने नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को निर्देश दिया कि वह तीन सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता के ट्रांसफर आवेदन पर निर्णय ले और साथ ही छात्रों के स्थानांतरण के लिए उचित नीति बनाए, जिसमें आवश्यक शर्तें और प्रतिबंध निर्धारित हों।
कोर्ट ने NMC की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि स्थानांतरण की अनुमति दुरुपयोग की संभावना पैदा करती है। अदालत ने कहा कि “दुरुपयोग की आशंका” के आधार पर नागरिक के वैध अधिकार को नहीं नकारा जा सकता।
कोर्ट ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (Rights of Persons with Disabilities Act) का हवाला देते हुए कहा कि कानून सभी सार्वजनिक निकायों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि दिव्यांग व्यक्तियों को “उचित वातावरण” और “वाजिब सहूलियतें” मिलें। अदालत ने दो टूक कहा:
“संसद द्वारा बनाए गए प्रावधान केवल शो-पीस साहित्य नहीं हो सकते जिन्हें केवल शेल्फ पर सजाकर रखा जाए।”
कोर्ट ने NMC के उस तर्क की भी आलोचना की कि याचिकाकर्ता को बाड़मेर के मौसम की जानकारी पहले से थी। न्यायालय ने इसे “जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा” बताते हुए कहा कि छात्र को बाड़मेर में सीट अपनी कम मेरिट के कारण नहीं, बल्कि इस कारण मिली क्योंकि उसे प्रारंभिक काउंसलिंग राउंड्स में भाग लेने से वंचित कर दिया गया था और कोर्ट के हस्तक्षेप से ही उसे अंतिम चरण में मौका मिला।
कोर्ट ने कहा:
“तर्कसंगतता समानता का एक पहलू है… रेगुलेशन 18 अनुच्छेद 14 की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और इसीलिए इसे अल्पविधिक (ultra vires) घोषित किया जाता है।”
अदालत के इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि विशेष परिस्थितियों में छात्रों को कॉलेज बदलने का अधिकार मिलना चाहिए और एनएमसी को इसके लिए संवैधानिक रूप से उचित नीति तैयार करनी होगी।

