दिल्ली हाईकोर्ट ने एक 6 वर्षीय नाबालिग के साथ गंभीर यौन हमले (Aggravated Sexual Assault) के दोषी की उम्रकैद की सजा को संशोधित करते हुए उसे 10 साल के सश्रम कारावास में बदल दिया है। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने कहा कि हालांकि आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित हुआ है, लेकिन पारिवारिक कठिनाइयों और घटना के 2019 के पॉक्सो संशोधन से पहले होने के तथ्य को देखते हुए सजा में कमी की गई है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 415(2) के तहत दायर की गई थी, जिसमें साकेत कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ-06, POCSO एक्ट) द्वारा 21 मार्च, 2025 को दिए गए दोषसिद्धि के फैसले और 25 मार्च, 2025 को दिए गए सजा के आदेश को चुनौती दी गई थी।
मामला पुलिस थाना गोविंद पुरी में दर्ज एफआईआर संख्या 101/2017 से संबंधित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 13 मार्च 2017 को अपीलकर्ता ने पार्क में खेल रही एक नाबालिग पीड़िता का अपहरण किया, उसे एक घर में ले गया और उसके साथ यौन हमला किया। मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर पर गंभीर चोटें (3rd degree perineal tear) पाई गई थीं, जिसके लिए सर्जरी की आवश्यकता पड़ी थी। निचली अदालत ने आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धारा 6, आईपीसी की धारा 376(2)(i) (नाबालिग से दुष्कर्म), धारा 363 (अपहरण) और धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील सुप्रिया जुनेजा ने तर्क दिया कि यह मामला “गलत पहचान” (Mistaken Identity) का है। बचाव पक्ष का कहना था कि आरोपी का असली नाम “पति राम” है, न कि “मंत्रम उर्फ मंत्रा उर्फ सोनू” जैसा कि आरोप लगाया गया है। दलील दी गई कि वेतन विवाद के कारण नियोक्ता सोनू गुप्ता ने उसे झूठा फंसाया है। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने सीसीटीवी फुटेज को धुंधला और अनिर्णायक बताया।
सजा के बिंदु पर, बचाव पक्ष ने कहा कि अपीलकर्ता की उम्र लगभग 40 वर्ष है और वह लगभग 8 साल 6 महीने की जेल काट चुका है, जहां उसका आचरण संतोषजनक रहा है। यह भी बताया गया कि उसका परिवार, जिसमें 80 वर्षीय बिस्तर पर पड़े पिता, गंभीर रूप से बीमार पत्नी और पांच नाबालिग बच्चे शामिल हैं, पूरी तरह से उस पर निर्भर है। आर्थिक तंगी के कारण बच्चों की स्कूल की पढ़ाई भी छूट गई है।
दूसरी ओर, राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे एपीपी रितेश कुमार बहरी ने तर्क दिया कि 6 वर्षीय पीड़िता ने कोर्ट में आरोपी की लगातार पहचान की है। राज्य ने जोर देकर कहा कि वीडियो लिंक के माध्यम से आरोपी को देखते ही पीड़िता ने डर के मारे अपना चेहरा छिपा लिया था, जो उसके भय को दर्शाता है। इसके अलावा, आरोपी ने धारा 313 सीआरपीसी के बयान और आरोप पत्र सहित कोर्ट के दस्तावेजों पर “मंत्रम” नाम से हस्ताक्षर किए थे, जिससे गलत पहचान का दावा खारिज हो जाता है।
कोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता के “गलत पहचान” के बचाव को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि पीड़िता द्वारा कोर्ट में आरोपी की पहचान करना एक महत्वपूर्ण सबूत है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि हमलावर की पहचान उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके चेहरे/दिखावे से होती है। नाम असली हो या नकली, यह प्रासंगिक नहीं है, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि पीड़िता ने कोर्ट में उसे हमलावर के रूप में पहचाना है।
कोर्ट ने आरोपी द्वारा टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) में शामिल होने से इनकार करने पर भी प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला। इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता ने सभी अदालती दस्तावेजों पर हिंदी में “मंत्रम” नाम से हस्ताक्षर किए थे, जो उसकी असली पहचान स्थापित करता है। सीसीटीवी फुटेज के संबंध में, कोर्ट ने कहा कि आरोपी फुटेज में पीड़िता के साथ अपनी उपस्थिति को समझाने में विफल रहा।
दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए, हाईकोर्ट ने सजा की मात्रा पर विचार किया। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले दीपांकर टिकेदार बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, 2025 का हवाला दिया, जहां पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत उम्रकैद को निश्चित अवधि की सजा में बदला गया था। हाईकोर्ट ने नोट किया कि यह घटना 2017 में हुई थी, जो पॉक्सो एक्ट में 2019 के संशोधन से पहले का समय है, जब इस अपराध के लिए न्यूनतम सजा 10 वर्ष थी।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा: “सजा कम करने वाली परिस्थितियों (mitigating circumstances), अपीलकर्ता द्वारा पहले ही काटी गई जेल की अवधि, जेल में उसके संतोषजनक आचरण, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि अपराध 2019 के संशोधन से पहले हुआ था, और उसके परिवार को हो रही गंभीर कठिनाइयों को देखते हुए, जो पूरी तरह से उस पर निर्भर है, इस कोर्ट का विचार है कि यदि सजा को संशोधित किया जाता है तो न्याय के उद्देश्य पूरे होंगे।”
निर्णय
दिल्ली हाईकोर्ट ने सजा के संबंध में अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया। आईपीसी की धारा 363, 506, 376(2)(i) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया, लेकिन उम्रकैद की सजा को संशोधित कर 10 साल के सश्रम कारावास में बदल दिया गया।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: मंत्रम उर्फ मंत्रा उर्फ सोनू बनाम एनसीटी दिल्ली राज्य
- केस नंबर: CRL.A. 601/2025 & CRL.M. (BAIL) 2499/2025
- कोरम: जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन

