दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली सरकार और इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS) से जवाब तलब किया। याचिका में अस्पताल की उस नीति को चुनौती दी गई है, जिसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए केवल 10% आईपीडी बेड और 25% ओपीडी मामलों में ही मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने एनजीओ ‘सोशल जस्टिस’ द्वारा दाखिल याचिका पर नोटिस जारी करते हुए मामले को 22 अप्रैल के लिए सूचीबद्ध किया और संबंधित पक्षों से जवाब दाखिल करने को कहा।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता सत्यकाम ने दलील दी कि ILBS एक सरकारी वित्तपोषित प्रमुख संस्थान है, जहां हेपेटाइटिस, सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज होता है। ऐसे में यह स्वीकार्य नहीं है कि संस्थान ऐसी नीति अपनाए, जिससे वह व्यवहार में एक भुगतान-आधारित अस्पताल बनकर रह जाए। उन्होंने कहा कि यह नीति मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है, क्योंकि यह आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के साथ भेदभाव करती है और उन्हें सुलभ व समयबद्ध इलाज के अधिकार से वंचित करती है।
अधिवक्ता अशोक अग्रवाल और कुमार उत्कर्ष के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि सरकार से रियायती दरों पर जमीन पाने वाले निजी अस्पतालों को भी EWS मरीजों के लिए कम से कम 10% आईपीडी और 25% ओपीडी सेवाएं मुफ्त देनी होती हैं। ऐसे में एक पूरी तरह सरकारी अस्पताल द्वारा समान या उससे कम सुविधा देना असंगत है।
याचिका में यह भी कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य संचालित अस्पतालों को बिना किसी ‘व्यावसायिक बाधा’ के सभी वर्गों को समान स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का दायित्व सौंपा है। ILBS की मौजूदा नीति को “बहिष्कारी और राजस्व-उन्मुख” बताते हुए कहा गया कि इससे संस्थान के मूल उद्देश्य पर ही आंच आती है।
याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि ILBS की इस नीति को रद्द किया जाए और सभी मरीजों के लिए मुफ्त इलाज सुनिश्चित किया जाए। वैकल्पिक रूप से, मुफ्त या EWS कोटे को बढ़ाकर कम से कम 50% करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।

