दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी के सभी सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध डायग्नोस्टिक और रेडियोलॉजिकल सुविधाओं की विस्तृत जानकारी मांगी है। न्यायालय ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक चार्ट के रूप में यह बताएं कि किन-किन अस्पतालों में एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी जांचों की सुविधाएं हैं, वे मशीनें चालू हैं या नहीं और प्रशिक्षित तकनीशियन मौजूद हैं या नहीं।
यह आदेश जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मनमीत पी.एस. अरोड़ा की खंडपीठ ने 8 जनवरी को पारित किया। मामला 2017 में खुद न्यायालय द्वारा शुरू की गई उस जनहित याचिका से जुड़ा है जिसमें दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में गंभीर चिकित्सा सुविधाओं की कमी को लेकर चिंता जताई गई थी।
कोर्ट के निर्देशों के मुख्य बिंदु:
- सभी सरकारी अस्पतालों की सूची, जिसमें यह बताया जाए कि किस अस्पताल में कौन-कौन सी रेडियोलॉजिकल मशीनें हैं — एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एमआरआई;
- प्रत्येक मशीन कार्यशील है या नहीं, यह विवरण;
- प्रशिक्षित टेक्नीशियन कितने हैं;
- वर्ष 2025 में कितने मरीजों ने इन जांचों का लाभ लिया, इसकी जानकारी।
पीठ ने यह भी कहा कि ऐसी शिकायतें सामने आई हैं कि रेडियोलॉजिकल जांच की रिपोर्ट आने में अत्यधिक देरी होती है। इस पहलू की भी जांच कर रिपोर्ट दाखिल की जाए।
दिल्ली सरकार के वकील ने बताया कि यदि MRI, CT स्कैन या अन्य रेडियोलॉजिकल सेवाओं के लिए सरकारी अस्पतालों में इंतजार की अवधि तीन दिन से अधिक हो, तो मरीजों को 35 मान्यता प्राप्त डायग्नोस्टिक केंद्रों पर रेफर किया जाता है, जहां वे निःशुल्क जांच करा सकते हैं। वर्ष 2025 में इन सेंटर्स को ₹80 करोड़ की राशि दी गई।
हालांकि, अदालत इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुई। न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह स्पष्ट नहीं है कि ये सभी 35 केंद्र वास्तव में आवश्यक सुविधाओं से लैस हैं या नहीं।
“कोई स्पष्टता नहीं है कि ये 35 डायग्नोस्टिक सेंटर्स वास्तव में अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे, MRI और CT स्कैन जैसी मूलभूत सेवाएं प्रदान कर रहे हैं या नहीं,” कोर्ट ने कहा।
अब दिल्ली सरकार को इन केंद्रों की पूरी सूची, उनमें उपलब्ध सेवाओं की जानकारी और कितने मरीजों को रेफर किया गया और सेवाएं मिलीं, इसकी रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
कोर्ट ने दिल्ली सरकार और नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) को निर्देश दिया कि वे एक मोबाइल ऐप के माध्यम से राजधानी के सभी सरकारी अस्पतालों में आपातकालीन सुविधाओं, ट्रॉमा केयर और बेड की उपलब्धता की रियल-टाइम जानकारी देने की संभावनाएं तलाशें। यह ऐप आम नागरिकों, पुलिस, एंबुलेंस सेवा प्रदाताओं और निजी अस्पतालों के लिए भी उपयोगी होगा।
कोर्ट ने UPSC और DSSSB को निर्देश दिया कि वे सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, विशेषज्ञों और अन्य स्टाफ की भर्ती प्रक्रिया को तेज करें। साथ ही, अस्पताल प्रमुखों के सेवानिवृत्त होने से पहले उनकी जगह भरने की व्यवस्था समय रहते की जाए।
इसके अलावा, अदालत ने दिल्ली सरकार को यह सुनिश्चित करने को कहा कि PM-JAY और PM-ABHIM जैसी योजनाएं प्रभावी रूप से लागू हों ताकि पात्र नागरिकों को पूरा लाभ मिल सके। दिल्ली आरोग्य कोष (DAK) योजना की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने के लिए भी रिपोर्ट मांगी गई है।
अदालत ने लोकनायक जयप्रकाश (LNJP) अस्पताल के निर्माण कार्य में देरी पर भी नाराज़गी जताई और कहा कि अब तक इस पर ₹550 करोड़ से अधिक खर्च हो चुका है, अतः इसे जल्द से जल्द पूरा कर चालू किया जाना चाहिए। PWD और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की बैठक के बाद स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणियों से स्पष्ट है कि वह दिल्ली के सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को लेकर गंभीर है और यह सुनिश्चित करना चाहती है कि आम जनता को समय पर जरूरी चिकित्सा सुविधाएं मिलें।

