दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार से मांगी अनावश्यक फॉरेंसिक लैब रेफरल पर रोक लगाने की योजना

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह पोस्टमॉर्टम मामलों में अनावश्यक रूप से राज्य संचालित फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं (FSL) को भेजे जाने वाले नमूनों की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए विशेष दिशा-निर्देश तैयार करने पर विचार करे। अदालत ने कहा कि ऐसी अंधाधुंध प्रथाएं लैब्स पर अनावश्यक बोझ डाल रही हैं और न्याय प्रक्रिया में देरी का कारण बन रही हैं।

मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति अनिश दयाल की खंडपीठ ने यह आदेश मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के फोरेंसिक मेडिसिन में एमडी कर रहे रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. सुभाष विजयन् द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।

अदालत ने कहा कि अक्सर बिना किसी चिकित्सा या कानूनी आवश्यकता के भेजे जा रहे नमूनों से फॉरेंसिक लैब्स का तंत्र जाम हो रहा है, जिससे आपराधिक जांच में महत्वपूर्ण साक्ष्यों की जांच में देरी हो रही है। बेंच ने टिप्पणी की, “अनावश्यक रेफरल्स के चलते FSL में ऐसे मामलों की भरमार हो रही है, जिन्हें टाला जा सकता था। इससे महत्वपूर्ण नमूनों की जांच में देरी होती है और आपराधिक न्याय प्रणाली की गति प्रभावित होती है।”

हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को इस मुद्दे की समीक्षा करने और उपयुक्त नीतिगत कदमों पर विचार करने के लिए तीन महीने का समय दिया।

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डॉ. विजयन् की याचिका में जैविक नमूनों—जैसे विसरा, खून और ऊतक—को “अंधाधुंध” तरीके से भेजे जाने पर आपत्ति जताई गई, विशेषकर ऐसे मामलों में जहां foul play (अप्राकृतिक मृत्यु) का कोई संदेह नहीं होता। याचिका में कहा गया कि डॉक्टरों में भविष्य में कानूनी कार्रवाई की आशंका के चलते यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। “ज्यादातर डॉक्टर अदालतों और कानूनी प्रक्रिया से डरते हैं। संभावित कानूनी जटिलताओं से बचने के लिए वे लगभग हर मामले में नमूने भेज देते हैं, भले ही वह आवश्यक न हो। यह बेवजह सतर्कता सिस्टम को जाम कर रही है,” याचिका में कहा गया।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि कई मामलों में पुलिस अधिकारी यह स्पष्ट कर देते हैं कि जांच के लिए फॉरेंसिक परीक्षण की आवश्यकता नहीं है, फिर भी डॉक्टर नमूने भेजते हैं।

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याचिकाकर्ता के अनुसार, ऐसी प्रथाएं राज्य के संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ डालती हैं, अंतिम पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में देरी करती हैं और मृतकों के परिजनों पर मानसिक प्रभाव डालती हैं। इसके अतिरिक्त, पुराने ऑटोप्सी तरीकों, मैनुअल टॉक्सिकोलॉजी प्रक्रियाओं और पुलिस द्वारा नमूने देर से भेजने जैसे कारण भी देरी के लिए जिम्मेदार हैं।

हाईकोर्ट के इस निर्देश से उम्मीद है कि फॉरेंसिक रेफरल के लिए स्पष्ट चिकित्सीय और कानूनी मानदंड तय होंगे, जिससे प्रक्रिया अधिक सुसंगठित होगी और आपराधिक मामलों की जांच समय पर पूरी हो सकेगी।

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