शादी के 7 साल के भीतर केवल अप्राकृतिक मृत्यु “दहेज हत्या” साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं, क्रूरता के कड़े सबूत जरूरी: हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में पति और उसके परिवार को बरी किए जाने के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की पीठ ने स्पष्ट किया कि शादी के सात साल के भीतर केवल अप्राकृतिक मृत्यु होना आईपीसी की धारा 304B के तहत सजा सुनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA) की धारा 113B के तहत दोष की वैधानिक धारणा तभी लागू होती है जब अभियोजन पक्ष यह साबित कर दे कि मृत्यु से ठीक पहले (“soon before death”) मृतका के साथ दहेज के लिए क्रूरता की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कोमल त्यागी की मौत से जुड़ा है, जो 20-21 जुलाई, 2011 की रात को अपने मायके में खून से लथपथ पाई गई थी। उसकी दोनों कलाइयों पर गहरे जख्म थे। यह घटना उसकी विजय त्यागी के साथ 11 मई, 2011 को हुई शादी के महज 71 दिन बाद हुई थी। राज्य सरकार ने पति और उसके ससुराल वालों के खिलाफ आईपीसी की धारा 498A/304B/34 के तहत मामला दर्ज किया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि हुंडई एक्सेंट कार और 2,00,000 रुपये नकद की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया जा रहा था।

ट्रायल कोर्ट ने 24 जनवरी, 2018 को आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षों की दलीलें

अभियोजन पक्ष (राज्य) ने तर्क दिया कि चूंकि मृत्यु शादी के सात साल के भीतर हुई और अप्राकृतिक थी, इसलिए कोर्ट को धारा 113B के तहत दहेज हत्या का अनुमान लगाना चाहिए। मृतका के पिता, मां और भाई के बयानों के आधार पर यह दावा किया गया कि शादी से पहले ही कार की मांग शुरू हो गई थी। अभियोजन का कहना था कि मौत से तीन दिन पहले पति से फोन पर हुई बातचीत के बाद कोमल काफी परेशान थी, जिसे “मृत्यु से ठीक पहले की क्रूरता” माना जाना चाहिए।

प्रतिवादी (ससुराल पक्ष) ने इन आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया कि यह मामला मृतका के अपने ही परिवार द्वारा “ऑनर किलिंग” का है। उन्होंने तर्क दिया कि कोमल के पास से 34 सोने के गहने बरामद हुए थे, जो यह दर्शाता है कि ससुराल वालों ने उसका कोई कीमती सामान नहीं रोका था। इसके अलावा, उन्होंने मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर आत्महत्या के दावे को पूरी तरह से खारिज किया।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की गहन समीक्षा की और कई ऐसी विसंगतियां पाईं जिससे अभियोजन का पक्ष कमजोर हो गया:

1. बुनियादी तथ्यों को साबित करने में विफलता: हाईकोर्ट ने अवलोकन किया कि दहेज हत्या के मामले में अभियोजन को पहले यह साबित करना होगा कि दहेज की मांग को लेकर क्रूरता हुई थी। पिता का यह दावा कि उसे शादी के कार्ड छपने के कारण कार बदलनी पड़ी, झूठा पाया गया। दस्तावेजों से पता चला कि कार मार्च 2011 में बुक की गई थी, जबकि मैरिज वेन्यू अप्रैल के अंत में बुक हुआ था।

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2. आत्महत्या की मेडिकल असंभवता: कोर्ट ने पोस्टमार्टम करने वाले डॉ. बी.एन. मिश्रा की गवाही पर भरोसा किया। डॉक्टर ने स्पष्ट किया कि कलाइयों पर घाव इतने गहरे थे कि सभी नसें (flexor tendons) कट गई थीं। हाईकोर्ट ने दर्ज किया: “घाव नंबर 2 के बाद उंगलियों का हिलना… संभव नहीं था और हाथ में कुछ भी पकड़ना मुमकिन नहीं था।” इसके चलते यह शारीरिक रूप से असंभव था कि मृतका ने खुद ही दूसरी कलाई काटी हो। डॉक्टर ने स्वीकार किया कि “तीसरे व्यक्ति की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता।”

3. परिवार का “अत्यधिक अस्वाभाविक” आचरण: पीठ ने पाया कि कोमल के मायके वालों का व्यवहार उसकी मासूमियत के दावों से मेल नहीं खाता। उसे तड़पता हुआ देखने के बावजूद पिता, मां या भाई ने न तो पट्टियां बांधी और न ही पुलिस को फोन किया। कोर्ट ने कहा: “खून से लथपथ व्यक्ति को देखकर कोई अजनबी भी सहज रूप से खून रोकने की कोशिश करता है।”

4. परिस्थितिजन्य विसंगतियां: हाईकोर्ट ने नोट किया कि जिस ब्लेड से नसें काटी गईं, वह खून के पूल के “ऊपर” रखा पाया गया था, जबकि आत्महत्या की स्थिति में उसे खून के नीचे होना चाहिए था। इसके अलावा, मृतका के शरीर पर 12-24 घंटे पुरानी चोटों के निशान थे, जिनका अभियोजन के पास कोई स्पष्टीकरण नहीं था।

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ उत्तराखंड बनाम संजय राम टम्टा (2025) और शूर सिंह बनाम स्टेट ऑफ उत्तराखंड (2025) के फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि धारा 113B का अनुमान तभी लगाया जा सकता है जब दहेज हत्या के सभी आवश्यक तत्व बिना किसी संदेह के साबित हों।

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हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

“अभियोजन पक्ष यह संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है कि मृत्यु से ठीक पहले मृतका को दहेज की किसी मांग के संबंध में क्रूरता या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था।”

बरी करने के फैसले को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और आरोपियों के बेल बॉन्ड को डिस्चार्ज कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: द स्टेट बनाम विजय त्यागी और अन्य
  • केस नंबर: CRL.A. 803/2018
  • पीठ: जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन
  • तारीख: 13 मार्च, 2026

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