दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल यह कह देना कि प्राइमरी हाइपरटेंशन एक “लाइफस्टाइल डिसऑर्डर” है, किसी पूर्व वायुसेना अधिकारी को विकलांगता पेंशन से वंचित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जब तक मेडिकल बोर्ड व्यक्तिगत रूप से पूरी जांच कर ठोस कारण नहीं देता, तब तक इस आधार पर पेंशन से इनकार नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत पी. एस. अरोड़ा की खंडपीठ ने 19 जनवरी को यह फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें भारतीय वायुसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी को हाइपरटेंशन के लिए विकलांगता पेंशन दिए जाने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने कहा:
“यह नोट करना आवश्यक है कि जीवनशैली व्यक्ति से व्यक्ति में भिन्न होती है। इसलिए, यह कहना कि यह बीमारी एक जीवनशैली विकार है, तब तक पर्याप्त नहीं है जब तक मेडिकल बोर्ड संबंधित व्यक्ति के बारे में विशिष्ट तथ्यों को दर्ज कर यह निष्कर्ष न निकाले।”
कोर्ट के समक्ष यह तथ्य भी स्वीकार किया गया कि अधिकारी को सेवा में शामिल होने के समय कोई विकलांगता नहीं थी। उन्होंने अक्टूबर 1981 में वायुसेना जॉइन की थी और मार्च 2019 में 37 वर्ष 5 माह और 4 दिन की सेवा के बाद सेवानिवृत्त हुए।
केंद्र सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि हाइपरटेंशन “आईडियोपैथिक/लाइफस्टाइल संबंधित विकार” है और यह किसी सैन्य सेवा के कारण उत्पन्न या उससे बढ़ा हुआ नहीं है, क्योंकि यह एक शांतिपूर्ण क्षेत्र में हुआ था।
लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि मेडिकल बोर्ड ने इस निष्कर्ष को समर्थन देने के लिए कोई ठोस कारण नहीं दिए और न ही यह स्पष्ट किया कि क्यों हाइपरटेंशन को ‘लाइफस्टाइल’ से संबंधित माना गया।
कोर्ट ने कहा:
“इस संदर्भ में कानून की स्थिति स्पष्ट है कि मेडिकल बोर्ड पर यह बाध्यता है कि वह अपने निष्कर्ष के समर्थन में कारण दर्ज करे। इसलिए, बोर्ड को कारणों और निष्कर्षों को दर्ज करना चाहिए ताकि उस पर रखे गए भार का निर्वहन हो सके।”
कोर्ट ने AFT के निर्णय को सही बताते हुए कहा:
“हमारा मत है कि इस मामले के तथ्यों को देखते हुए ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया निष्कर्ष दोषरहित है। यह याचिका निराधार होने के कारण खारिज की जाती है।”
यह फैसला इस बात को पुनः स्थापित करता है कि हाइपरटेंशन जैसी बीमारियों से जुड़ी विकलांगता पेंशन की मांग पर निर्णय करते समय, प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के अनुसार व्यक्तिगत रूप से जांच और संतुलित कारण आवश्यक होते हैं।

