केंद्र सरकार ने शुक्रवार को दिल्ली हाईकोर्ट में दायर उस जनहित याचिका (PIL) का कड़ा विरोध किया जिसमें एयर प्यूरीफायर को ‘चिकित्सा उपकरण’ घोषित करने और उस पर जीएसटी दर को घटाकर 5% करने की मांग की गई है। केंद्र ने कोर्ट को बताया कि यह याचिका “प्रेरित और दिखावटी” प्रयास है, जिसका असली मकसद कुछ खास कंपनियों को व्यावसायिक लाभ पहुंचाना है, न कि किसी वास्तविक जनहित की रक्षा।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ के समक्ष अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटारमण ने केंद्र और जीएसटी काउंसिल की ओर से पेश होते हुए दलील दी कि यदि एयर प्यूरीफायर को मेडिकल डिवाइस घोषित किया गया, तो उससे न केवल अतिरिक्त रेगुलेटरी बोझ बढ़ेगा, बल्कि बाज़ार में इनकी उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है।
केंद्र सरकार द्वारा दाखिल शपथपत्र में कहा गया कि याचिकाकर्ता की ओर से मांगी गई राहतों का उद्देश्य केवल यह है कि एयर प्यूरीफायर को Drugs and Cosmetics Act और Medical Devices Rules के तहत मेडिकल डिवाइस घोषित करा दिया जाए ताकि कुछ कंपनियां, जिनके पास पहले से लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन हैं, बाज़ार में नियंत्रण पा सकें।
“याचिका में की गई प्रार्थनाएं और इसे ‘मेडिकल डिवाइस’ घोषित कराने की जिद यह दर्शाती है कि यह जनहित याचिका असल में किसी सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि एक प्रेरित और दिखावटी प्रयास है,” केंद्र ने शपथपत्र में कहा।
“यह याचिका केवल कुछ गिने-चुने संस्थानों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से दायर की गई है और इस आधार पर ही इसे खारिज कर देना चाहिए,” सरकार ने जोड़ा।
केंद्र ने स्पष्ट रूप से कहा कि जीएसटी दरों को बदलना, जीएसटी काउंसिल की बैठक बुलाना या किसी विशेष निर्णय की सिफारिश करना केवल और केवल जीएसटी काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में आता है। यदि अदालत ऐसा आदेश देती है, तो वह संविधान द्वारा निर्धारित शक्तियों के विभाजन (Separation of Powers) का उल्लंघन होगा।
“यदि अदालतें जीएसटी दरों को लेकर दिशा-निर्देश देने लगेंगी, तो जीएसटी काउंसिल एक ‘रबर स्टैम्प’ बनकर रह जाएगी,” केंद्र ने कहा।
“जीएसटी से संबंधित किसी भी सिफारिश को निर्देशित करना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 279A में निहित सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना के भी खिलाफ है।”
यह याचिका अधिवक्ता कपिल मदान ने दाखिल की थी, जिन्होंने तर्क दिया कि दिल्ली-एनसीआर में बिगड़ती वायु गुणवत्ता को देखते हुए एयर प्यूरीफायर को लक्ज़री वस्तु मानना अनुचित है। उन्होंने फरवरी 2020 की एक अधिसूचना का हवाला दिया जिसमें, उनके अनुसार, एयर प्यूरीफायर को भी मेडिकल डिवाइस की श्रेणी में रखा गया था।
याचिकाकर्ता ने कहा कि मेडिकल डिवाइस पर जीएसटी 5% है, जबकि एयर प्यूरीफायर पर 18% टैक्स लिया जा रहा है। उन्होंने मांग की कि वायु प्रदूषण के इस संकट को देखते हुए एयर प्यूरीफायर पर भी 5% जीएसटी लगाया जाए।
इससे पहले, अदालत ने याचिकाकर्ता की दलील पर केंद्र सरकार से पूछा था कि जब वायु गुणवत्ता “बहुत खराब” श्रेणी में है, तो एयर प्यूरीफायर जैसी जरूरी चीजों पर टैक्स हटाने या कम करने की दिशा में कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया।
शुक्रवार को अदालत ने केंद्र के शपथपत्र में याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर ध्यान दिया और उन्हें जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी।

