दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत दोषी ठहराए गए एक पूर्व अनुभाग अधिकारी (Section Officer) की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल पैसों की बरामदगी ही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि अवैध परितोष (bribe) की ‘मांग’ को साबित करना अनिवार्य है।
जस्टिस मनोज कुमार ओहरी की पीठ ने निचली अदालत के 2002 के फैसले को चुनौती देने वाली अपील को स्वीकार करते हुए यह निर्णय सुनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला “हजारों जख्मों से मर गया” (Suffered death by a thousand cuts) क्योंकि इसमें इतनी अधिक विसंगतियां थीं कि संदेह का लाभ अपीलकर्ता को मिलना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 31 जुलाई 1992 को मेसर्स एल्पर केबल्स कॉरपोरेशन (M/s. Elpar Cables Corporation) के एक अकाउंटेंट अमर नाथ ओबेरॉय द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि ऑडिट विभाग की एक टीम, जिसमें ऑडिट अधिकारी आर.एन. अरोड़ा और अपीलकर्ता तेज नारायण शर्मा शामिल थे, ने फर्म के रिकॉर्ड का निरीक्षण किया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 30 जुलाई 1992 को आर.एन. अरोड़ा ने कथित तौर पर सही ऑडिट रिपोर्ट देने के बदले 9 वर्षों के लिए 3,000 रुपये प्रति वर्ष के हिसाब से कुल 27,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। बाद में यह सौदा 20,000 रुपये में तय हुआ। आरोप था कि अरोड़ा ने शिकायतकर्ता को निर्देश दिया कि वह अगले दिन यह राशि तेज नारायण शर्मा को दे।
इसके बाद भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (ACB) ने जाल बिछाया और अपीलकर्ता के पास से 20,000 रुपये के नोट बरामद किए। विशेष न्यायाधीश ने 2002 में अपीलकर्ता को दोषी मानते हुए दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका एम. जॉन ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की ‘मांग’ को साबित करने में विफल रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मुख्य मांग कथित तौर पर आर.एन. अरोड़ा ने की थी, लेकिन उन्हें कभी आरोपी नहीं बनाया गया। हैरानी की बात यह है कि अरोड़ा इस मामले में बचाव पक्ष के गवाह (DW-2) के रूप में पेश हुए और उन्होंने अभियोजन की कहानी को ही नकार दिया।
बचाव पक्ष ने तथ्यों में विरोधाभास की ओर भी इशारा किया। शिकायतकर्ता का दावा था कि रिश्वत 9 साल के ऑडिट के लिए मांगी गई थी, जबकि फर्म केवल 6 साल (1986 से) से अस्तित्व में थी। इसके अलावा, पंच गवाह (panch witness) की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए गए क्योंकि उसने स्वीकार किया कि वह 5 अन्य मामलों में भी गवाह रह चुका है। बचाव पक्ष ने हाथ धोने के नमूनों (wash samples) की कस्टडी और अभियोजन स्वीकृति (sanction) आदेश की वैधता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए।
राज्य की ओर से ए पी पी (APP) प्रदीप गहलोत ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता की गवाही और आरोपी से नोटों की बरामदगी से अपराध साबित होता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
हाईकोर्ट ने सबूतों की बारीकी से जांच की और पाया कि अभियोजन की कहानी में कई महत्वपूर्ण खामियां थीं।
1. रिश्वत की मांग साबित करना अनिवार्य (Sine Qua Non) सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए, अदालत ने दोहराया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13(1)(d) के तहत दोषसिद्धि के लिए रिश्वत की मांग को साबित करना एक अनिवार्य शर्त है। अदालत ने कहा:
“आरोपी से केवल करेंसी नोटों की बरामदगी और कब्जा, बिना मांग के सबूत के, धारा 7 के तहत अपराध साबित नहीं करता।”
2. मुख्य आरोपी पर कार्रवाई न होना अदालत ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि जब अभियोजन का लगातार यह कहना था कि शुरुआती मांग आर.एन. अरोड़ा ने की थी, तो उनके खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही क्यों नहीं की गई।
“अदालत के मन में पहला बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि शुरुआती मांग आर.एन. अरोड़ा ने की थी, तो उनके खिलाफ कभी कोई मामला क्यों नहीं चलाया गया। अजीब बात है कि आर.एन. अरोड़ा आरोपी होने के बजाय बचाव पक्ष के गवाह (DW-2) बन गए।”
3. यांत्रिक मंजूरी (Mechanical Sanction) अदालत ने पाया कि अभियोजन स्वीकृति आदेश (Sanction Order) बिना दिमाग लगाए जारी किया गया था। यह केवल ड्राफ्ट आदेश की नकल प्रतीत होता था, जिस पर गवाह ने माना कि शब्द “ड्राफ्ट” लिखा था जिसे बाद में हटा दिया गया। आदेश में गलत तरीके से यह उल्लेख किया गया था कि मांग 30.07.1992 को अपीलकर्ता ने की थी, जो कि अभियोजन के अपने ही केस (कि मांग अरोड़ा ने की थी) के विपरीत था।
4. तथ्यों में विसंगतियां अदालत ने मांग के तर्क में भी दोष पाया। शिकायतकर्ता ने कहा था कि 9 साल के लिए रिश्वत मांगी गई थी, जबकि जिरह में उसने स्वीकार किया कि फर्म केवल 6 साल पुरानी थी। इसके अलावा, हैंड वॉश के नमूनों को मालखाना के बजाय एसीपी की निजी अलमारी में रखा गया था, जिससे सबूतों की चेन ऑफ कस्टडी (chain of custody) टूट गई।
निष्कर्ष
जस्टिस ओहरी ने निष्कर्ष निकाला कि इन सभी विसंगतियों ने मिलकर अभियोजन पक्ष के मामले को संदिग्ध बना दिया है।
अदालत ने टिप्पणी की:
“मौजूदा मामले में अभियोजन पक्ष का केस ‘हजारों जख्मों से मर गया’ (suffered death by a thousand cuts)। आर.एन. अरोड़ा को बचाने की स्पष्ट कोशिश, यांत्रिक मंजूरी आदेश, 6 साल पुरानी फर्म के लिए 9 साल के ऑडिट की मांग का तर्क… इन सबने मिलकर अभियोजन के मामले को संदेह के घेरे में ला दिया है।”
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी (acquitted) कर दिया और निचली अदालत के सजा के आदेश को रद्द कर दिया।
केस विवरण:
केस टाइटल: तेज नारायण शर्मा बनाम स्टेट ऑफ दिल्ली
केस नंबर: CRL.A. 993/2002 कोरम: जस्टिस मनोज कुमार ओहरी
अपीलकर्ता के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री रेबेका एम. जॉन, साथ में अधिवक्ता श्री हर्ष बोरा और श्री निरंजन डे
प्रतिवादी के वकील: श्री प्रदीप गहलोत, एपीपी (APP)

