सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि कोई आरोपी केवल इस आधार पर डिफॉल्ट बेल (जमानत) पाने का हकदार नहीं है कि जांच एजेंसी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 193(8) के तहत चार्जशीट की अतिरिक्त प्रतियां जमा नहीं की हैं। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकामपाम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने आरोपी की उस आपराधिक अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने कहा कि यदि वैधानिक अवधि के भीतर चार्जशीट सही प्रारूप में दाखिल कर दी गई है, तो डिफॉल्ट बेल का अधिकार समाप्त हो जाता है और प्रक्रियात्मक चूक इसे पुनर्जीवित नहीं करती।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 4 जुलाई 2025 को मुंबई में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज की गई एफआईआर से शुरू हुआ था। इसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और आईटी एक्ट की धाराओं के तहत साइबर ठगी, फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल और ‘म्यूल अकाउंट’ के जरिए अवैध धन हस्तांतरण के गंभीर आरोप थे। सीबीआई का आरोप था कि आरोपी ने मुख्य आरोपी को साजो-सामान उपलब्ध कराने में मदद की।
आरोपी को 13 जुलाई 2025 को गिरफ्तार किया गया था। सीबीआई ने 2 सितंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल की, जबकि आरोपी को इसकी प्रति 23 सितंबर 2025 को उपलब्ध कराई गई। आरोपी ने 17 सितंबर 2025 को डिफॉल्ट बेल के लिए आवेदन किया, यह तर्क देते हुए कि बीएनएसएस की धारा 187(3) के तहत तय समय में चार्जशीट और दस्तावेज उसे नहीं मिले, इसलिए वह 11 सितंबर से ही जमानत का हकदार हो गया था। स्पेशल जज और बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया था।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता का तर्क था कि बीएनएसएस की धारा 193(8) के तहत चार्जशीट की अतिरिक्त प्रतियां जमा करना अनिवार्य है। उसने धारा 230 का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस रिपोर्ट आरोपी को 14 दिनों के भीतर मिलनी चाहिए। वहीं, सीबीआई ने दलील दी कि डिफॉल्ट बेल का अधिकार केवल तब उत्पन्न होता है जब पुलिस 60 या 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करने में विफल रहे। सीबीआई ने स्पष्ट किया कि उसने समय सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल कर दी थी।
अदालत का विश्लेषण
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डिफॉल्ट बेल का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत एक महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन यह ‘सशर्त’ है। अदालत ने पुराने सीआरपीसी और नए बीएनएसएस के प्रावधानों की तुलना करते हुए कहा:
“जैसे पुरानी सीआरपीसी के तहत स्थिति थी, बीएनएसएस में भी यही है कि डिफॉल्ट बेल का अधिकार तब पैदा होता है जब 60 या 90 दिनों की अवधि के भीतर चार्जशीट दाखिल न हो। एक बार जब चार्जशीट बीएनएसएस की धारा 193(3) के तहत निर्धारित प्रारूप में दाखिल हो जाती है, तो डिफॉल्ट बेल का अधिकार खत्म हो जाता है। धारा 193(8) का पालन न करने को धारा 187(3) के समान परिणाम नहीं दिया जा सकता।”
अदालत ने ‘सीबीआई बनाम कपिल वधावन’ मामले का हवाला देते हुए जोड़ा:
“यदि किसी कारण से चार्जशीट के साथ सभी दस्तावेज दाखिल नहीं किए जाते हैं, तो वह कारण अपने आप में चार्जशीट को अमान्य या दूषित नहीं करता।”
अदालत ने यह भी माना कि चार्जशीट के साथ दस्तावेजों की आपूर्ति से संबंधित प्रावधान ‘निर्देशात्मक’ (डायरेक्टरी) हैं, ‘अनिवार्य’ (मेंडेटरी) नहीं।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि सीबीआई ने तय समय सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल कर दी थी, जिससे डिफॉल्ट बेल का अधिकार समाप्त हो गया था। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी। पीठ ने यह स्पष्ट किया कि आरोपी की नियमित जमानत (रेगुलर बेल) याचिका पर कानून के अनुसार गुण-दोष के आधार पर सुनवाई होनी चाहिए, जो इस अपील के नतीजों से स्वतंत्र होगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: शौर्य सुनील कुमार सिंह बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 की (स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) संख्या 4333 ऑफ 2026 से उत्पन्न)
पीठ: न्यायमूर्ति संजय करोल, न्यायमूर्ति नोंगमेइकामपाम कोटिश्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 1 जुलाई 2026

