बेटी अपने पिता की दूसरी शादी की वैधता पर सवाल उठा सकती है: हाई कोर्ट

महाराष्ट्र—- बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि एक बेटी आने पीतग के दूसरे विवाह की वैधता पर सवाल उठा सकती है। जस्टिस आरडी धनुका और जस्टिस विजी विष्ट की पीठ ने 66 वर्षीय बेटी की याचिका पर यह टिप्पणी की। उसके पिता ने 2003 में अपनी पत्नी की मौत उपरांत दूरी शादी की थी। 

वर्ष 2015 में उसके पिता की भी मौत हो गई।2016 में उसे महसूस हुआ कि उसकी सौतेली माँ ने जब उसके पिता से शादी की थी। तब वह पहले से मैरिड थी और उसका डिवोर्स भी नही हुआ था। बेटी ने आरोप लगाया है कि उसकी सौतेली माँ उसके पिता की मानसिक हालात और बीमारियों के बारे में पहले से सबकुछ जानती थी। और इसके बावजूद उसने शादी कर इसका गलत फायदा उठाया। 

बेटी का यह भी आरोप है कि शादी के उपरांत उसकी सौतेली माँ ने पिता की संपत्तियों को अपने नाम करवा लिया और कई अचल सम्पतियों पर भी कब्जा कर लिया। जिस पर असल मे उसका हक था। जिसका निष्कर्ष यह निकला कि कानूनी रूप से जो उसका हकदार था। उन्हें वह संपत्ति नही मिल सकी।

बेटी ने इस पूरे मामले को पारिवारिक न्यायालय में याचिका दाखिल कर मांग की है कि 24 जुलाई 2003 को उसके पिता और सौतेली माँ के मध्य जो शादी हुई है उसे खारिज किया जाय। 

दूसरी ओर सौतेली माँ ने दलीलें दी है कि 23 अगस्त 1984 को उसने अपने पति को उर्दू में तलाकनामा दे दिया था। साथ ही मुम्बई के मैरिज रजिस्ट्रार ने पूरे दस्तावेज जांचने के बाद ही उनकी शादी को रजिस्टर किया था। माँ का आरोप है कि उसकी सौतेली बेटी उनकी सारी संपत्ति हड़पना चाहती है। इसलिए इस मुद्दे को उठा रही है। सौतेली माँ का कहना है कि यदि बेटी को शादी से आपत्ति थी तो शादी के 3 साल के अंदर ही कोर्ट जाना चाहिए था। 

सौतेली माँ ने यह भी कहा कि बेटी को शादी की वैधता को चुनौती देने का कोई अधिकार नही है। शादी की वैधता को केवल पक्षकार पति या पत्नी ही चुनौती दे सकते हैं। कोई तीसरा पक्ष नही। और खासतौर पर तब तो बिल्कुल नही जब पति या पत्नी में से कोई एक जीवित न हो। 

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फैमिली कोर्ट ने शादी की वैधता के अधिकार को चुनौती देने वाले मामले में सौतेली माँ के पक्ष में फैसला दिया था। फैमिली कोर्ट ने कहा था कि बेटी को शादी की वैधता को चुनौती देने का अधिकार नही है।अब बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रदद करते हुए कहा कि बेटी के पास अपने पिता की दूसरी शादी की वैधता पर सवाल उठाने का अधिकार है। साथ ही हाई कोर्ट ने कहा कि शादी की वैधता पर फैसला लेने का अधिकार फैमिली कोर्ट के पास है। इसलिए हाई कोर्ट ने 6 माह के अंदर इस मामले में फैसला लेने का आदेश दिया है। 

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