उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक संगठित साइबर ठगी मामले में आरोपी को ज़मानत देने से इनकार कर दिया है। आरोपी पर आम लोगों को सरकारी अधिकारी बनकर डराने-धमकाने और उनसे धोखाधड़ी से पैसे वसूलने का आरोप है।
न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की अवकाशकालीन एकल पीठ ने कहा कि यह केवल एक आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि ऐसा अपराध है जो सार्वजनिक संस्थानों में लोगों के विश्वास को नुकसान पहुंचाता है।
मामले के अनुसार, हरिद्वार निवासी राहुल और उसके साथियों ने कई लोगों को कॉल कर यह झूठा दावा किया कि उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हुए हैं। गिरफ्तारी की धमकी देकर उन्होंने पीड़ितों से QR कोड के ज़रिये पैसे ट्रांसफर करवाए ताकि वे कथित कानूनी कार्रवाई से बच सकें।
राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि मामले के मुख्य आरोपी कृष्णकांत के घर से फर्जी वारंट, लैपटॉप, कंप्यूटर और अन्य डिजिटल उपकरण राहुल की गिरफ्तारी के बाद ही बरामद हुए। यह दर्शाता है कि यह एक बड़ा और संगठित आपराधिक षड्यंत्र है जिसमें राहुल की भूमिका भी अहम है।
राहुल की ओर से दलील दी गई कि उसके पास से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई है और उसे झूठा फंसाया गया है। लेकिन अदालत ने आरोपों की गंभीरता, जांच में अब तक सामने आए साक्ष्यों और अपराध की संगठित प्रकृति को देखते हुए ज़मानत देने से इंकार कर दिया।
न्यायालय ने कहा कि यदि आरोपी को रिहा किया गया, तो वह जांच को प्रभावित कर सकता है और साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका भी बनी रहेगी।

