सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कंपनी लॉ बोर्ड (CLB), जो कि कंपनी अधिनियम, 2013 के संक्रमणकालीन दौर (transition period) में एक अर्ध-न्यायिक निकाय (quasi-judicial body) के रूप में कार्य कर रहा था, के पास परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act) की धारा 5 के तहत देरी को माफ करने (condone delay) की शक्ति नहीं थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तक किसी विशेष कानून द्वारा स्पष्ट रूप से अधिकार न दिया गया हो, अर्ध-न्यायिक निकाय परिसीमा अवधि (limitation period) को बढ़ाने की विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकते।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें CLB द्वारा कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 58(3) के तहत अपील दायर करने में हुई 249 दिनों की देरी को माफ करने के निर्णय को सही ठहराया गया था। पीठ ने कहा कि 2013 के अधिनियम की धारा 433, जो नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) पर लिमिटेशन एक्ट के प्रावधानों को लागू करती है, 1 जून 2016 को लागू हुई थी और इसे CLB की कार्यवाही पर पूर्वव्यापी प्रभाव (retrospectively) से लागू नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला ‘द प्रॉपर्टी कंपनी (प्रा) लिमिटेड’ (अपीलकर्ता) द्वारा प्रतिवादी, श्री रोहिंटन डैडी मज़्दा के पक्ष में 20 इक्विटी शेयरों के ट्रांसमिशन (transmission) को पंजीकृत करने से इनकार करने से जुड़ा है। ये शेयर मूल रूप से प्रतिवादी की मां के पास थे, जिनका 1989 में निधन हो गया था। प्रतिवादी ने 1990 में उनकी वसीयत का प्रोबेट प्राप्त किया लेकिन शेयरों के ट्रांसमिशन के लिए आवेदन 2013 में किया।
30 अप्रैल 2013 को कंपनी द्वारा ट्रांसमिशन से इनकार करने के बाद, प्रतिवादी तत्कालीन कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत निर्धारित दो महीने की अवधि के भीतर अपील दायर करने में विफल रहे। बाद में, जब कंपनी अधिनियम, 2013 आंशिक रूप से लागू हुआ, तो प्रतिवादी ने 7 फरवरी 2014 को CLB के समक्ष नए अधिनियम की धारा 58(3) के तहत अपील दायर की और साथ ही 249 दिनों की देरी को माफ करने के लिए एक आवेदन भी दिया।
CLB ने 27 मई 2016 को देरी माफी के आवेदन को स्वीकार कर लिया। CLB का कहना था कि देरी प्रक्रियात्मक भ्रम और प्रतिवादी के विदेश में रहने के कारण हुई थी और न्याय के हित में “तकनीकी आधार” बाधा नहीं बनने चाहिए। कलकत्ता हाईकोर्ट ने 16 दिसंबर 2016 को इस निर्णय की पुष्टि की थी।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात का विस्तृत विश्लेषण किया कि क्या CLB के पास लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत आवेदन पर विचार करने का अधिकार था या नहीं।
1. अर्ध-न्यायिक निकायों पर लिमिटेशन एक्ट की प्रयोज्यता: पीठ ने इस स्थापित कानूनी स्थिति को दोहराया कि लिमिटेशन एक्ट, 1963 केवल “अदालतों” (Courts) पर लागू होता है, न कि अर्ध-न्यायिक निकायों या ट्रिब्यूनल पर, जब तक कि उन पर शासन करने वाला विशेष कानून स्पष्ट रूप से इसका प्रावधान न करे। टाउन म्युनिसिपल काउंसिल, अथानी (1969) और ऑफ़िसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (लैंड एक्विजिशन) (1996) जैसे निर्णयों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने पाया कि CLB केवल सीमित उद्देश्यों के लिए ही एक अदालत थी, जिसमें देरी को माफ करने की शक्ति शामिल नहीं थी।
2. धारा 5 और धारा 14 के बीच अंतर: अदालत ने धारा 5 (समय का विस्तार) और धारा 14 (समय का बहिष्करण/Exclusion) के बीच महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया:
- धारा 14: यह अनिवार्य प्रकृति की है और परिसीमा अवधि की गणना से संबंधित है। यह वादी के अधिकार को बहाल करती है जैसे कि गलत फोरम में हुई कार्यवाही कभी हुई ही नहीं थी।
- धारा 5: यह विवेकाधीन (discretionary) है और “पर्याप्त कारण” दिखाने पर निर्धारित अवधि को स्वयं बढ़ाती है।
कोर्ट ने कहा:
“अधिनियम, 1963 की धारा 5 और 14 के अंतर्निहित सिद्धांतों को अर्ध-न्यायिक निकायों के समक्ष कार्यवाही पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता… धारा 5 के तहत परिकल्पित तंत्र उस विवेक से बंधा है जिसके साथ एक दीवानी अदालत (civil court) को सशक्त किया गया है।”
3. धारा 433 का पूर्वव्यापी लागू न होना: सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 433 को पूर्वव्यापी रूप से लागू किया जाना चाहिए। कोर्ट ने नोट किया कि धारा 433, 1 जून 2016 को NCLT के गठन के साथ लागू हुई थी। संक्रमण काल (12.09.2013 से 01.06.2016) के दौरान, CLB पुराने ढांचे के तहत कार्य कर रही थी, जिसने उसे देरी को माफ करने का अधिकार नहीं दिया था।
कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
“प्रतिवादी का उपचार (remedy) कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 433 के लागू होने की तो बात ही छोड़िए, धारा 58(3) के लागू होने (12.09.2013) से बहुत पहले ही समाप्त (dead) हो चुका था।”
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि CLB के पास 249 दिनों की देरी को माफ करने का कोई अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) नहीं था। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने CLB के आदेश को बरकरार रखकर गलती की। शीर्ष अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए आक्षेपित निर्णय को रद्द कर दिया।
केस विवरण
- केस टाइटल: द प्रॉपर्टी कंपनी (प्रा) लिमिटेड बनाम रोहिंटन डैडी मज़्दा
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 92 ऑफ 2026 (एस.एल.पी (सिविल) संख्या 3906 ऑफ 2017 से उद्भूत)
- कोरम: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन

