छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर 7 रूल 11(d) के तहत किसी वाद-पत्र (Plaint) को परिसीमा (Limitation) के आधार पर तब खारिज किया जा सकता है, जब वाद-पत्र में दिए गए बयानों से ही यह स्पष्ट हो जाए कि मामला कानून द्वारा वर्जित है। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि ‘ऑर्डर 7 रूल 11(d)’ के अर्थ के भीतर ‘विधि’ (Law) शब्द में परिसीमा का कानून भी शामिल है।
जस्टिस बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने भोजराम द्वारा दायर दूसरी अपील (SA No. 502/2023) को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के उन आदेशों को चुनौती दी थी जिसमें उसके वाद-पत्र को खारिज कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता/वादी भोजराम ने एक दीवानी मुकदमा दायर कर 13 अप्रैल 1977 के एक सेल डीड (बिक्री विलेख) को अवैध, शून्य और अपने ऊपर बाध्यकारी न होने की घोषणा करने की मांग की थी। यह विवाद दुर्ग जिले के ग्राम पथरिया की 50 डेसीमल भूमि (खसरा नंबर 789) से संबंधित था। इसके साथ ही उसने कब्जे और स्थायी निषेधाज्ञा की भी मांग की थी।
वादी का मुख्य तर्क यह था कि यह भूमि मूल रूप से उसके दिवंगत पिता सोनाराम की थी। उसने दावा किया कि उसके पिता ने प्रतिवादी नंबर 1 (जनरल मैनेजर, एसोसिएटेड सीमेंट कंपनी) के पक्ष में केवल 20 साल के लिए 1,100 रुपये के प्रतिफल में लीज एग्रीमेंट किया था, न कि पूर्ण बिक्री। वादी के अनुसार, प्रतिवादियों ने भूस्वामियों की जानकारी के बिना धोखाधड़ी से सेल डीड बनवा ली। वादी का कहना था कि उसे सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से दस्तावेजों के मिलने पर इस गड़बड़ी का पता चला और लीज अवधि समाप्त होने के बाद जमीन वापस मिलनी चाहिए थी।
पक्षों के तर्क
प्रतिवादियों की ओर से: प्रतिवादी नंबर 1 (सीमेंट कंपनी) ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वे वैध बिक्री के बाद संपत्ति के पूर्ण मालिक बन गए हैं। उनकी दलील थी कि सेल डीड दशकों पहले निष्पादित हो चुकी थी और वादी का दावा “पूरी तरह से समय-बाधित” (Grossly Time-Barred) है। प्रतिवादी ने ऑर्डर 7 रूल 11 CPC के तहत आवेदन दायर कर कहा कि मुकदमा कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।
राज्य सरकार और खनन अधिकारी (प्रतिवादी 2 और 3) ने संयुक्त जवाब में कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में कंपनी का नाम दर्ज है और उसी आधार पर खनिज पट्टे का नवीनीकरण किया गया था। उन्होंने खुद को इस मुकदमे के लिए आवश्यक पक्ष मानने से इनकार कर दिया।
अपीलकर्ता की ओर से: अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने परिसीमा के बिंदु पर कोई इश्यू (विवादक) तय किए बिना या उचित ट्रायल किए बिना मुकदमे को शुरुआती स्तर पर खारिज करके गलती की है। उन्होंने दलील दी कि परिसीमा का प्रश्न साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद ही तय किया जाना चाहिए था और इस संबंध में हाईकोर्ट के पूर्व फैसले ‘मेहुल कुमार पटेल बनाम ऋषिकेश गुप्ता’ का हवाला दिया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत दोनों ने सही पाया था कि वादी का दावा परिसीमा कानून द्वारा वर्जित है। कोर्ट ने नोट किया कि 1977 में निष्पादित सेल डीड को वादी ने पहली बार 19 जुलाई 2018 को चुनौती दी, जो कि बिक्री के दशकों बाद का समय है।
ऑर्डर 7 रूल 11(d) के दायरे पर जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने कहा:
“ऑर्डर 7 रूल 11(d) अदालतों को वाद-पत्र खारिज करने का अधिकार देता है यदि वह किसी कानून द्वारा वर्जित प्रतीत होता है। इसमें वे स्थितियां शामिल हो सकती हैं जहां मुकदमे में कार्रवाई का कोई वैध कारण (Cause of Action) न हो या वह समय-बाधित हो। मुख्य सिद्धांत यह है कि अस्वीकृति केवल वाद-पत्र के भीतर के बयानों पर आधारित होनी चाहिए, बिना बाहरी साक्ष्यों या विवादित तथ्यों की गहराई में जाए।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:
“ऑर्डर 7 रूल 11(d) का अंतर्निहित उद्देश्य यह है कि यदि मुकदमा इस प्रावधान के तहत परिसीमा द्वारा वर्जित है, तो कोर्ट वादी को मुकदमे की कार्यवाही को अनावश्यक रूप से खींचने की अनुमति नहीं देगा। ऐसे मामले में, बनावटी मुकदमेबाजी (Sham Litigation) को समाप्त करना आवश्यक है ताकि न्यायिक समय बर्बाद न हो।”
कोर्ट ने हार्डेश ओर्स (पी) लिमिटेड बनाम हेडे एंड कंपनी (2007) मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए दोहराया कि परिसीमा कानून भी ऑर्डर 7 रूल 11(d) के तहत ‘विधि’ का हिस्सा है।
अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता CPC की धारा 100 के तहत किसी भी “कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न” (Substantial Question of Law) को उठाने में विफल रहा है। कोर्ट ने कहा कि जब तक तथ्यों के निष्कर्ष विकृत न हों, तब तक दूसरी अपील में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा:
“मुझे इस अपील में कोई योग्यता नजर नहीं आती, क्योंकि इसमें कानून का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल नहीं है और यह तथ्य कि वाद-पत्र में किए गए दावों के आधार पर ही मुकदमा परिसीमा द्वारा वर्जित है, स्पष्ट है। दोनों निचली अदालतों द्वारा पारित निर्णय उचित और कानूनी प्रतीत होते हैं।”
नतीजतन, हाईकोर्ट ने दूसरी अपील को खारिज कर दिया और ट्रायल कोर्ट के साथ-साथ अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
केस विवरण:
- केस टाइटल: भोजराम बनाम जनरल मैनेजर एसोसिएटेड सीमेंट कंपनी व अन्य
- केस नंबर: SA No. 502 of 2023
- पीठ: जस्टिस बिभु दत्त गुरु
- दिनांक: 27 मार्च, 2026

