NDPS एक्ट की धारा 52-A का अनुपालन न होना अभियोजन के लिए घातक नहीं, यदि अन्य सबूतों से बरामदगी साबित हो: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि एनडीपीएस एक्ट, 1985 (NDPS Act) की धारा 52-A के तहत निर्धारित प्रक्रियात्मक खामियां या अनुपालन में कमी, अपने आप में मुकदमे को रद्द करने या आरोपी को बरी करने का आधार नहीं बन सकतीं, यदि अन्य साक्ष्य विश्वसनीय रूप से मादक पदार्थों की बरामदगी और कब्जे को स्थापित करते हैं।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायाधीश रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने यह टिप्पणी तीन दोषियों (विकास कुमार राय, अमृत कुमार साहू और साजन यादव) की अपीलों को खारिज करते हुए और राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) द्वारा एक अन्य आरोपी (पवन यादव) की रिहाई के खिलाफ दायर अपील को भी खारिज करते हुए की।

मामले की पृष्ठभूमि

DRI को 11 नवंबर, 2020 को एक गुप्त सूचना मिली थी कि ओडिशा से उत्तर प्रदेश के लिए एक कंटेनर ट्रक (CG 08 L 3166) के जरिए भारी मात्रा में गांजा ले जाया जा रहा है। अभनपुर के पास ट्रक को रोकने पर तलाशी ली गई। जांच के दौरान ट्रक के केबिन के भीतर प्लाईवुड के पीछे विशेष रूप से बनाए गए एक गुप्त कक्ष (Secret Chamber) से 155 पैकेटों में 697.255 किलोग्राम गांजा बरामद हुआ।

ट्रक में सवार विकास कुमार राय, अमृत कुमार साहू और पंकज कुमार राय (जिनकी सुनवाई के दौरान मृत्यु हो गई) को गिरफ्तार किया गया। जांच में ट्रक मालिक साजन यादव और उसके भाई पवन यादव का नाम भी सामने आया। ट्रायल कोर्ट ने ट्रक सवारों और मालिक को दोषी ठहराया था, जबकि पवन यादव को बरी कर दिया गया था।

READ ALSO  हाईकोर्ट ने मुस्लिम दंपत्ति को अजन्मे हिंदू बच्चे को गोद लेने की अनुमति देने से किया इनकारः हाईकोर्ट

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ताओं (दोषियों) की ओर से: दोषियों के वकीलों ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में काफी विरोधाभास है और NDPS एक्ट की अनिवार्य धाराओं, विशेष रूप से धारा 42, 52-A, 55 और 57 का पालन नहीं किया गया। उन्होंने तर्क दिया कि मादक पदार्थ पर “सचेत कब्जे” (Conscious Possession) को साबित नहीं किया जा सका है। ट्रक ड्राइवर ने दलील दी कि उसे गुप्त केबिन के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और उसे केवल ड्राइविंग के लिए काम पर रखा गया था।

DRI की ओर से: DRI ने दलील दी कि अभियोजन ने अपना मामला संदेह से परे साबित किया है। पवन यादव की रिहाई के खिलाफ तर्क देते हुए DRI ने कहा कि वह उस ढाबे का संचालन कर रहा था जहाँ ट्रक में गुप्त केबिन तैयार किया गया था और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) के माध्यम से उसकी संलिप्तता स्पष्ट है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने NDPS एक्ट की प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं का बारीकी से परीक्षण किया। तलाशी और जब्ती के संबंध में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि जब्ती “सार्वजनिक स्थान” या “ट्रांजिट” के दौरान हुई थी, इसलिए यहाँ धारा 42 के बजाय धारा 43 के प्रावधान लागू होते हैं।

READ ALSO  कोर्ट प्रमोशन के लिए कोई नई योग्यता तय नहीं कर सकता, जो नियमों के तहत निर्धारित नहीं है: इलाहाबाद हाई कोर्ट

धारा 52-A (इन्वेंट्री और सैंपलिंग प्रक्रिया) के उल्लंघन के मुद्दे पर, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ‘भारत आम्बले बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2025)’ का उल्लेख किया। हाईकोर्ट ने कहा:

“एनडीपीएस एक्ट की धारा 52-A के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन न करना या देरी से पालन करना, अपने आप में अभियोजन के मामले के लिए घातक नहीं होगा, जब तक कि भौतिक साक्ष्यों में ऐसी विसंगतियां न हों जो इस प्रक्रिया के पालन से दूर की जा सकती थीं।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 52-A एक प्रक्रियात्मक प्रावधान है और यह साक्ष्य के नियमों को पूरी तरह से सीमित नहीं करता है। यदि रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सामग्री “न्यायालय में विश्वास जगाती है और बरामदगी तथा कब्जे के संबंध में संतुष्ट करती है,” तो प्रक्रियात्मक कमियों के बावजूद सजा बरकरार रखी जा सकती है।

ड्राइवर की अनभिज्ञता की दलील को खारिज करते हुए डिवीजन बेंच ने कहा:

“एक ड्राइवर वाहन के नियंत्रण में होता है और उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसकी संरचनात्मक विशेषताओं और स्थिति से अवगत हो… यह स्वीकार करना कठिन है कि केबिन में इतना बड़ा बदलाव उस ड्राइवर की नज़र से बच जाएगा जो लंबी दूरी तक वाहन चला रहा था।”

पवन यादव को बरी किए जाने के संबंध में हाईकोर्ट ने पाया कि उसके पास से कोई प्रतिबंधित पदार्थ बरामद नहीं हुआ था। उसे मुख्य रूप से सह-आरोपियों के धारा 67 के तहत दिए गए बयानों के आधार पर आरोपी बनाया गया था, जो “स्वतंत्र पुष्टि के अभाव में सजा का एकमात्र आधार नहीं बन सकते।”

READ ALSO  वकील ने कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया, जस्टिस एचपी संदेश को उनके स्थानांतरण की धमकी पर सुरक्षा की मांग की

निर्णय

हाईकोर्ट ने विकास कुमार राय, अमृत कुमार साहू और साजन यादव की दोषसिद्धि और 10 साल के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा। साथ ही, पवन यादव को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, क्योंकि अभियोजन उसके खिलाफ ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा था।

हाईकोर्ट ने अपने हेडनोट में निष्कर्ष निकाला:

“एनडीपीएस एक्ट की धारा 52-A का अनुपालन न होना अभियोजन के मामले के लिए स्वतः घातक नहीं है। यदि कुल साक्ष्य विश्वसनीय रूप से मादक पदार्थों की बरामदगी और कब्जे को स्थापित करते हैं, तो सजा को बरकरार रखा जा सकता है।”

केस विवरण:

  • हाईकोर्ट: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर
  • केस शीर्षक: * विकास कुमार राय और अन्य बनाम राजस्व खुफिया निदेशालय (CRA No. 1495 of 2024)
    • राजस्व खुफिया निदेशालय बनाम श्री पवन यादव (ACQA No. 247 of 2025)
    • साजन यादव बनाम राजस्व खुफिया निदेशालय (CRA No. 2595 of 2025)
  • बेंच: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायाधीश रवींद्र कुमार अग्रवाल
  • दिनांक: 24 मार्च, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles