छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायगढ़ लेबर कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एकतरफा (ex-parte) दिए गए फैसले को वापस लेने के आवेदनों को खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पक्ष अपनी अनुपस्थिति का उचित कारण प्रस्तुत करता है, तो लेबर कोर्ट के पास एकतरफा कार्यवाही जारी रखने का अधिकार क्षेत्र नहीं रह जाता। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को सुनिश्चित करने के लिए ऐसे आदेश को रद्द करना आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद उमेश कुमार चौहान नामक एक कर्मचारी द्वारा सुपीरियर फायर एंड सिक्योरिटी सर्विसेज (SFSS) और जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड के खिलाफ दायर दावे से शुरू हुआ था। चौहान का आरोप था कि वह दिसंबर 2008 से डिप्टी सिक्योरिटी ऑफिसर के रूप में कार्यरत थे और 20 नवंबर 2020 को उन्हें ‘कम वजन’ होने के आधार पर अवैध रूप से सेवा से निकाल दिया गया। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने एक कैलेंडर वर्ष में 240 दिनों की निरंतर सेवा पूरी की थी और उनकी बर्खास्तगी औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25-F का उल्लंघन थी।
मामले की सुनवाई के दौरान, लेबर कोर्ट ने 17 अगस्त 2022 को नियोक्ताओं के खिलाफ एकतरफा कार्यवाही का आदेश दिया। इसके बाद, 10 दिसंबर 2022 को कोर्ट ने बर्खास्तगी को अवैध ठहराते हुए कर्मचारी को बिना पिछले वेतन के बहाल करने का निर्देश दिया।
अपीलकर्ताओं का तर्क था कि उन्हें इस आदेश की जानकारी 29 मार्च 2023 को तब हुई जब उन्हें रजिस्टर्ड पोस्ट से इसकी कॉपी मिली। उन्होंने औद्योगिक विवाद (केंद्रीय) नियम, 1957 के नियम 10B(9) और नियम 24 के साथ पठित सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश IX नियम 13 के तहत आवेदन दायर किए। लेबर कोर्ट द्वारा 25 जुलाई 2025 को इन आवेदनों को खारिज किए जाने के बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि 17 अगस्त 2022 को अपनाई गई प्रक्रिया “पूरी तरह से अनियमित” थी। उन्होंने बताया कि उस दिन कोर्ट ने पहले यह दर्ज किया था कि नोटिस की सर्विस रिपोर्ट का इंतजार है और मामले को 8 सितंबर के लिए टाल दिया। लेकिन उसी दिन शाम 5:00 बजे, कर्मचारी के वकील के अनुरोध पर कोर्ट ने दोबारा सुनवाई की और पोस्टल ट्रैक रिपोर्ट के आधार पर कंपनियों को एकतरफा घोषित कर दिया। कंपनियों का दावा था कि उन्हें कभी कोई नोटिस मिला ही नहीं था।
जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड की ओर से यह भी दलील दी गई कि कर्मचारी कभी उनके यहाँ कार्यरत ही नहीं था और कंपनी इस विवाद में आवश्यक पक्ष (necessary party) भी नहीं थी।
दूसरी ओर, प्रतिवादी (कर्मचारी) के वकील ने कहा कि वह विधिवत कार्यरत था और लेबर कोर्ट का आदेश कानूनन सही है, जिसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने कोर्ट की कार्यवाही के रिकॉर्ड (order sheets) की जांच की और पाया कि इसमें गंभीर प्रक्रियात्मक चूक हुई थी। हाईकोर्ट ने गौर किया कि जब लेबर कोर्ट ने शुरू में सर्विस रिपोर्ट का इंतजार करने का निर्णय लिया था, तो उसी दिन बाद में बिना किसी ठोस पुष्टि के अपने रुख को बदलना गलत था।
कोर्ट ने जनरल क्लॉज एक्ट, 1897 की धारा 27 का हवाला देते हुए टिप्पणी की:
“डाक द्वारा तामील (service) का अनुमान केवल तभी लगाया जा सकता है जब यह साबित हो कि दस्तावेज को सही पते पर, पर्याप्त डाक शुल्क के साथ रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा गया है… एक पुख्ता सर्विस रिपोर्ट की अनुपस्थिति में और यह दर्ज किए बिना कि नोटिस विधिवत तामील हो गया था, लेबर कोर्ट ‘डीम्ड सर्विस’ (माना गया तामील) का सहारा नहीं ले सकता था।”
सुप्रीम कोर्ट के ग्रिंडलेज़ बैंक लिमिटेड बनाम सेंट्रल गवर्नमेंट इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल (1980) मामले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने जोर दिया:
“यदि अनुपस्थिति का ऐसा पर्याप्त कारण दिखाया गया है जिसने किसी पक्ष को उपस्थित होने से रोका हो, तो ट्रिब्यूनल के पास एकतरफा कार्यवाही करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होगा और परिणामस्वरूप, उसके पास एकतरफा फैसले को रद्द करने की शक्ति होना अनिवार्य है।”
जस्टिस गुरु ने कहा कि जिस दिन कोर्ट ने स्वयं सर्विस रिपोर्ट का इंतजार करने की बात कही, उसी दिन एकतरफा कार्यवाही करना “सुनवाई के उचित अवसर से वंचित करने” जैसा है। उन्होंने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत होने वाले निर्णयों में पक्षों के मूल्यवान अधिकारों का निर्धारण होता है, इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन होना चाहिए।
फैसला
हाईकोर्ट ने 25 जुलाई 2025 के आदेश को रद्द करते हुए एकतरफा फैसले को वापस लेने के आवेदनों को स्वीकार कर लिया। मामले को नए सिरे से विचार के लिए लेबर कोर्ट, रायगढ़ वापस भेज दिया गया है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को 29 अप्रैल 2026 को लेबर कोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया है ताकि मामले का गुण-दोष के आधार पर जल्द निपटारा हो सके।

