अगर पहला पति या पत्नी जीवित है तो दूसरी शादी कानूनन शून्य, ‘चूड़ी’ प्रथा हिंदू विवाह अधिनियम से ऊपर नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि विवाह के समय किसी पक्ष का पति या पत्नी जीवित है, तो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5(i) के उल्लंघन में किया गया विवाह शुरू से ही शून्य (void ab initio) माना जाएगा। कोर्ट ने साफ किया कि प्रचलित ‘चूड़ी’ प्रथा किसी ऐसे विवाह को वैधता प्रदान नहीं कर सकती जो वैधानिक कानून के तहत अवैध है, और न ही केवल राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Entries) में नाम दर्ज होने से संपत्ति का कोई मौलिक अधिकार प्राप्त होता है।

जस्टिस विभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने मृतक भू-स्वामी की बेटी द्वारा दायर दूसरी अपील (Second Appeal) को स्वीकार करते हुए प्रथम अपीलीय न्यायालय के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें प्रथागत विवाह और राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर दूसरी शादी को वैध ठहराया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद ग्राम धनेली में स्थित स्वर्गीय सग्नूराम की कृषि भूमि से संबंधित था। सग्नूराम की पहली पत्नी, निकमी बाई का निधन हो गया था, जिनसे उनकी एक बेटी, श्रीमती सूरज बाई (अपीलकर्ता/प्रतिवादी नंबर 1) थी।

दावा किया गया था कि मुकदमे से लगभग 37 साल पहले, सग्नूराम ने ‘चूड़ी’ प्रथा के माध्यम से एक विधवा, ग्वालिन बाई को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। वादीगण, श्रीमती हिरन बाई और श्रीमती सुखिया बाई ने दावा किया कि वे ग्वालिन बाई और सग्नूराम की बेटियां हैं। सग्नूराम (1987) और ग्वालिन बाई (1988) की मृत्यु के बाद, वादीगण ने खुद को कानूनी वारिस बताते हुए संपत्ति में स्वत्व की घोषणा, बंटवारा और कब्जे की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया।

अपीलकर्ता सूरज बाई ने इस मुकदमे का विरोध किया और कहा कि वादीगण सग्नूराम की बेटियां नहीं हैं, बल्कि वे ग्वालिन बाई के पिछले रिश्तों से जन्मी संतानें हैं। उन्होंने दलील दी कि सग्नूराम के साथ कथित जुड़ाव के समय ग्वालिन बाई का पति जीवित था, इसलिए उनके बीच कोई वैध विवाह अस्तित्व में नहीं था।

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ट्रायल कोर्ट ने वादीगण द्वारा वैध विवाह साबित न कर पाने के कारण मुकदमा खारिज कर दिया था। हालांकि, प्रथम अपीलीय न्यायालय ने इस फैसले को पलट दिया और माना कि ‘चूड़ी’ विवाह वैध था और वादीगण संपत्ति में हिस्से के हकदार थे। इसी आदेश के खिलाफ सूरज बाई ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (प्रतिवादी): अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मनोज परांजपे ने तर्क दिया कि प्रथम अपीलीय न्यायालय ने ग्वालिन बाई को कानूनी रूप से विवाहित पत्नी मानकर गंभीर त्रुटि की है। उन्होंने कहा:

  • सग्नूराम के साथ कथित ‘चूड़ी’ विवाह के समय ग्वालिन बाई का पूर्व पति जीवित था।
  • पहले पति से वैध तलाक का कोई सबूत पेश नहीं किया गया।
  • कोई भी प्रथा हिंदू विवाह अधिनियम के तहत द्विविवाह (Bigamy) के निषेध को दरकिनार नहीं कर सकती।
  • वैध विवाह के अभाव में केवल राजस्व प्रविष्टियां संपत्ति का अधिकार नहीं देतीं।

उत्तरवादी (वादीगण): उत्तरदाताओं के वकील ने अपीलीय न्यायालय के फैसले का समर्थन करते हुए तर्क दिया कि सग्नूराम ने सामाजिक रीति-रिवाजों (चूड़ी) के अनुसार विवाह किया था और सामुदायिक भोज भी दिया गया था। उन्होंने कहा कि चूंकि ग्वालिन बाई अपनी मृत्यु तक सग्नूराम के साथ पत्नी के रूप में रहीं, इसलिए वादीगण उनकी संपत्ति के उत्तराधिकारी बनने के हकदार हैं।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने कानून के इस सारवान प्रश्न पर विचार किया: “क्या निचला अपीलीय न्यायालय यह मानने में न्यायसंगत नहीं था कि ग्वालिन बाई सग्नूराम की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी थीं और क्या इस संबंध में निष्कर्ष विकृत (perverse) है?”

1. जीवित विवाह की स्वीकृति: कोर्ट ने वादी नंबर 1 (PW-1), हिरन बाई की गवाही पर गंभीरता से विचार किया। अपनी जिरह (cross-examination) में, उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि “जिस समय सग्नूराम ने उनकी मां ग्वालिन बाई के साथ कथित ‘चूड़ी’ विवाह किया था, उस समय ग्वालिन बाई का पहला पति जीवित था।” उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उन्हें किसी तलाक की जानकारी नहीं है।

2. शून्य विवाह पर कानूनी स्थिति: जस्टिस गुरु ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5(i) और धारा 11 का उल्लेख किया, जो यह निर्धारित करते हैं कि यदि विवाह के समय किसी भी पक्ष का जीवनसाथी जीवित है, तो वह विवाह अकृत और शून्य (null and void) होगा।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“महज ‘चूड़ी’ विवाह का दावा करना या साथ रहना (cohabitation) किसी ऐसे विवाह को वैध नहीं बना सकता जो कानूनन शून्य है।”

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3. पूर्व निर्णयों का हवाला: फैसले में सुप्रीम कोर्ट के श्रीमती यमुनाबाई अनंतराव अधव बनाम अनंतराव शिवराम अधव और अन्य (1988) के निर्णय का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि धारा 5(i) का उल्लंघन करने वाला विवाह पूरी तरह से अमान्य है।

रीति-रिवाजों को साबित करने के बोझ के संबंध में, कोर्ट ने रत्नागिरी नगर परिषद बनाम गंगाराम नारायण अम्बेकर (2020) और दिल्ली हाईकोर्ट के सुषमा बनाम रतन दीप (2025) के फैसलों का उल्लेख करते हुए दोहराया कि जो पक्ष वैधानिक कानून से अलग किसी प्रथा का दावा करता है, उसे साबित करने का भार उसी पर होता है।

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फैसला

हाईकोर्ट ने दूसरी अपील को स्वीकार करते हुए कानून के प्रश्न का उत्तर अपीलकर्ता के पक्ष में दिया।

कोर्ट ने निर्णय सुनाया:

“अधिनियम, 1955 की धारा 5(i) और 11 में दी गई शर्तों को देखते हुए, यह माना जाता है कि चूंकि ग्वालिन बाई का पहला पति जीवित था… उक्त बाद वाला विवाह कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं है और वह एक शून्य विवाह है।”

नतीजतन, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, बालोद द्वारा पारित 29.01.2005 के निर्णय और डिक्री को रद्द कर दिया गया, और ट्रायल कोर्ट द्वारा मुकदमा खारिज करने के फैसले को बहाल रखा गया।

केस विवरण

  • केस टाइटल: श्रीमती सूरज बाई बनाम श्रीमती हिरन बाई और अन्य
  • केस नंबर: SA No. 116 of 2008
  • कोरम: जस्टिस विभु दत्त गुरु
  • अपीलकर्ता के वकील: श्री मनोज परांजपे, वरिष्ठ अधिवक्ता (साथ में सुश्री शिवांगी अग्रवाल)
  • उत्तरदाताओं के वकील: श्री वीरेंद्र सोनी (साथ में श्री अंकुश सोनी); श्री संतोष सोनी (सरकारी अधिवक्ता)

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