दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने दादा की संपत्ति में हिस्से की मांग करने वाली एक पोती द्वारा दायर बंटवारे (पार्टिशन) के मुकदमे को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मुकदमा परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) के तहत बाधित (barred) है और 1978 में हुए मौखिक पारिवारिक समझौते को कानूनी रूप से वैध माना गया है।
न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने नीलू चड्ढा बनाम सुनील सेठी और अन्य (2026:DHC:655) के मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एक प्राकृतिक संरक्षक (Natural Guardian) द्वारा अदालत की अनुमति के बिना नाबालिग की ओर से किया गया संपत्ति का लेन-देन ‘शून्य’ (void) नहीं, बल्कि ‘शून्यकरणीय’ (voidable) होता है। इसे बालिग होने के बाद निर्धारित समय सीमा के भीतर चुनौती दी जानी चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद सी-99, आनंद निकेतन, नई दिल्ली स्थित एक संपत्ति को लेकर था, जो मूल रूप से स्वर्गीय ज्योति स्वरूप सेठी के नाम पर थी। वादी (Plaintiff), नीलू चड्ढा, स्वर्गीय सतीश सेठी की बेटी हैं, जो ज्योति स्वरूप सेठी के पुत्रों में से एक थे।
तथ्यों के अनुसार, 1972 में ज्योति स्वरूप सेठी का बिना वसीयत के निधन हो गया था। उनके पीछे उनकी पत्नी वेद सेठी और तीन बेटे – सुनील सेठी (प्रतिवादी संख्या 1), अनिल सेठी (प्रतिवादी संख्या 2), और सतीश सेठी (वादी के पिता) थे। सतीश सेठी का 1977 में निधन हो गया, जिसके बाद वादी, उसका भाई और उनकी मां (प्रतिवादी संख्या 3) वारिस के रूप में रह गए।
वादी का आरोप था कि पिता की मृत्यु के बाद उनके साथ बुरा व्यवहार किया गया और उन्हें संपत्ति से बाहर निकाल दिया गया। उन्होंने दावा किया कि प्रतिवादी संख्या 1 और 2 ने गलत तरीके से संपत्ति का नामांतरण (Mutation) अपने नाम करवा लिया और 2007 में कन्वेंस डीड (Conveyance Deed) भी अपने पक्ष में करवा ली। वादी ने बंटवारे की डिक्री और दस्तावेजों को अवैध घोषित करने की मांग की थी।
पक्षों की दलीलें
वादी का तर्क: वादी की ओर से तर्क दिया गया कि कोई वैध बंटवारा नहीं हुआ था। हिंदू अवयस्क और संरक्षकता अधिनियम, 1956 (HMGA) की धारा 8 का हवाला देते हुए कहा गया कि 1978 का कथित मौखिक पारिवारिक समझौता उन पर लागू नहीं हो सकता क्योंकि उस समय वह नाबालिग थीं और इसके लिए अदालत की अनुमति नहीं ली गई थी।
इसके अलावा, यह भी कहा गया कि 12 दिसंबर 1978 की रिलीज डीड (Release Deed) पंजीकृत नहीं थी, इसलिए पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 49 के तहत यह साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है।
प्रतिवादियों का तर्क: प्रतिवादी संख्या 1 और 2 की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार ने दलील दी कि 23 सितंबर 1978 को संपत्ति का मौखिक रूप से बंटवारा हो गया था। आनंद निकेतन की संपत्ति प्रतिवादी संख्या 1, 2 और उनकी मां के हिस्से में आई थी, जबकि सेवा नगर स्थित एक व्यावसायिक संपत्ति वादी के परिवार (उनकी मां द्वारा प्रतिनिधित्व) के हिस्से में आई थी।
प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि मुकदमा परिसीमा अधिनियम, 1963 के अनुच्छेद 60 के तहत समय-बाधित है, जो एक संरक्षक द्वारा किए गए संपत्ति हस्तांतरण को रद्द करने के लिए बालिग होने के बाद तीन साल की समय सीमा निर्धारित करता है। चूंकि वादी 1993 में बालिग हो गई थीं, इसलिए चुनौती देने की समय सीमा 1996 में समाप्त हो चुकी थी।
न्यायालय का विश्लेषण और निष्कर्ष
परिसीमा और जानकारी: हाईकोर्ट ने घोषणा (Declaration) की प्रार्थना के संबंध में परिसीमा के मुद्दे की जांच की। वादी ने दावा किया था कि उन्हें नामांतरण की जानकारी 14 अगस्त 2014 को मिली। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि वादी ने 29 जुलाई 2014 को ही एक अभ्यावेदन (Representation) दिया था, जिसमें उन्होंने कथित धोखाधड़ी का विवरण दिया था।
न्यायमूर्ति कौरव ने कहा:
“उक्त दस्तावेज का अवलोकन स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वादी को विवादित नामांतरण की जानकारी 14.08.2014 से पहले थी… प्रतिवादियों ने यह सिद्ध कर दिया है कि वादी द्वारा बताई गई जानकारी की तारीख रिकॉर्ड के विपरीत है।”
परिणामस्वरूप, कोर्ट ने घोषणा की राहत को समय-बाधित माना। हालांकि, बंटवारे के लिए कोर्ट ने विद्या देवी बनाम प्रेम प्रकाश मामले का हवाला देते हुए कहा कि विभाजन के वाद के लिए कानून में कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है, लेकिन तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
धारा 8 (HMGA) और मौखिक बंटवारे की वैधता: कोर्ट ने वादी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि 1978 का बंटवारा अवैध था क्योंकि वह नाबालिग थीं। HMGA की धारा 8(3) की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे लेन-देन ‘शून्यकरणीय’ (voidable) होते हैं, ‘शून्य’ (void) नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के विश्वंभर बनाम लक्ष्मीनारायण फैसले का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा:
“शून्य और शून्यकरणीय दस्तावेजों/लेन-देन के बीच एक स्पष्ट न्यायिक अंतर है। एक शून्यकरणीय लेन-देन तब तक वैध रहता है जब तक उसे रद्द न किया जाए। इसे रद्द करने के लिए वादी को परिसीमा अवधि के भीतर कार्रवाई करनी चाहिए थी।”
चूंकि वादी 1993 में बालिग हो गई थीं, उन्हें 1996 तक चुनौती देनी चाहिए थी। 2014 में मुकदमा दायर करना बहुत देर थी।
अपंजीकृत दस्तावेजों की स्वीकार्यता: अपंजीकृत रिलीज डीड के बारे में कोर्ट ने कहा कि इसे मौखिक बंटवारे को साबित करने के लिए ‘संपार्श्विक उद्देश्य’ (collateral purpose) के लिए साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
वादी के परिवार का आचरण: कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि वादी की मां ने उनके हिस्से में आई व्यावसायिक संपत्ति को किसी तीसरे पक्ष को बेच दिया था। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“इस पहलू पर उनकी स्पष्ट चुप्पी वास्तव में वर्तमान दावे की नेकनीयती (bona fide) पर सवाल उठाती है।”
निर्णय
दिल्ली हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादियों ने रसीदों और रिलीज डीड सहित ठोस दस्तावेजों के माध्यम से 1978 के मौखिक बंटवारे को सफलतापूर्वक साबित किया है। चूंकि संपत्ति का पहले ही बंटवारा हो चुका था और वादी के पक्ष ने उस पर अमल भी किया था, इसलिए दोबारा बंटवारे का प्रश्न ही नहीं उठता।
न्यायमूर्ति कौरव ने फैसला सुनाते हुए कहा:
“संयुक्तता (jointness) के प्रमाण के अभाव में, विवादित संपत्ति के बंटवारे का कोई प्रश्न नहीं है। नतीजतन, बंटवारे की प्रार्थना बिना किसी वाद कारण (cause of action) के है।”
तदनुसार, मुकदमा खारिज कर दिया गया।
केस विवरण:
केस शीर्षक: नीलू चड्ढा बनाम सुनील सेठी और अन्य
केस संख्या: CS(OS) 2046/2015 और I.A. 14119/2015

