कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक गैर-हस्ताक्षरकर्ता (Non-signatory) डायरेक्टर के खिलाफ निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (NI) एक्ट के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यदि शिकायत में किसी व्यक्ति की विशिष्ट भूमिका के बारे में “पूर्ण चुप्पी” (Total silence) है, तो यह क्षेत्राधिकार संबंधी कमी (Jurisdictional void) मानी जाएगी। जस्टिस उदय कुमार ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रक्रियात्मक देरी या लेचेस (Laches) उस समन आदेश को वैध नहीं बना सकते जो बुनियादी तथ्यों के अभाव में त्रुटिपूर्ण हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मसूद तारिफ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य से संबंधित है। इसकी शुरुआत 2013 के एक व्यावसायिक लेनदेन से हुई थी, जिसमें शिकायतकर्ता मेसर्स गर्वित कंसल्टेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड ने मेसर्स अमृत फीड्स लिमिटेड (आरोपी नंबर 1) को ₹40,00,000 का ऋण दिया था। डिफॉल्ट और दिवालियापन कार्यवाही के बाद, 20 फरवरी 2018 को एक ‘सेटलमेंट एग्रीमेंट’ हुआ।
ऋण के इस नए समझौते (Novation of debt) के तहत पोस्ट-डेटेड चेक जारी किए गए थे। इनमें से ₹6,00,000 का एक चेक “अपर्याप्त फंड” के कारण बाउंस हो गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने कंपनी और याचिकाकर्ता मसूद तारिफ (आरोपी नंबर 4) सहित उसके डायरेक्टरों के खिलाफ NI एक्ट की धारा 138 और 141 के तहत आपराधिक कार्यवाही शुरू की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री मयूर मुखर्जी ने तर्क दिया कि मसूद तारिफ एक नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर थे, जो केवल वैधानिक अनुपालन (Statutory compliance) के लिए जिम्मेदार थे और कंपनी के वित्तीय प्रबंधन से उनका कोई संबंध नहीं था। उन्होंने इसे “ओवर-इंप्लीकेशन” (जरूरत से ज्यादा लोगों को घसीटना) का क्लासिक उदाहरण बताते हुए कहा कि याचिकाकर्ता न तो चेक पर हस्ताक्षरकर्ता था और न ही 2018 के सेटलमेंट एग्रीमेंट का हिस्सा था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एस.एम.एस. फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड बनाम नीता भल्ला (2005) मामले का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी का व्यवसाय के संचालन के लिए जिम्मेदार होना अनिवार्य है।
शिकायतकर्ता की ओर से पेश वकील श्री दीपांजन दत्त ने तर्क दिया कि यह याचिका सात साल बाद दायर की गई है और यह केवल देरी करने की रणनीति है। उन्होंने HDFC बैंक लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) का हवाला देते हुए कहा कि कानून में वैधानिक भाषा को केवल रटने (Mechanical parroting) की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने वर्षों तक मुकदमे में भाग लेकर अपनी तकनीकी आपत्तियों को छोड़ (Waiver) दिया है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि कानून वैधानिक शब्दों को यंत्रवत दोहराने को हतोत्साहित करता है, लेकिन तथ्यों के संबंध (Factual nexus) की उपस्थिति को “पूरी तरह से अनिवार्य” बनाता है। कोर्ट ने पाया कि शिकायत में विशेष रूप से आरोपी नंबर 2 और 3 का नाम लिया गया था जिन्होंने ऋण पर बातचीत की थी, जबकि याचिकाकर्ता का नाम “स्पष्ट रूप से छोड़ दिया गया” था।
ऋण के नवीनीकरण (Novation of debt) पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“कानून की नजर में, जहां ऋण का पुनर्गठन (Restructured) किया जाता है, वहां प्रतिवर्ती दायित्व (Vicarious liability) का दायरा केवल उन लोगों तक सीमित हो जाता है जो उस विशिष्ट निपटान प्रक्रिया के प्रभारी थे।”
देरी के तर्क पर कोर्ट ने अनुकूल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) का संदर्भ देते हुए कहा:
“हाईकोर्ट का कर्तव्य है कि वह ऐसी कार्यवाही को रोके जो कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। यदि किसी गैर-हस्ताक्षरकर्ता डायरेक्टर को केवल देरी से याचिका दायर करने के कारण मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह सिविल रिकवरी के लिए आपराधिक कानून को ‘हथियार’ बनाने जैसा होगा।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि केवल पद के आधार पर किसी डायरेक्टर की “मानित देयता” (Deemed liability) नहीं होती। कोर्ट ने माना कि समन जारी करना एक गंभीर न्यायिक कार्य है और इस मामले में मजिस्ट्रेट ने यह पहचानने में चूक की कि याचिकाकर्ता की भूमिका के बारे में कोई विशिष्ट आरोप नहीं थे।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण आवेदन (CRR 2128 of 2025) को स्वीकार करते हुए मसूद तारिफ के खिलाफ कार्यवाही और समन आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह शेष आरोपियों (कंपनी और आरोपी नंबर 2 व 3) के खिलाफ मुकदमे को “अत्यधिक शीघ्रता” के साथ आगे बढ़ाए और NI एक्ट की धारा 143(3) के आदेशानुसार इसे छह महीने के भीतर पूरा करे। याचिकाकर्ता को उनकी जमानत बांड से मुक्त कर दिया गया है।
केस विवरण
- केस टाइटल: मसूद तारिफ -बनाम- पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य
- केस नंबर: CRR 2128 OF 2025
- बेंच: जस्टिस उदय कुमार
- दिनांक: 20 मार्च, 2026

