कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2011 के एक हत्या मामले में सत्र अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द करते हुए मौत की सजा पाए एक आरोपी और उम्रकैद की सजा पाए 18 अन्य लोगों को बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने मामले की सुनवाई और निर्णय में गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटियाँ कीं और अभियोजन का मामला विश्वसनीय साक्ष्यों से समर्थित नहीं था।
न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी और न्यायमूर्ति अपूर्व सिन्हा रे की खंडपीठ ने हुगली जिले के आरामबाग स्थित अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, प्रथम न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले को निरस्त कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने बलदेव पाल को मौत की सजा सुनाई थी, जबकि 18 अन्य आरोपियों को आजीवन कारावास दिया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने निर्णय देते समय “कुछ बुनियादी और प्राथमिक स्तर की गलतियाँ” कीं, जिसके कारण दोषसिद्धि टिक नहीं सकती। अदालत ने बलदेव पाल की दोषसिद्धि को अस्थिर मानते हुए उसे तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।
खंडपीठ ने यह भी निर्देश दिया कि उसके निर्णय की प्रति और ट्रायल कोर्ट के फैसले की प्रति हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जाए, ताकि यह तय किया जा सके कि संबंधित न्यायाधीश के मार्गदर्शन के लिए कोई “सुधारात्मक कदम” उठाने की आवश्यकता है या नहीं।
अदालत ने कहा कि अभियोजन का मामला मुख्य रूप से पक्षपाती या हितग्राही गवाहों के बयानों पर आधारित था और उनके समर्थन में कोई स्वतंत्र या पुष्टिकारी साक्ष्य उपलब्ध नहीं था। ऐसे हालात में दोषसिद्धि को कायम रखना संभव नहीं है।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मुकदमे में अदालत का दायित्व है कि वह तभी दोषसिद्धि दर्ज करे जब कानूनी रूप से स्वीकार्य मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर आरोपी का अपराध संदेह से परे सिद्ध हो।
अदालत ने कहा, “जितना गंभीर आरोप होता है, उतनी ही अधिक सावधानी अदालत को बरतनी होती है, क्योंकि आरोप की गंभीरता के साथ दंड के परिणाम भी अधिक कठोर हो जाते हैं।”
अभियोजन के अनुसार दिसंबर 2011 में बलदेव पाल ने नईमुद्दीन खान की गोली मारकर हत्या कर दी थी। यह भी आरोप था कि घटना के समय पाल अन्य आरोपियों के साथ था और सभी ने मिलकर एक अवैध जमावड़ा बनाकर हत्या करने के साझा उद्देश्य से काम किया।
हालांकि, अपीलकर्ता बलदेव पाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बिकाश रंजन भट्टाचार्य और उदय शंकर चट्टोपाध्याय ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कानून के अनुरूप नहीं है। उनका कहना था कि आरोप तय करने की प्रक्रिया ही सही ढंग से नहीं अपनाई गई थी।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि मौत की सजा देने से पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों पर ट्रायल कोर्ट ने कोई विचार नहीं किया, इसलिए सजा का आदेश कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है।
मामले की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि हत्या में प्रयुक्त कथित हथियार को जांच अधिकारी बरामद ही नहीं कर पाए थे। साथ ही, अभियोजन ने पंचनामा (इनक्वेस्ट रिपोर्ट) की सामग्री को भी साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया।
अदालत ने चिकित्सकीय साक्ष्य में भी गंभीर विसंगति की ओर ध्यान दिलाया। जिस डॉक्टर ने मृतक के शरीर से गोली निकाली थी, उसने गवाही दी कि मुकदमे के दौरान उसे जो गोली दिखाई गई, वह वही गोली नहीं थी जो मृतक के शरीर से निकाली गई थी।
इन सभी कमियों और प्रक्रियात्मक त्रुटियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए बलदेव पाल समेत सभी 19 आरोपियों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया।

