कलकत्ता हाईकोर्ट ने बलात्कार, धोखाधड़ी और गर्भपात कराने के आरोपी एक व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। जस्टिस चैताली चटर्जी दास की बेंच ने कहा कि कई वर्षों तक शारीरिक संबंध बनाए रखना, साथ यात्रा करना और स्वेच्छा से होटलों में रुकना आपसी सहमति को दर्शाता है, न कि किसी तथ्य के भ्रम (misconception of fact) को। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक चले सहमति के रिश्ते को सिर्फ इसलिए बलात्कार नहीं माना जा सकता क्योंकि वह अंततः शादी में तब्दील नहीं हो पाया।
यह मामला शालबनी पुलिस स्टेशन केस नंबर 38/2022 से संबंधित था, जिसमें आरोपी अनिर्बान मुखर्जी के खिलाफ आईपीसी की धारा 417 (धोखाधड़ी), 376 (रेप), 313 (महिला की सहमति के बिना गर्भपात) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता और तथ्यों को देखते हुए निचली अदालत में लंबित पूरी कार्यवाही को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले की शुरुआत 16 फरवरी, 2022 को पीड़िता द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत से हुई थी। पीड़िता का आरोप था कि 2017 में आरोपी के साथ उसकी दोस्ती हुई जो बाद में प्रेम संबंधों में बदल गई। शिकायत के अनुसार, 10 मार्च 2018 को आरोपी ने उसे जबरन शराब पिलाई और बेहोशी की हालत में उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
पीड़िता ने दावा किया कि आरोपी ने उससे शादी का वादा किया था और इसी आश्वासन पर उसने रिश्ता जारी रखा। वे 2018 में दीघा और 2020 में गोवा जैसी जगहों पर साथ घूमने गए और कई होटलों में रात बिताई। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि जब वह गर्भवती हुई, तो आरोपी ने भविष्य में शादी करने का भरोसा देकर उसे गर्भपात के लिए मजबूर किया। अंततः जब आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया और कथित तौर पर फोटो लीक करने की धमकी दी, तब पीड़िता ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मिस्टर राजदीप मजूमदार ने दलील दी कि यह मामला पूरी तरह से सहमति से बने रिश्ते का है। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता एक शिक्षित वयस्क महिला है जिसने 2017 से 2022 तक यह रिश्ता बरकरार रखा। यदि 2018 में कोई अप्रिय घटना हुई भी थी, तो उसके बाद पीड़िता का आरोपी के साथ स्वेच्छा से घूमना और साथ रहना यह साबित करता है कि संबंध आपसी सहमति से थे। गर्भपात के मुद्दे पर बचाव पक्ष ने कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि यह प्रक्रिया दोनों की सहमति से हुई थी और आरोपी ने अभिभावक के रूप में हस्ताक्षर किए थे।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता की वकील सुश्री त्रिपर्णा रॉय ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि पीड़िता की सहमति केवल शादी के आश्वासन पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि गर्भपात के लिए दबाव बनाना और बाद में शादी से मुकर जाना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है, जिसकी सच्चाई ट्रायल के दौरान ही सामने आ सकती है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
जस्टिस चैताली चटर्जी दास ने रिकॉर्ड का सूक्ष्म अवलोकन किया और पाया कि दोनों पक्ष लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह रहे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि:
“पीड़िता ने आरोपी के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज कराने के बजाय पिछले 5-6 वर्षों से लगातार इस रिश्ते को जारी रखा और उसके साथ अलग-अलग जगहों पर गई। इससे यह संकेत नहीं मिलता कि वह किसी भी समय किसी भ्रम (misconception) में थी।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘समाधान बनाम महाराष्ट्र राज्य’ और ‘अनुराग सोनी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य’ के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 90 आईपीसी के तहत ‘तथ्य का भ्रम’ तभी माना जा सकता है जब आरोपी की मंशा शुरुआत से ही शादी करने की न रही हो। इस मामले में, लंबे समय तक चले रिश्ते के बाद हुए ब्रेकअप को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता।
धारा 313 (गर्भपात) के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार यह प्रक्रिया 2021 में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी रूल्स के तहत पीड़िता की सहमति से हुई थी। धारा 417 (धोखाधड़ी) के बारे में कोर्ट का रुख स्पष्ट था:
“धोखाधड़ी की नीयत शुरुआत से होनी चाहिए, लेकिन यहाँ दोनों स्वेच्छा से साथ घूमे और होटलों में रुके। ऐसा आचरण धोखे के बजाय आपसी सहमति और साथ को दर्शाता है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए आवश्यक बुनियादी तत्व मौजूद नहीं हैं। अदालत ने कहा कि यदि इस मुकदमे को आगे बढ़ने दिया गया, तो यह न्याय का मजाक होगा। जस्टिस दास ने पुनरीक्षण आवेदन (revisional application) को स्वीकार करते हुए आरोपी के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी।
केस विवरण:
केस टाइटल: अनिर्बान मुखर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य।
केस नंबर: CRR 3937 ऑफ 2022
जस्टिस: जस्टिस चैताली चटर्जी दास
याचिकाकर्ता के वकील: श्री राजदीप मजूमदार, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री प्रीतम रॉय, अधिवक्ता
राज्य के वकील: श्री मधुसूदन सुर, विद्वान ए.पी.पी.; श्री मनोरंजन महता, अधिवक्ता
विपक्षी (पीड़िता) के वकील: सुश्री त्रिपर्णा रॉय, अधिवक्ता

