विश्वासपूर्ण संबंधों के अभाव में धोखाधड़ी साबित करने का भार वादी पर: हाईकोर्ट ने अनपढ़ महिला द्वारा सेल डीड को दी गई चुनौती खारिज की

कलकत्ता हाईकोर्ट (पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच) ने एक दूसरी अपील को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया है कि केवल अनपढ़ होना ही सबूत के भार (burden of proof) को प्रतिवादी पर स्थानांतरित नहीं करता है, जब तक कि पक्षों के बीच कोई विश्वासपूर्ण संबंध (fiduciary relationship) या ‘सक्रिय विश्वास’ की स्थिति स्थापित न हो। जस्टिस चैताली चटर्जी (दास) ने निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखते हुए निर्णय दिया कि अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि पंजीकृत सेल डीड (sale deed) धोखाधड़ी या गलत बयानी के माध्यम से निष्पादित की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला श्रीमती के. मुनियम्मा (मूल वादी) द्वारा 15 अप्रैल 1991 की एक सेल डीड को रद्द करने और मालिकाना हक की घोषणा के लिए दायर मुकदमे से शुरू हुआ था। वादी, जो एक अनपढ़ महिला थी, का दावा था कि वह अपनी जमीन के 200 वर्ग मीटर हिस्से के लिए खरीदार खोजने में मदद के लिए प्रतिवादी, जी. अरुल आनंद (एक पुलिस कांस्टेबल) के पक्ष में जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) निष्पादित करना चाहती थी।

उनका आरोप था कि प्रतिवादी ने उन्हें ₹50,000 का अग्रिम भुगतान किया, लेकिन बाद में धोखे से GPA के बजाय पूरे 300 वर्ग मीटर के लिए सेल डीड पंजीकृत करा ली। वादी के अनुसार, उन्हें इस “धोखाधड़ी” का पता 1995 में चला जब प्रतिवादी ने जमीन पर निर्माण सामग्री जमा करना शुरू कर दिया। ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत दोनों ने मुकदमे को खारिज कर दिया था, जिसके बाद यह दूसरी अपील हाईकोर्ट में दायर की गई।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की वकील श्रीमती अंजलि नाग ने तर्क दिया कि चूंकि मुनियम्मा एक अनपढ़ महिला थी, इसलिए डीड पर “पढ़कर सुनाया और समझाया गया” (read over and explained) का पृष्ठांकन अनिवार्य था। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 111 के तहत, लेनदेन की सद्भावना साबित करने का भार प्रतिवादी पर था क्योंकि वह “सक्रिय विश्वास” की स्थिति में था। अपीलकर्ता ने कृष्णा मोहन कुल उर्फ नानी चरण कुल बनाम प्रतिमा मैती जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि एक अनपढ़ महिला की स्थिति ‘परदानशीन’ महिला के समान होती है।

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दूसरी ओर, प्रतिवादी के वकील श्री प्रोहित मोहन लाल ने दलील दी कि प्रतिवादी ने अपने लिखित बयान में वादी के अनपढ़ होने के तथ्य से इनकार किया था। उन्होंने सब-रजिस्ट्रार कार्यालय के क्लर्क (DW-2) की गवाही पर जोर दिया, जिसने बताया कि पंजीकरण के दौरान विक्रेता को दस्तावेज की सामग्री समझाई गई थी और प्रतिफल राशि (consideration money) की प्राप्ति के बारे में पूछा गया था। प्रतिवादी का कहना था कि दोनों पक्षों के बीच कोई औपचारिक विश्वासपूर्ण संबंध नहीं था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 58 के तहत अपनाई गई प्रक्रिया की जांच की। कोर्ट ने पाया कि क्लर्क (PW-2) ने गवाही दी थी कि सब-रजिस्ट्रार ने स्पष्ट रूप से विक्रेता से पूछा था कि क्या उन्हें पूरी राशि मिल गई है।

सबूत के भार के संबंध में हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“अपीलकर्ता के बयान के अलावा, ऐसा कोई अन्य सबूत नहीं मिलता जिससे यह साबित हो सके कि प्रतिवादी, अपीलकर्ता के सक्रिय विश्वास में था।”

हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता द्वारा पेश किए गए पुराने फैसलों और वर्तमान मामले के बीच अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि हालांकि कानून अनपढ़ व्यक्तियों की रक्षा करता है, लेकिन धोखाधड़ी का आरोप लगाने वाले व्यक्ति पर ही इसे साबित करने का “प्रारंभिक भार” रहता है। जस्टिस चैताली चटर्जी (दास) ने कहा:

“यह अदालत इस अवलोकन का पूर्ण समर्थन करती है कि अपीलकर्ता एक अनपढ़ महिला हो सकती है, लेकिन वह यह साबित करने में विफल रही कि प्रतिवादी के साथ उसका कोई विश्वासपूर्ण संबंध (fiduciary relation) था या वह उसके सक्रिय विश्वास वाला व्यक्ति था। वह यह नहीं बता सकी कि उनके बीच सक्रिय विश्वास का संबंध कैसे विकसित हुआ।”

हाईकोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि वादी के पति, जो एक सरकारी कर्मचारी थे और डीड के गवाह भी थे, को गवाही के लिए नहीं बुलाया गया। कोर्ट ने कहा कि यह मानना “कठिन” है कि वे कार्यवाही के बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञ थे।

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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालतों द्वारा वादी पर सबूत का भार डालना सही था। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि दस्तावेज की सामग्री मूल वादी को पढ़कर नहीं सुनाई गई थी।

“अतः कानून के अनुसार यह माना जाता है कि दोनों निचली अदालतें सेल डीड के निष्पादन को साबित करने का भार मूल वादी पर डालने में सही थीं न कि प्रतिवादी पर, क्योंकि अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि अनपढ़ होने के बावजूद उसे सामग्री समझाई नहीं गई थी।”

परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने अपील में कोई दम नहीं पाया और SA No. 7 of 2025 को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस शीर्षक: श्री के. सुब्रमणि बनाम श्री जी. अरुल आनंद
  • केस संख्या: SA/7/2025
  • बेंच: जस्टिस चैताली चटर्जी (दास)
  • दिनांक: 23 मार्च, 2026

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