बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को वायु प्रदूषण पर सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि “केवल कड़े शब्दों से कोई परिणाम नहीं निकलेगा” और प्रदूषण के आर्थिक प्रभाव की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। यह मामला अदालत द्वारा 2023 में स्वयं संज्ञान लेकर शुरू किया गया था।
मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर की अध्यक्षता वाली पीठ वरिष्ठ अधिवक्ता दारियस खंबाटा (अमिकस क्यूरी) और अन्य पक्षकारों की दलीलें सुन रही थी। NGO ‘वनशक्ति’ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जनक द्वारकादास ने पक्ष रखा।
अमिकस क्यूरी दारियस खंबाटा ने दावोस में हाल ही में संपन्न वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में पूर्व IMF मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ द्वारा दिए गए बयान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा था कि “प्रदूषण भारत के लिए व्यापार से भी बड़ी आर्थिक चुनौती है।”
खंबाटा ने कोर्ट से कहा कि इस टिप्पणी को गंभीरता से लेना चाहिए और प्रदूषण की आर्थिक लागत का आकलन आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि “व्यवस्था को झकझोरने के लिए झटका देना जरूरी है।”
“कोई त्वरित समाधान नहीं है, चीन को भी 8–10 साल लगे थे प्रदूषण नियंत्रण में। लेकिन अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो भारत भी कर सकता है,” उन्होंने कहा।
NGO ‘वनशक्ति’ की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता जनक द्वारकादास ने कहा कि जो लोग प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, उन्हें मुआवज़ा मिलना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि “प्रशासनिक कार्रवाई की गति बेहद धीमी है” और अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
23 जनवरी को हुई पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने नगर निकायों की “अड़ियल अवहेलना” पर नाराजगी जताई थी और यहां तक कहा था कि अगर आदेशों का पालन नहीं हुआ तो शीर्ष अधिकारियों का वेतन रोका जा सकता है।
हालांकि, मंगलवार को कोर्ट ने कोई नया निर्देश नहीं दिया और मामले की अगली सुनवाई गुरुवार के लिए टाल दी। पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि प्रदूषण के आर्थिक प्रभाव की पड़ताल जरूरी है और “सिर्फ कड़े शब्दों से काम नहीं चलेगा।”

