राज्य बार काउंसिलों के बीच अधिवक्ता का नामांतरण शुल्क वसूलना अधिवक्ता अधिनियम की धारा 18 का उल्लंघन: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी अधिवक्ता का नाम एक राज्य बार काउंसिल की सूची से दूसरे राज्य बार काउंसिल की सूची में स्थानांतरित करने पर कोई शुल्क वसूलना कानूनन गलत है। न्यायालय ने इसे अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 18(1) के प्रावधानों के विपरीत ठहराया।

न्यायमूर्ति सुमन श्याम और न्यायमूर्ति श्याम सी. चांडक की खंडपीठ ने अधिवक्ता देवेंद्र नाथ त्रिपाठी की याचिका स्वीकार करते हुए बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा (BCMG) द्वारा 2014 में उत्तर प्रदेश बार काउंसिल से उनके नामांतरण पर ₹15,405 शुल्क वसूलने को अवैध घोषित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता वर्ष 2003 में उत्तर प्रदेश राज्य बार काउंसिल में नामांकित हुए थे। बाद में वे मुंबई आ गए और 25 सितम्बर 2013 को अपना नामांतरण BCMG में कराने का आवेदन किया। उनका कहना था कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 18 के अनुसार यह स्थानांतरण “बिना किसी शुल्क” के होना चाहिए।

Video thumbnail

इसके बावजूद BCMG ने उनसे निम्न राशि वसूली:

  • ₹1,900 उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को
  • ₹11,490 BCMG को
  • ₹2,015 बार काउंसिल ऑफ इंडिया को
READ ALSO  दीमक की तरह पूरे देश को चाट रहा है साइबर अपराध:--इलाहाबाद हाई कोर्ट

त्रिपाठी का आरोप था कि यह शुल्क BCMG के 26 सितम्बर 2010 के प्रस्ताव संख्या 112 के आधार पर लिया गया, जो कानून के विपरीत है। उन्होंने यह भी आपत्ति जताई कि शुल्क वर्ष 2003 से पिछली तिथि से गणना कर वसूला गया, जबकि वे उस अवधि में BCMG के सदस्य नहीं थे।

याचिकाकर्ता के तर्क

त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले गौरव कुमार बनाम भारत संघ (रिट याचिका (सी) सं. 352/2023) पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि राज्य बार काउंसिल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया कोई ऐसा शुल्क नहीं वसूल सकती जो अधिनियम में निर्दिष्ट न हो। उनका कहना था कि धारा 18(1) स्पष्ट रूप से नामांतरण शुल्क वसूली पर रोक लगाती है और परिषदों को ऐसा करने से रोका जाए।

READ ALSO  जस्टिस चंद्रचूड़ ने बताया कोरोना के दौरान अपना अनुभव, कहा 18 दिनों तक ऑफिस में आइसोलेट रहना पड़ा

मूल याचिका में उन्होंने वापसी, ब्याज और हर्जाना भी मांगा था, परंतु सुनवाई के दौरान वे केवल प्रार्थना “A” — शुल्क वसूली की वैधता को चुनौती — तक सीमित रहे।

प्रतिवादी का पक्ष

BCMG की ओर से अधिवक्ता ने कहा कि गौरव कुमार फैसले के मद्देनज़र परिषद को इस प्रार्थना पर कोई आपत्ति नहीं होगी, यदि आदेश का प्रभाव भावी (prospective) रूप से लागू किया जाए। बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ।

न्यायालय का विश्लेषण

पीठ ने धारा 18(1) का हवाला देते हुए कहा कि नामांतरण “बिना किसी शुल्क” के होना चाहिए।

गौरव कुमार मामले के सुप्रीम कोर्ट के अवलोकन दोहराते हुए न्यायालय ने कहा कि बार काउंसिल केवल वही शुल्क वसूल सकती है जो अधिनियम की धारा 24(1)(f) में स्पष्ट रूप से निर्धारित है, और अधिवक्ताओं पर अतिरिक्त शुल्क थोपना अनुचित है।

READ ALSO  सेवानिवृत्त सैनिकों ने कर्नाटक हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की, राजनीतिक दलों के 'मुफ्त उपहार' के वादे को चुनौती दी

न्यायालय ने माना कि BCMG का 2010 का प्रस्ताव अधिनियम के प्रावधानों पर हावी नहीं हो सकता। इस प्रकार याचिकाकर्ता से लिया गया नामांतरण शुल्क “अवैध” है क्योंकि यह धारा 18(1) का उल्लंघन करता है।

निर्णय

न्यायालय ने याचिका को प्रार्थना “A” तक स्वीकार करते हुए कहा कि राज्य बार काउंसिलों के बीच नामांतरण शुल्क वसूलना अनुमन्य नहीं है। आदेश का प्रभाव भावी रहेगा क्योंकि याचिकाकर्ता ने वापसी या अन्य राहत की मांग नहीं की।

मामले में किसी पक्ष को लागत नहीं दी गई।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles