बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई पोर्ट ट्रस्ट (MBPT) के एक कर्मचारी की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच “अस्पष्ट और अत्यधिक देरी” से भरी थी और इसमें उस क्रिमिनल केस से स्वतंत्र कोई साक्ष्य नहीं था, जिसमें कर्मचारी पहले ही बरी हो चुका था। जस्टिस अमित बोरकर की एकल पीठ ने निर्णय सुनाया कि हालांकि क्रिमिनल और विभागीय कार्यवाही अलग-अलग मानकों पर चलती है, लेकिन “झूठी संलिप्तता की संभावना” के आधार पर मिली रिहाई को तब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जब अनुशासनात्मक कार्रवाई उन्हीं सबूतों पर आधारित हो।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, श्री बाबासाहेब रायप्पा वाघमारे, जुलाई 1979 में मुंबई पोर्ट ट्रस्ट में शोर वर्कर के रूप में शामिल हुए थे। 14 फरवरी 1994 को, उन पर आरोप लगा कि वे न्यू शिवड़ी वेयरहाउस के पास एक हैंडबैग ले जा रहे थे जिसमें लगभग ₹4,000 मूल्य के चार इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स थे। शिवड़ी पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट के बाद, भारतीय दंड संहिता की धारा 379 के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई।
जब तक क्रिमिनल केस लंबित रहा, याचिकाकर्ता चार साल तक अपनी ड्यूटी करते रहे। हालांकि, 10 फरवरी 1998 को—जब क्रिमिनल ट्रायल अंतिम चरण में था—पोर्ट ट्रस्ट ने चार्ज मेमो जारी कर विभागीय कार्यवाही शुरू की। 22 जुलाई 1998 को, दादर के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने वाघमारे को बरी कर दिया। मजिस्ट्रेट ने गवाहों के बयानों में “गंभीर विरोधाभास” पाया और स्पष्ट रूप से दर्ज किया कि “झूठी संलिप्तता की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।”
इस बरी होने के बावजूद, विभागीय जांच अधिकारी ने रिपोर्ट दी कि आरोप सिद्ध हो गए हैं। इसके परिणामस्वरूप, 18 दिसंबर 1998 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। सेंट्रल गवर्नमेंट इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल (CGIT) ने बाद में 2003 और 2007 के अपने फैसलों में इस बर्खास्तगी को बरकरार रखा, जिसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के तर्क: वाघमारे का प्रतिनिधित्व करते हुए एडवोकेट एस. ए. राजेशिर्के ने तर्क दिया कि घटना के लगभग चार साल बाद विभागीय कार्यवाही शुरू करना “मनमाना, अनुचित और दुर्भावनापूर्ण” था। उन्होंने तर्क दिया कि प्रतिवादी ने 14 फरवरी 1994 की एक कथित रिपोर्ट पर भरोसा करने की कोशिश की, जिसे जांच के दौरान केवल इसलिए पेश किया गया ताकि क्रिमिनल केस की कमियों को भरा जा सके। कैप्टन एम. पॉल एंथोनी बनाम भारत गोल्ड माइन्स लिमिटेड का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जब आरोप और सबूत समान थे, तो मजिस्ट्रेट द्वारा दी गई रिहाई (जो केवल ‘संदेह के लाभ’ पर आधारित नहीं थी) के बाद मामला समाप्त हो जाना चाहिए था।
प्रतिवादी के तर्क: मुंबई पोर्ट ट्रस्ट की ओर से एडवोकेट ध्रुव गांधी ने तर्क दिया कि विभागीय जांच में सबूतों का मानक “संभावनाओं की प्रबलता” (preponderance of probabilities) है, जो क्रिमिनल ट्रायल के “संदेह से परे” वाले मानक से अलग है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ट्रस्ट की संपत्ति के साथ पाया गया था और जांच अधिकारी का निष्कर्ष उपलब्ध सामग्री पर आधारित था। उन्होंने नोएडा एंटरप्रेन्योर्स एसोसिएशन बनाम नोएडा का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय कार्यवाही क्रिमिनल केस के नतीजों से स्वतंत्र रूप से चल सकती है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने दोनों प्रकार की कार्यवाहियों के बीच के अंतर का सूक्ष्म विश्लेषण किया। जस्टिस बोरकर ने नोट किया कि हालांकि बरी होना स्वचालित रूप से अनुशासनात्मक कार्रवाई को समाप्त नहीं करता है, लेकिन बरी होने की प्रकृति एक मार्गदर्शक कारक है।
हाईकोर्ट ने अवलोकन किया:
“क्रिमिनल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्ष केवल तकनीकी ‘संदेह के लाभ’ पर आधारित नहीं हैं। वे अभियोजन पक्ष के मामले की कमजोरियों को दर्शाते हैं… इसलिए विभागीय निष्कर्ष उसी सामग्री पर आधारित प्रतीत होते हैं जिसे क्रिमिनल कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया गया था।”
अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने में चार साल की देरी पर हाईकोर्ट ने कहा:
“ऐसी कार्रवाई शुरू करने में इतनी लंबी देरी के लिए स्पष्टीकरण की आवश्यकता है… वर्तमान मामले में रिकॉर्ड से निष्क्रियता की इस लंबी अवधि का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिलता है। जब बिना किसी औचित्य के कई वर्षों के बाद गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो अनुशासनात्मक कार्रवाई की निष्पक्षता का आकलन करते समय देरी एक प्रासंगिक कारक बन जाती है।”
जांच के दौरान अचानक नए दस्तावेज पेश किए जाने पर भी हाईकोर्ट ने आपत्ति जताई और कहा कि यदि दस्तावेज बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक पेश किए जाते हैं, तो कर्मचारी उनकी प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं कर सकता, जिससे जांच की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाती है।
निर्णय
रिट याचिका को स्वीकार करते हुए, हाईकोर्ट ने CGIT के फैसलों और 1998 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया। चूंकि वाघमारे याचिका लंबित रहने के दौरान ही रिटायरमेंट की आयु प्राप्त कर चुके थे, इसलिए उन्हें बहाल करना संभव नहीं था। फलस्वरूप, हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें उनकी रिटायरमेंट की तारीख तक निरंतर सेवा में माना जाए।
हाईकोर्ट ने मुंबई पोर्ट ट्रस्ट को निर्देश दिया कि:
- बर्खास्तगी की तारीख (18 दिसंबर 1998) से रिटायरमेंट की तारीख तक का पूरा पिछला वेतन (Full back wages) दिया जाए।
- वेतन वृद्धि और पेंशन लाभों के लिए निरंतर सेवा सहित सभी परिणामी लाभ प्रदान किए जाएं।
- पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य लाभों की गणना कर भुगतान बारह सप्ताह के भीतर किया जाए।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो उस पर फैसले की तारीख से भुगतान होने तक छह प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज लगेगा।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: बाबासाहेब रायप्पा वाघमारे बनाम चेयरमैन, मुंबई पोर्ट ट्रस्ट
- केस नंबर: रिट पिटीशन नंबर 1778/2018
- बेंच: जस्टिस अमित बोरकर
- दिनांक: 27 मार्च 2026

