बॉम्बे हाईकोर्ट ने कोर्ट कमिश्नर को रोकने और बच्ची की कस्टडी न देने पर पिता को अवमानना नोटिस जारी किया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करने और कोर्ट कमिश्नर के काम में “सक्रिय और जानबूझकर” बाधा डालने के आरोप में एक पिता (प्रतिवादी) को अवमानना (Contempt) का नोटिस जारी किया है। यह मामला क्रिसमस की छुट्टियों के दौरान मां को नाबालिग बेटी की कस्टडी सौंपने से जुड़ा है।

अवकाशकालीन पीठ (Vacation Court) की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस अश्विन डी. भोबे ने कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया, जिसमें कहा गया था कि प्रतिवादी और उनके परिवार ने जानबूझकर बाधा उत्पन्न की, जिससे बच्ची मानसिक रूप से परेशान हो गई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वैवाहिक विवाद और नाबालिग बच्ची की कस्टडी से संबंधित है। याचिकाकर्ता (मां) ने अपनी बेटी से मिलने (Access) के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

23 दिसंबर 2025 को, मुंबई के फैमिली कोर्ट नंबर 6 ने याचिकाकर्ता के आवेदन (Exh. 36) को स्वीकार करते हुए प्रतिवादी (पिता) को निर्देश दिया था कि वह 24 दिसंबर 2025 (सुबह 11:00 बजे) से 4 जनवरी 2026 (शाम 6:00 बजे) तक बेटी का एक्सेस मां को दे। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पिता को निर्देश दिया था कि वह कस्टडी सौंपने के लिए बच्ची को 24 दिसंबर को कोर्ट में लेकर आएं।

आदेश का पालन न होने पर, याचिकाकर्ता ने एक और आवेदन (Exh. 53) दायर किया। इसके बाद, 24 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने कस्टडी सौंपने की प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए पुलिस सहायता के साथ एडवोकेट स्वाति मुकदम को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि प्रतिवादी या उनकी ओर से कोई भी व्यक्ति “कोर्ट कमिश्नर के काम में बाधा नहीं डालेगा।”

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याचिकाकर्ता का आरोप है कि प्रतिवादी ने इन दोनों आदेशों का पालन नहीं किया, जिसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में अवमानना याचिका संख्या 822 ऑफ 2025 दायर की।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट फिरोजा दारुवाला ने कोर्ट को बताया कि प्रतिवादी ने 23 और 24 दिसंबर 2025 के आदेशों को चुनौती नहीं दी है। उन्होंने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट के निर्देशों का पालन करने में प्रतिवादी की विफलता प्रथम दृष्टया (prima facie) अवज्ञा के समान है।

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एडवोकेट दारुवाला ने 26 दिसंबर 2025 की कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि प्रतिवादी का पूरा इरादा फैमिली कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता को दिए गए अधिकारों को विफल करना था।

कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट और निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने कोर्ट कमिश्नर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर विशेष ध्यान दिया। रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया कि कस्टडी सौंपने का प्रयास विफल रहा। कमिश्नर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा:

“24 दिसंबर 2025 को कस्टडी सौंपने का प्रयास पूरी तरह से प्रतिवादी और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा सक्रिय, जानबूझकर और समन्वित बाधा (active, intentional and coordinated obstruction) के कारण विफल रहा।”

रिपोर्ट में बच्ची पर पड़े प्रभाव का भी विस्तार से वर्णन किया गया है:

“उनके आचरण के कारण नाबालिग बच्ची को गंभीर भावनात्मक संकट का सामना करना पड़ा और वह स्पष्ट रूप से आघात (visibly traumatized) में थी। यह स्पष्ट था कि बच्ची याचिकाकर्ता (मां) के साथ जाना चाहती थी, लेकिन डर और प्रतिवादी व उनके परिवार द्वारा बनाए गए मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण उसे रोका गया, और उन्होंने मुझे ‘प्रिशिता’ की कस्टडी याचिकाकर्ता को सौंपने से बाधित किया।”

कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

जस्टिस अश्विन डी. भोबे ने कमिश्नर की रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद पाया कि प्रतिवादी ने फैमिली कोर्ट के विशिष्ट आदेशों का पालन नहीं किया है।

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कोर्ट ने कहा: “प्रतिवादी द्वारा फैमिली कोर्ट नंबर 6, मुंबई के 23.12.2025 और 24.12.2025 के आदेशों में दिए गए निर्देशों का पालन करने में विफलता प्रथम दृष्टया (prima facie) अवज्ञा की श्रेणी में आती है।”

चूंकि मामला एक नाबालिग बच्ची की कस्टडी और “विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों” से जुड़ा था, इसलिए कोर्ट ने इस मामले पर तत्काल सुनवाई की।

परिणामस्वरूप, बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रतिवादी को अवमानना का नोटिस (Notice of Contempt) जारी किया और इसे उसी दिन, यानी 30 दिसंबर 2025 को शाम 5:00 बजे जवाबदेही के लिए नियत किया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के अनुरोध पर हमदस्त सर्विस (Hamdast service) की भी अनुमति दी।

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