समय-सीमा के कारण खारिज दावों को धारा 34 के तहत दोबारा नहीं खोला जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट ने मध्यस्थता पंचाट में हस्तक्षेप से किया इनकार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत दायर एक याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका के माध्यम से उस मध्यस्थता पंचाट (Arbitral Award) को चुनौती दी गई थी, जिसने दावों को ‘लिमिटेशन’ (समय-सीमा) के आधार पर खारिज कर दिया था। जस्टिस सोमशेखर सुंदरेशन ने स्पष्ट किया कि ‘कॉज ऑफ एक्शन’ (कार्यवाही का कारण) के उत्पन्न होने के संबंध में आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का दृष्टिकोण तर्कसंगत था और इसमें न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत प्रतिवादी, पी. एन. राइटर एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड (Writer) द्वारा याचिकाकर्ता, श्याम नारायण एंड ब्रदर्स (Shyam) को खुदाई के काम के लिए दिए गए वर्क ऑर्डर से हुई थी। काम पूरा होने के बाद, श्याम ने 18 मार्च, 2006 को अंतिम बिल पेश किया, जिसे राइटर द्वारा नियुक्त सलाहकारों ने 10 नवंबर, 2006 को प्रमाणित (Certify) किया था। आंशिक भुगतान के बावजूद, श्याम ने ₹34,78,178 की शेष राशि, बयाना राशि (₹1,50,000) और रिटेंशन मनी (₹5,92,929) की वापसी का दावा किया। कई वर्षों के पत्राचार के बाद, श्याम ने 24 अक्टूबर, 2011 को मध्यस्थता (Arbitration) की प्रक्रिया शुरू की।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति श्री चन्द्रशेखर को राजस्थान हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने की सिफारिश की

मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने 07 जनवरी, 2013 के अपने फैसले में सभी दावों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे समय-सीमा (Limitation) के भीतर नहीं थे।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता (Shyam) की ओर से: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ‘स्यू’ (मुकदमा करने) का अधिकार केवल 28 जनवरी, 2011 को उत्पन्न हुआ, जब राइटर ने स्पष्ट रूप से भुगतान करने से इनकार कर दिया। उन्होंने दलील दी कि समय-सीमा की गणना बिल प्रमाणित होने की तारीख के बजाय इनकार की तारीख से की जानी चाहिए।

प्रतिवादी (Writer) की ओर से: प्रतिवादी ने पक्ष रखा कि दावा पूरी तरह से समय-सीमा से बाहर था। उनकी दलील थी कि कार्यवाही का कारण नवंबर 2006 में अंतिम बिल प्रमाणित होते ही शुरू हो गया था। चूंकि मध्यस्थता प्रक्रिया अक्टूबर 2011 में शुरू हुई—जो लगभग पांच साल बाद थी—इसलिए तीन साल की निर्धारित समय-सीमा के अनुसार यह दावा कानूनी रूप से अमान्य हो गया था।

READ ALSO  कानून को उन समुदायों की वास्तविकताओं को ध्यान में रखना चाहिए जहां इसे लागू किया गया है: सीजेआई

हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस सुंदरेशन ने ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों का परीक्षण किया और सहमति जताई कि बिल प्रमाणीकरण की तारीख (10 नवंबर, 2006) ही समय-सीमा की गणना का शुरुआती बिंदु थी। हाईकोर्ट ने कहा:

“आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने यह सही दृष्टिकोण अपनाया कि मुकदमा करने का अधिकार सलाहकारों द्वारा अंतिम बिल प्रमाणित करने के तुरंत बाद उत्पन्न हुआ था; भले ही उस प्रमाणीकरण के बावजूद राइटर भुगतान करने से इनकार कर रहा था, इसलिए कार्रवाई का कारण उसी समय से शुरू माना जाएगा।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि धारा 18 (लिमिटेशन एक्ट) के तहत देनदारी की कोई स्वीकारोक्ति नहीं थी जो समय-सीमा को आगे बढ़ा सके। धारा 34 के तहत समीक्षा के दायरे पर, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Dyna Technologies Private Limited v. Crompton Greaves Ltd. मामले का उल्लेख करते हुए कहा:

“अदालतों को केवल इसलिए हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए क्योंकि तथ्यों और अनुबंध की व्याख्या पर एक वैकल्पिक दृष्टिकोण संभव है… जब तक कि पंचाट में ऐसी विकृति न हो जिसे धारा 34 के तहत माफ न किया जा सके।”

READ ALSO  महरौली हत्याकांड: टीवी चैनल को प्राथमिकी का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए अदालत ने पुलिस से हाईकोर्ट जाने को कहा

हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने किसी भी महत्वपूर्ण सबूत की अनदेखी नहीं की है। रिटेंशन मनी और बयाना राशि के दावों को भी समय-सीमा से बाहर माना गया।

फैसला

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि समय-सीमा के संबंध में ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष ‘तर्कसंगत और कारण सहित’ (logical and reasoned) थे। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने मध्यस्थता पंचाट में बिना किसी हस्तक्षेप के धारा 34 की याचिका का निपटारा कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस का नाम: श्याम नारायण एंड ब्रदर्स बनाम पी. एन. राइटर एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड
  • केस नंबर: आर्बिट्रेशन पिटीशन नंबर 526 ऑफ 2015
  • बेंच: जस्टिस सोमशेखर सुंदरेशन
  • तारीख: 23 मार्च, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles