विवाद “प्रथम दृष्टया” दीवानी प्रकृति का: 60 लाख रुपये की धोखाधड़ी के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 60 लाख रुपये की कथित धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के एक मामले में शांतादेवी मफतलाल पुरोहित और अन्य को अग्रिम जमानत दे दी है। जस्टिस एन.आर. बोरकर की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यह विवाद प्रथम दृष्टया दीवानी (civil) प्रकृति का प्रतीत होता है। इसके साथ ही कोर्ट ने एक नाबालिग के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की प्रक्रिया में बरती गई अनियमितताओं पर भी कड़ा रुख अपनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एमआरए मार्ग पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध क्रमांक 158/2025 से जुड़ा है। आवेदकों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 316(2) (अपराधिक विश्वासघात), 318(4) (धोखाधड़ी), 351(2) (आपराधिक धमकी) और 3(5) (साझा इरादा) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता चीनी खिलौनों के व्यापार से जुड़ा है। उसने आरोप लगाया था कि नवंबर 2024 में उसने आवेदकों को 75 लाख रुपये का माल इस भरोसे पर दिया था कि वे इसे मुनाफे पर बेचेंगे। आरोप है कि माल बेचने के बाद आवेदकों ने केवल 15 लाख रुपये चुकाए और बाकी के 60 लाख रुपये देने से इनकार कर दिया। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि पैसे मांगने पर उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई।

पक्षों की दलीलें

आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि इस मामले में पूरे परिवार को आरोपी बनाया गया है, जिसमें आवेदक क्रमांक 2 एक नाबालिग है। उन्होंने दलील दी कि यह विवाद पूरी तरह से दीवानी प्रकृति का है और इसमें हिरासत में लेकर पूछताछ की कोई आवश्यकता नहीं है। यह भी रेखांकित किया गया कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) मॉडल नियम, 2016 का नियम 8, जघन्य अपराधों के अलावा किसी नाबालिग के खिलाफ FIR दर्ज करने पर रोक लगाता है।

वहीं, सरकारी वकील और शिकायतकर्ता के वकील ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आवेदकों पर धोखाधड़ी का गंभीर आरोप है और अपराध की प्रकृति को देखते हुए उन्हें अग्रिम जमानत नहीं दी जानी चाहिए।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अपने 20 नवंबर 2025 के पिछले आदेश का उल्लेख किया, जिसमें यह पाया गया था कि पुलिस उपायुक्त (DCP), जोन-1, मुंबई ने सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) की राय को नजरअंदाज करते हुए FIR दर्ज करने की मंजूरी दी थी। ACP ने अपनी प्राथमिक राय में कहा था:

“दस्तावेजों के अवलोकन से हमारा प्राथमिक मत है कि पक्षों के बीच आर्थिक लेनदेन से संबंधित यह मामला दीवानी स्वरूप का है।”

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि DCP ने “यांत्रिक तरीके से” (mechanically) इस राय को खारिज कर दिया। कोर्ट के निर्देश पर DCP द्वारा दाखिल हलफनामे में भी इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं मिला कि ACP की राय को क्यों ठुकराया गया।

प्राथमिकी और मामले के तथ्यों का अध्ययन करने के बाद जस्टिस बोरकर ने कहा:

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“प्रथम दृष्टया, पक्षों के बीच का विवाद दीवानी प्रकृति का प्रतीत होता है। मामले के समग्र तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, मैं आवेदकों को अग्रिम जमानत पर रिहा करने का इच्छुक हूं।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत की अर्जी स्वीकार कर ली। अदालत ने आदेश दिया कि यदि एमआरए मार्ग पुलिस स्टेशन में दर्ज इस मामले के संबंध में आवेदकों को गिरफ्तार किया जाता है, तो उन्हें 25,000 रुपये के व्यक्तिगत मुचलके और इतनी ही राशि की एक या दो जमानत पर रिहा किया जाए।

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केस विवरण

  • केस टाइटल: शांतादेवी मफतलाल पुरोहित और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य।
  • केस नंबर: अग्रिम जमानत आवेदन संख्या 3087/2025
  • पीठ: जस्टिस एन.आर. बोरकर
  • आदेश की तिथि: 06 फरवरी, 2026
  • उपस्थिति: आवेदकों के लिए श्री विपुल मैती; राज्य के लिए सुश्री सुप्रिया काक (APP); शिकायतकर्ता के लिए श्री सुनील आर. पांडे।

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