बी. सुदर्शन रेड्डी की उपराष्ट्रपति उम्मीदवारी ने दिलाई जस्टिस सौमित्र सेन के महाभियोग की याद

इंडिया गठबंधन द्वारा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने से भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का एक अहम अध्याय एक बार फिर चर्चा में आ गया है — कोलकाता हाईकोर्ट के पूर्व जज, जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ हुआ महाभियोग।

एनडीए ने अपने प्रत्याशी के तौर पर सी. पी. राधाकृष्णन को मैदान में उतारा है, जो कई राज्यों के राज्यपाल रह चुके हैं और राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। दूसरी ओर, बी. सुदर्शन रेड्डी की उम्मीदवारी ने उनके न्यायिक करियर के एक विशेष पड़ाव को फिर से प्रकाश में ला दिया है — वह पड़ाव जिसने भारतीय न्यायपालिका में जवाबदेही और अनुशासन को लेकर मिसाल कायम की थी।

जस्टिस सौमित्र सेन का महाभियोग मामला

जस्टिस सौमित्र सेन पर 1990 के दशक में वकील रहते हुए कोर्ट द्वारा नियुक्त रिसीवर के तौर पर करोड़ों रुपये के गबन का आरोप लगा था। आरोप था कि उन्होंने इन धनराशियों का उचित हिसाब नहीं दिया, यहां तक कि जब वे हाईकोर्ट जज बन गए तब भी नहीं।

यह मामला वर्षों तक चला और 2011 में राज्यसभा ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित कर दिया। यह घटना भारतीय न्यायिक इतिहास की उन विरली घटनाओं में शामिल है जब किसी सिटिंग हाईकोर्ट जज के खिलाफ संसद ने महाभियोग की कार्यवाही की।

जस्टिस रेड्डी की भूमिका

जस्टिस सेन पर लगे आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की थी, जिसमें शामिल थे:

  • तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन (अध्यक्ष के रूप में)
  • सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जज बी. सुदर्शन रेड्डी
  • सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डी. के. जैन
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इस समिति ने गहन जांच के बाद यह निष्कर्ष दिया कि जस्टिस सौमित्र सेन “दोषी आचरण” (misconduct) के दोषी हैं और उन्हें जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। इस ऐतिहासिक जांच का हिस्सा रहते हुए जस्टिस रेड्डी ने न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वर्तमान में प्रासंगिक क्यों?

जैसे ही इंडिया गठबंधन ने बी. सुदर्शन रेड्डी के नाम की घोषणा की, राजनीतिक हलकों में इस मामले की चर्चा तेज हो गई। समर्थक इसे उनकी ईमानदारी और न्यायिक मर्यादा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं — एक ऐसा व्यक्ति जिसने भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर रुख अपनाया और न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए महाभियोग जैसी सख्त कार्यवाही का समर्थन किया।

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उनकी यह पृष्ठभूमि उन्हें एक ऐसे उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत करती है जो केवल विधि के नहीं, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्वों के भी प्रति प्रतिबद्ध रहा है।

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