“अस्तित्वहीन” आर्बिट्रल अवार्ड को लागू करना सार्वजनिक नीति के विरुद्ध: कलकत्ता हाईकोर्ट ने कथित फैसलों को रद्द किया

कलकत्ता हाईकोर्ट ने श्रेई इक्विपमेंट फाइनेंस लिमिटेड और रोडविंग्स इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड के बीच एक विवाद में दो कथित आर्बिट्रल अवार्ड को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन अवार्ड्स का कोई सत्यापन योग्य रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, उन्हें लागू करना भारत की सार्वजनिक नीति (Public Policy) के विपरीत है। जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य ने कहा कि आर्बिट्रल कार्यवाही से संबंधित “किसी भी प्रासंगिक दस्तावेज की पूर्ण अनुपस्थिति” न्यायिक विवेक को झकझोर देती है और आर्बिट्रेशन एंड कॉनसिलीएशन एक्ट, 1996 के तहत ऐसे अवार्ड्स को अमान्य और अप्रवर्तनीय बनाती है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, श्रेई इक्विपमेंट फाइनेंस लिमिटेड ने 17 सितंबर, 2020 और 21 सितंबर, 2020 के दो कथित अवार्ड्स को चुनौती दी थी, जो 2017 के इक्विपमेंट फाइनेंस कॉन्ट्रैक्ट्स से संबंधित थे। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उन्हें इन अवार्ड्स के अस्तित्व के बारे में जनवरी 2024 में तब पता चला, जब नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के समक्ष विपक्षी द्वारा दायर एक हलफनामे में इनकी फोटोकॉपी संलग्न की गई थी।

यह चुनौती याचिकाकर्ता के प्रबंधन में आए महत्वपूर्ण बदलाव के बाद दी गई। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा पिछले प्रबंधन की वित्तीय अनियमितताओं को पकड़े जाने के बाद, एक प्रशासक नियुक्त किया गया था और बाद में कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) शुरू हुई। नए प्रबंधन ने दावा किया कि कंपनी के रिकॉर्ड की गहन तलाशी के बावजूद, कथित आर्बिट्रल कार्यवाही या अंतिम अवार्ड्स का कोई निशान नहीं मिला।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता का पक्ष: सीनियर एडवोकेट जयंत कुमार मित्रा और तिलक कुमार बोस के माध्यम से याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ये अवार्ड्स “धोखाधड़ी का परिणाम” थे। उनकी मुख्य दलीलें इस प्रकार थीं:

  • धारा 31(5) का उल्लंघन: कानून के अनुसार अवार्ड की हस्ताक्षरित प्रति (Signed Copy) याचिकाकर्ता को कभी नहीं दी गई।
  • रिकॉर्ड का अभाव: आर्बिट्रेटर ने लिखित उत्तर में कहा कि मूल अवार्ड उनके पास हैं लेकिन बाकी दस्तावेज पक्षों को लौटा दिए गए हैं; हालाँकि, याचिकाकर्ता को कंपनी के रिकॉर्ड में ऐसे कोई दस्तावेज नहीं मिले।
  • काउंसिल द्वारा इनकार: अवार्ड्स में याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले जिस एडवोकेट का नाम था, उन्होंने किसी भी कार्यवाही में शामिल होने या जानकारी होने से इनकार कर दिया।
  • विरोधाभासी आचरण: कथित अवार्ड्स की तारीखों के बाद भी पक्षों के बीच दावों को लेकर पत्राचार जारी रहा, जिसमें विपक्षी ने “मिलान” (Reconciliation) की बात तो की लेकिन कभी आर्बिट्रल अवार्ड का जिक्र नहीं किया।
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विपक्षी का पक्ष: सीनियर एडवोकेट रंजन बचावत के माध्यम से विपक्षी ने तर्क दिया:

  • समय-सीमा (Limitation): धारा 34(3) के तहत चुनौतियां समय-बाधित थीं।
  • अस्पष्ट आरोप: धोखाधड़ी के दावे विशिष्ट विवरणों के बिना थे और केवल “संदेह और अनुमान” पर आधारित थे।
  • इकाई की निरंतरता: प्रबंधन बदलने से कंपनी की कानूनी स्थिति नहीं बदलती; इसलिए पिछले अधिकारियों की जानकारी वर्तमान प्रबंधन पर बाध्यकारी होनी चाहिए।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

लिमिटेशन और अवार्ड की प्राप्ति पर: हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Union of India v. Tecco Trichy Engineers & Contractors और Dakshin Haryana Bijli Vitran Nigam Ltd. v. Navigant Technologies (P) Ltd. के फैसलों का हवाला देते हुए जोर दिया कि हस्ताक्षरित प्रति की डिलीवरी एक महत्वपूर्ण कानूनी अनिवार्यता है। चूंकि विपक्षी हस्ताक्षरित प्रतियों की डिलीवरी साबित करने में विफल रहा, इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि धारा 34(3) के तहत समय-सीमा “कभी शुरू ही नहीं हुई।”

धारा 34 का दायरा: हाईकोर्ट ने इस पर विचार किया कि क्या “अस्तित्वहीन” अवार्ड को धारा 34 के तहत चुनौती दी जा सकती है। जस्टिस भट्टाचार्य ने टिप्पणी की:

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“1996 के अधिनियम की धारा 5 को पूर्ण प्रभावी बनाने और अधिनियम के उद्देश्य को बनाए रखने के लिए… धारा 34 के तहत चुनौती के दायरे में इस आधार को भी शामिल माना जाना चाहिए कि वास्तव में कोई वैध अवार्ड था ही नहीं।”

धोखाधड़ी और सार्वजनिक नीति: हाईकोर्ट ने पाया कि विपक्षी कार्यवाही का कोई भी विवरण (Minutes), दलीलें, सबूत या सुनवाई का नोटिस पेश नहीं कर सका। कोर्ट ने अवार्ड्स के भीतर आर्बिट्रेटर की नियुक्ति के तरीके को लेकर “गंभीर विरोधाभास” पर भी ध्यान दिया। कोर्ट ने कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान बिना किसी सबूत के “वेन्यू चार्ज” का दावा करना कार्यवाही की विश्वसनीयता को और संदिग्ध बनाता है।

हाईकोर्ट ने कहा:

“यहाँ धोखाधड़ी का स्वरूप कुछ करने (Commission) से नहीं बल्कि कुछ छिपाने (Omission) से है, क्योंकि कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि कथित आर्बिट्रल कार्यवाही और अवार्ड्स का वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं था।”

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सार्वजनिक नीति के संबंध में कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“अस्तित्वहीन अवार्ड्स को वैध मानना न्याय की प्रक्रिया के विरुद्ध और अन्याय को बढ़ावा देने वाला होगा। ऐसे अवार्ड्स भारत की सार्वजनिक नीति के विपरीत हैं।”

फैसला

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि कथित अवार्ड्स धोखाधड़ी से प्रभावित थे और सार्वजनिक नीति के विरुद्ध थे। जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य ने याचिकाएं स्वीकार करते हुए 17 सितंबर, 2020 और 21 सितंबर, 2020 के अवार्ड्स को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने इन अवार्ड्स को “कानून की दृष्टि में अमान्य और अप्रवर्तनीय” करार दिया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: श्रेई इक्विपमेंट फाइनेंस लिमिटेड बनाम रोडविंग्स इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड
  • केस नंबर: AP-COM No. 529 of 2024 और AP-COM No. 530 of 2024
  • बेंच: जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य
  • तारीख: 13 मार्च, 2026

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