आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम शामिल हैं, ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि संपत्ति की कुर्की (Attachment) के आदेश के बाद निष्पादित की गई सेल डीड (Sale Deed) सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 64(1) के तहत शून्य मानी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि केवल इस तथ्य से कि संपत्ति कुर्की से पहले गिरवी (Mortgage) रखी गई थी, बाद का निजी हस्तांतरण वैध नहीं हो जाता, जब तक कि वह हस्तांतरण कुर्की से पहले पंजीकृत किसी अनुबंध के अनुसरण में न किया गया हो।
कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा क्लेम याचिका (Claim Petition) को खारिज करने के आदेश को सही ठहराते हुए अपील को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील (Appeal Suit No. 696 of 2025) प्रधान जिला न्यायाधीश, विशाखापत्तनम द्वारा पारित 29 अक्टूबर, 2025 के फैसले और डिक्री को चुनौती देते हुए दायर की गई थी। विवाद मूल रूप से वर्ष 2017 के एक मुकदमे (O.S.No.289 of 2017) की निष्पादन कार्यवाही (Execution Proceedings) से जुड़ा था।
मामले में प्रतिवादी संख्या 1 (डिक्री होल्डर) ने प्रतिवादी संख्या 2 और 3 (जजमेंट डेब्टर्स) के खिलाफ धन की वसूली के लिए डिक्री प्राप्त की थी। मुकदमे के दौरान, अदालत ने 25 जुलाई, 2017 के आदेश द्वारा संबंधित संपत्ति को कुर्क (Attach) कर लिया था, और यह कुर्की 5 अगस्त, 2017 को प्रभावी हुई थी।
अपीलकर्ता (क्लेम पेटीशनर) ने आदेश XXI नियम 58 सीपीसी के तहत एक याचिका दायर कर कुर्क की गई संपत्ति पर अपने स्वामित्व का दावा किया। यह दावा 27 जनवरी, 2020 की सेल डीड और 11 सितंबर, 2018 के बिक्री के लिए एक एग्रीमेंट-सह-जीपीए (Agreement of Sale-cum-GPA) पर आधारित था। ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि चूंकि हस्तांतरण कुर्की के बाद किया गया था, इसलिए यह धारा 64(1) सीपीसी के तहत शून्य है।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उक्त संपत्ति को शुरुआत में 30 जुलाई, 2016 को एक फाइनेंस कंपनी के पास गिरवी (Mortgage) रखा गया था। यह तारीख कुर्की के आदेश (25 जुलाई, 2017) से पहले की है। अपीलकर्ता का कहना था कि 27 जनवरी, 2020 की सेल डीड इस पूर्व-कुर्की मॉर्गेज अनुबंध के अनुसरण में निष्पादित की गई थी।
सीपीसी की धारा 64(2) का सहारा लेते हुए, अपीलकर्ता ने दलील दी कि सेल डीड को शून्य नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि मॉर्गेज कुर्की से पहले का था और धारा 64(2) ऐसे हस्तांतरणों को संरक्षण प्रदान करती है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने सीपीसी की धारा 64 का गहन विश्लेषण किया, विशेष रूप से उप-धारा (1) और उप-धारा (2) के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। पीठ ने कहा कि धारा 64(2) का लाभ केवल तभी मिलता है जब निजी हस्तांतरण “कुर्की से पहले किए गए और पंजीकृत किसी अनुबंध के अनुसरण में” किया गया हो।
1. घटनाओं का क्रम (Timeline): कोर्ट ने मामले की निर्विवाद तारीखों पर गौर किया:
- मॉर्गेज की तारीख: 30.07.2016
- कुर्की (Attachment) की तारीख: 25.07.2017
- एग्रीमेंट ऑफ सेल-सह-जीपीए: 11.09.2018
- सेल डीड: 27.01.2020
पीठ ने पाया कि ‘एग्रीमेंट ऑफ सेल-सह-जीपीए’ (Ex.A7) कुर्की के बाद निष्पादित किया गया था। इसके अलावा, रिकॉर्ड पर ऐसा कोई पंजीकृत अनुबंध नहीं था जो कुर्की से पहले अपीलकर्ता के पक्ष में किया गया हो।
2. धारा 64 सीपीसी का अनुप्रयोग: सुप्रीम कोर्ट के डोकाला हरि बाबू बनाम कोटरा अप्पा (2022) के फैसले का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने दोहराया कि धारा 64(2) सीपीसी का लाभ लेने के लिए, बाद के खरीदार को यह साबित करना होगा कि उसने कुर्की के आदेश से पहले एक पंजीकृत लेनदेन में प्रवेश किया था।
कोर्ट ने कहा: “मौजूदा मामले में, क्लेम पेटीशनर ने कुर्की के आदेश से पहले लेनदेन में प्रवेश नहीं किया है। सेल डीड कुर्की की तारीख के बाद की है और क्लेम पेटीशनर के पक्ष में कुर्की के आदेश से पहले की तारीख का कोई बिक्री समझौता (Agreement of Sale) नहीं है।”
3. हस्तांतरण और जीपीए की प्रकृति: कोर्ट ने अपीलकर्ता के पूर्व-कुर्की मॉर्गेज वाले तर्क को खारिज कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि सेल डीड (Ex.A1) फाइनेंस कंपनी (मॉर्गेजी) द्वारा अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए नहीं की गई थी। इसके विपरीत, फाइनेंस कंपनी ने जजमेंट डेब्टर (विक्रेता) के ‘पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर’ के रूप में सेल डीड निष्पादित की थी।
सुप्रीम कोर्ट के सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम हरियाणा राज्य (2012) के फैसले का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने कहा कि पावर ऑफ अटॉर्नी अचल संपत्ति में किसी भी अधिकार, शीर्षक या हित के हस्तांतरण का दस्तावेज नहीं है।
4. मॉर्गेजी की बिक्री की शक्ति: कोर्ट ने संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) की धारा 69 का भी विश्लेषण किया, जो मॉर्गेजी की बिक्री की शक्ति से संबंधित है। पीठ ने पाया कि यह बिक्री धारा 69(1) की विशिष्ट शर्तों के तहत भुगतान में चूक होने पर मॉर्गेजी द्वारा नहीं की गई थी, और न ही धारा 69(2) के तहत नोटिस की आवश्यकताओं का पालन किया गया था।
कोर्ट ने कहा: “30.07.2016 की मॉर्गेज तारीख, जो कुर्की से पहले है, वर्तमान मामले में प्रासंगिक नहीं है, क्योंकि बिक्री गिरवी रखने वाले (Mortgagor) द्वारा गिरवीदार (Mortgagee) के रूप में नहीं की गई है।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 27 जनवरी, 2020 की सेल डीड सीपीसी की धारा 64(1) के अनुसार कुर्की के तहत लागू करने योग्य दावों के खिलाफ शून्य है। कोर्ट ने माना कि धारा 64(2) के तहत अपवाद यहाँ लागू नहीं होता क्योंकि बिक्री का कोई पूर्व पंजीकृत समझौता मौजूद नहीं था।
पीठ ने निर्णय सुनाया: “धारा 64(1) सीपीसी आकर्षित होती है। सेल डीड (Ex.A1) शून्य है।”
तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई और प्रधान जिला न्यायाधीश, विशाखापत्तनम के आदेश को बरकरार रखा गया।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: श्री पोडिलापु श्रीनिवास राव बनाम श्री गंड्रेटी उगादी और अन्य
- केस नंबर: अपील सूट संख्या 696/2025
- पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम

