आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 37 के तहत अपीलीय शक्तियां CPC जितनी व्यापक नहीं; बैंक खाता फ्रीज मामले में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 37 के तहत न्यायालय की अपीलीय शक्तियां सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के समान व्यापक नहीं हैं। न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम की खंडपीठ ने कहा कि धारा 37 के तहत अपीलीय शक्ति ‘अधीक्षण’ (Superintendence) या ‘पुनरीक्षण’ (Revisionary) शक्तियों के समान है, जो केवल संबंधित कार्यवाही के दायरे तक सीमित होती है।

हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी मेसर्स जेपीआर प्रोजेक्ट्स द्वारा दायर एक अपील को खारिज करते हुए की। अपीलकर्ता ने अपने करंट अकाउंट पर लगे पूर्ण प्रतिबंध (Freeze) को हटाने की मांग की थी, जिसे निचली अदालत ने केवल करों और वैधानिक बकाया भुगतान के लिए सीमित राहत दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

मेसर्स जेपीआर प्रोजेक्ट्स एक पार्टनरशिप फर्म है जो निर्माण गतिविधियों से जुड़ी है। फर्म के मैनेजिंग पार्टनर श्री जंगा पुन्ना रेड्डी की मृत्यु के बाद, जीवित भागीदारों (अपीलकर्ताओं) और मृतक पार्टनर के कानूनी वारिसों (उत्तरदाताओं) के बीच विवाद शुरू हो गया।

अपीलकर्ताओं का आरोप था कि उत्तरदाताओं ने एक्सिस बैंक को 24 मई 2024 को फर्म का बैंक खाता फ्रीज करने के एकतरफा निर्देश दिए। यह कार्रवाई 10 फरवरी 2024 की पुनर्गठित पार्टनरशिप डीड के बावजूद की गई, जिसमें अपीलकर्ताओं को वित्तीय संचालन का विशेष अधिकार दिया गया था। अपीलकर्ताओं का कहना था कि खाता फ्रीज होने से जीएसटी, टीडीएस, पीएफ और वेंडरों के भुगतान रुक गए हैं, जिससे फर्म का अस्तित्व खतरे में है।

दूसरी ओर, उत्तरदाताओं ने आरोप लगाया कि अपीलकर्ताओं ने ₹1.55 करोड़ की राशि का गबन किया है और पार्टनरशिप डीड व अन्य समझौते (MoUs) तब धोखाधड़ी से तैयार कराए गए जब दिवंगत पार्टनर अस्पताल में गंभीर स्थिति में थे।

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ट्रायल कोर्ट का आदेश

विशाखापत्तनम स्थित कमर्शियल डिस्प्यूट्स के स्पेशल जज ने 31 जुलाई 2025 को अपीलकर्ताओं के धारा 9 के आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार किया था। अदालत ने बैंक खाते को केवल सरकारी करों और वैधानिक शुल्कों के भुगतान के लिए 90 दिनों की अवधि हेतु खोलने का आदेश दिया था। अपीलकर्ताओं ने इसी “आंशिक राहत” को चुनौती देते हुए पूरे खाते को बहाल करने की मांग की थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से: वकील श्री पतंजलि प्रमिदिघंतम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मॉडर्न मेटल इंडस्ट्रीज बनाम श्रीमती शांति परोला मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि बैंक खाता फर्म की “जीवन रेखा” है। उन्होंने कहा कि चूंकि स्पेशल जज ने माना था कि अपीलकर्ताओं से परामर्श किए बिना खाता फ्रीज किया गया, इसलिए फर्म को “ठप” होने से बचाने के लिए खाता पूरी तरह बहाल किया जाना चाहिए था।

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उत्तरदाता की ओर से: वकील श्री वी. वी. एन. नरसिम्हम ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता पहले ही बड़ी रकम का दुरुपयोग कर चुके हैं, इसलिए पूर्ण राहत का कोई ‘प्राइमा फेसी’ (प्रथम दृष्टया) मामला नहीं बनता। उन्होंने कहा कि अंतरिम आदेश ने वैधानिक देनदारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 9 (अंतरिम उपाय) और धारा 37 (अपील) के संबंधों पर विस्तार से चर्चा की।

1. अपीलीय शक्ति के दायरे पर: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पंजाब स्टेट सिविल सप्लाइज कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम मेसर्स सन्मान राइस मिल्स मामले का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया:

“अधिनियम की धारा 37 का दायरा प्रकृति में संक्षिप्त है और यह एक सामान्य सिविल अपील की तरह नहीं है… अपीलीय न्यायालय के पास साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन के आधार पर यह तय करने का अधिकार नहीं है कि आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का निर्णय सही है या गलत।”

खंडपीठ ने आगे कहा:

“अपीलीय क्षेत्राधिकार के प्रयोग में, यह न्यायालय उन शक्तियों से आगे नहीं जा सकता जो धारा 9 के तहत प्रयोग की जा सकती हैं और उसके पास सिविल प्रक्रिया संहिता जैसी व्यापक शक्तियां नहीं होंगी। अपीलीय शक्ति पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते हुए अधीक्षण की शक्ति की तरह होगी।”

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2. आर्बिट्रेशन शुरू करने की अनिवार्यता: धारा 9(2) के अनुसार, अंतरिम आदेश के 90 दिनों के भीतर आर्बिट्रेशन की कार्यवाही शुरू होना अनिवार्य है। कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ताओं ने धारा 21 का नोटिस 7 नवंबर 2025 को दिया, जो 31 जुलाई के आदेश से 90 दिनों की वैधानिक अवधि के बाद था।

3. फ्रीज के गुणों पर: कोर्ट ने कहा कि इस मामले में तथ्य विवादित हैं और गबन व धोखाधड़ी के आरोपों पर अंतिम निर्णय आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल द्वारा ही लिया जाना चाहिए।

निर्णय

हाईकोर्ट ने स्पेशल जज के आदेश में कोई अवैधता नहीं पाई और माना कि बैंक खाते का उपयोग केवल वैधानिक बकाया के लिए सीमित रखना सही था। अपीलकर्ताओं द्वारा अपीलीय शक्तियों के हस्तक्षेप के लिए कोई ठोस आधार नहीं दिखाया जा सका।

हाईकोर्ट ने अपील को बिना किसी खर्च (Costs) के खारिज कर दिया।

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