आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने भीमावरम कंपोस्ट यार्ड के लिए भूमि अधिग्रहण अवार्ड और सेक्शन 6 की घोषणा को किया रद्द

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने भीमावरम में म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट कंपोस्ट यार्ड (Municipal Solid Waste Compost Yard) के लिए भूमि अधिग्रहण के मामले में एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 6 के तहत जारी घोषणा और उसके बाद 27 अप्रैल 2007 को पारित अवार्ड (Award) को रद्द कर दिया है।

न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी की पीठ ने स्पष्ट किया कि चूँकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह निर्देश दिया था कि अधिनियम की धारा 5A के तहत जांच अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए, इसलिए आपातकालीन प्रावधानों (Urgency Clause) का उपयोग करके जांच को दरकिनार करने की पिछली प्रक्रिया को वैध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि धारा 5A की जांच के बिना जारी की गई धारा 6 की घोषणा और अवार्ड का “कोई कानूनी प्रभाव नहीं है और यह गिर जाएगा (fall to the ground)।”

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद पश्चिम गोदावरी जिले के भीमावरम मंडल के येनामुदुरू गांव में सर्वे नंबर 318 में स्थित 14.56 सेंट भूमि के अधिग्रहण से जुड़ा है। भीमावरम नगरपालिका ने ‘म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम, 2000’ के तहत एक कंपोस्ट यार्ड स्थापित करने के लिए इस भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की थी।

20 फरवरी 2007 को, भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 4(1) के तहत एक अधिसूचना जारी की गई, जिसमें धारा 17(4) के तहत ‘अर्जेंसी क्लॉज’ का उपयोग करते हुए धारा 5A के तहत होने वाली अनिवार्य जांच को हटा दिया गया था। इसके परिणामस्वरूप, धारा 6 के तहत घोषणा जारी की गई और 27 अप्रैल 2007 को अवार्ड (नंबर 2/2007-08) पारित कर दिया गया।

जमीन मालिकों, एस. पिचप्पन (अब मृत) और अन्य ने अर्जेंसी क्लॉज को लागू करने को चुनौती दी। पिछले मुकदमे (रिट याचिका संख्या 5905/2007) में, हाईकोर्ट ने धारा 5A की जांच को हटाने के निर्णय को अतार्किक करार दिया था। यह मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंचा (सिविल अपील संख्या 3634/2012), जिसने 17 अप्रैल 2012 को अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे 28 अगस्त 2009 के नोटिस के आधार पर धारा 5A के तहत जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाएं।

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सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद, जिला कलेक्टर ने जांच की और 4 जुलाई 2012 को याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों को खारिज करने की सिफारिश की। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने दो याचिकाएं दायर कीं:

  1. रिट याचिका संख्या 19806/2009: मूल धारा 4(1) अधिसूचना, धारा 6 की घोषणा, अवार्ड और धारा 5A नोटिस को चुनौती दी गई।
  2. रिट याचिका संख्या 24126/2012: जिला कलेक्टर की 4 जुलाई 2012 की कार्यवाही को चुनौती दी गई।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील श्री वरुण रेड्डी ने तर्क दिया कि येनामुदुरू गांव भीमावरम नगरपालिका की सीमा से बाहर स्थित है। उन्होंने म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम, 2000 के नियम 4 का हवाला दिया, जो कहता है कि प्रत्येक नगरपालिका प्राधिकरण “नगरपालिका के क्षेत्रीय क्षेत्र के भीतर” नियमों के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार होगा। उनका कहना था कि नगरपालिका के उद्देश्यों के लिए उसकी सीमा के बाहर की भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि लैंडफिल साइट आबादी, जल निकायों और मवेशियों के शेड के बेहद करीब है, जो नियमों की अनुसूची III का उल्लंघन है। उन्होंने पद्मा सुंदर राव बनाम तमिलनाडु राज्य और विजय नारायण थट्टे बनाम महाराष्ट्र राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि धारा 6 के तहत घोषणा करने की वैधानिक समय सीमा समाप्त हो चुकी है।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों (सरकार और नगरपालिका) की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि आपत्तियों पर उचित विचार किया गया था और उन्हें वैध कारणों से खारिज किया गया। उन्होंने बताया कि भूमि आबादी से 1.1 किमी दूर है और इससे जल निकायों को कोई प्रदूषण नहीं होगा। उन्होंने जनहित में कंपोस्ट यार्ड की “अत्यावश्यक आवश्यकता” पर जोर दिया और कहा कि नियम 4 कचरे के निपटान के लिए नगरपालिका सीमा के बाहर भूमि अधिग्रहण करने से नहीं रोकता है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और फैसला

नियम 4 पर कोर्ट का रुख: जस्टिस तिलहरी ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को खारिज कर दिया कि नगरपालिका सीमा के बाहर भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा:

“नियम 4 नगरपालिका प्राधिकरण की जिम्मेदारी तय करता है कि वह अपने क्षेत्र के कचरे का प्रबंधन करे। इसका मतलब यह नहीं है कि नगरपालिका क्षेत्र के कचरे का निपटान उसी क्षेत्र के भीतर किया जाना चाहिए… इस तरह के तर्क को स्वीकार करना भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत राज्य सरकार की शक्ति को सीमित करना होगा।”

धारा 6 की घोषणा और अवार्ड की वैधता पर: कोर्ट ने माना कि धारा 4(1) अधिसूचना और धारा 5A नोटिस को चुनौती देना अब उचित नहीं है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इनके आधार पर जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया था। हालांकि, 2007 में जारी धारा 6 की घोषणा और अवार्ड के संबंध में, कोर्ट ने उन्हें रद्द करने का फैसला सुनाया।

कोर्ट का तर्क था कि जब धारा 5A की जांच न कराने के निर्णय को अवैध घोषित कर दिया गया और नई जांच का आदेश दिया गया, तो उस (पुरानी) प्रक्रिया के आधार पर उठाए गए अगले कदम (जैसे धारा 6 की घोषणा और अवार्ड) स्वतः ही अस्तित्वहीन हो जाते हैं।

“इस न्यायालय का मत है कि एक बार जब धारा 5A के तहत जांच का निर्देश दिया गया, तो इसका परिणाम यह होगा कि धारा 4(1) की अधिसूचना के बाद की गई पिछली कार्रवाई, जिसमें तात्कालिकता (Urgency) का हवाला देकर जांच को हटा दिया गया था, यानी धारा 6 की अधिसूचना जारी करना और 27.04.2007 का अवार्ड पारित करना, का कोई कानूनी प्रभाव नहीं होगा और वह गिर जाएगा (fall to the ground)।”

लिमिटेशन (समय सीमा) पर: नई धारा 6 की घोषणा के लिए समय सीमा के मुद्दे पर, कोर्ट ने पद्मा सुंदर राव (2002) के फैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने दोहराया कि धारा 6 के तहत घोषणा धारा 4(1) अधिसूचना के एक वर्ष के भीतर की जानी चाहिए, जिसमें कोर्ट द्वारा दिए गए स्टे की अवधि को बाहर रखा जाएगा।

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अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार धारा 5A की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद अधिग्रहण के पक्ष में निर्णय लेती है, तो नई धारा 6 की घोषणा तभी जारी की जा सकती है जब वह वैधानिक समय सीमा (स्टे अवधि को छोड़कर) के भीतर हो।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए:

  1. रिट याचिका संख्या 24126/2012: इसका निपटारा करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह तीन महीने के भीतर कलेक्टर की सिफारिशों और रिकॉर्ड पर विचार करते हुए भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 5A के तहत उचित निर्णय ले।
  2. रिट याचिका संख्या 19806/2009:
    • आंशिक रूप से स्वीकार: धारा 6 की अधिसूचना और 27 अप्रैल 2007 के अवार्ड नंबर 2/2007-08 को रद्द कर दिया गया।
    • आंशिक रूप से खारिज: 20 फरवरी 2007 की धारा 4(1) अधिसूचना और 28 अगस्त 2009 के धारा 5A नोटिस को चुनौती देने वाली मांग को अस्वीकार कर दिया गया।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि सरकार अधिग्रहण के पक्ष में है, तो धारा 6 की घोषणा समय सीमा के भीतर होनी चाहिए। यदि समय सीमा समाप्त हो चुकी है या सरकार अधिग्रहण के खिलाफ फैसला करती है, तो याचिकाकर्ताओं को उनकी भूमि का कब्जा उचित अवधि के भीतर वापस लौटाना होगा।

केस विवरण

  • केस टाइटल: एस. पिचप्पन (मृत) और 3 अन्य बनाम जिला कलेक्टर और 3 अन्य
  • केस नंबर: रिट याचिका संख्या 19806 वर्ष 2009 और 24126 वर्ष 2012
  • कोरम: न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी

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