विजयवाड़ा: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि यदि किसी न्यायिक आदेश में लागू किए गए कानूनी सिद्धांत सही हैं और मामले के तथ्यों पर उचित रूप से लागू होते हैं, तो उस आदेश को केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि उसमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल द्वारा जनरेट किए गए गैर-मौजूद (फर्जी) केस लॉ का हवाला दिया गया है।
जस्टिस रवि नाथ तिलहरी ने एक सिविल रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया। यह याचिका निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थी, जिसमें AI द्वारा जनरेट किए गए चार ऐसे फैसलों का हवाला दिया गया था, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं था। हाईकोर्ट ने आदेश को कानूनी रूप से सही मानते हुए बरकरार रखा, लेकिन साथ ही न्यायिक प्रक्रियाओं में AI के उपयोग को लेकर कड़ी चेतावनी जारी की। कोर्ट ने कहा, “आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के ऊपर वास्तविक बुद्धिमत्ता (Actual Intelligence) के प्रयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।”
संक्षिप्त विवरण
हाईकोर्ट विजयवाड़ा के पांचवें अतिरिक्त जूनियर सिविल जज के एक आदेश के खिलाफ दायर रिवीजन याचिका पर सुनवाई कर रहा था। निचली अदालत ने एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट को खारिज करने से इनकार कर दिया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि निचली अदालत का आदेश ऐसे केस लॉ पर आधारित है जो अस्तित्व में ही नहीं हैं। हाईकोर्ट ने पुष्टि की कि उद्धरण वास्तव में फर्जी थे और ट्रायल जज द्वारा उपयोग किए गए AI टूल द्वारा जनरेट किए गए थे। हालांकि, हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि चूंकि कमिश्नर की रिपोर्ट के साक्ष्य मूल्य (Evidentiary Value) के संबंध में मूल कानूनी तर्क सही थे, इसलिए फर्जी उद्धरणों का संदर्भ आदेश को दूषित नहीं करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) के लिए दायर एक मुकदमे (O.S.No.773 of 2019) से उत्पन्न हुआ था। कार्यवाही के दौरान, प्रतिवादी संख्या 1 द्वारा खरीदी गई संपत्ति की पहचान करने के लिए एक एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया गया था। बाद में, प्रतिवादियों (याचिकाकर्ताओं) ने एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट को रद्द करने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 151 के तहत एक आवेदन (I.A.No.457 of 2025) दायर किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कमिश्नर ने वादी के साथ मिलीभगत की थी और सर्वेक्षण के संबंध में हाईकोर्ट के पहले के निर्देशों का पालन करने में विफल रहे थे।
19 अगस्त, 2025 के आदेश द्वारा, निचली अदालत ने प्रतिवादियों के आवेदन को खारिज कर दिया। अपने आदेश में, निचली अदालत ने अपने निर्णय का समर्थन करने के लिए चार फैसलों का हवाला दिया:
- सुब्रमणि बनाम एम. नटराजन ((2013) 14 SCC 95)
- चिदंबरम पिल्लई बनाम एसएएल रामासामी (1971 (2) SCC 68)
- लक्ष्मी देवी बनाम के. प्रभा ((2006) 5 SCC 551)
- गजानन बनाम रामदास ((2015) 6 SCC 223)
इस खारिज आदेश से व्यथित होकर, प्रतिवादियों ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के विद्वान वकील, श्री एम. वेंकट शिव तेजा ने तर्क दिया कि विद्वान निचली अदालत का आदेश कानूनन सही नहीं है। उन्होंने दलील दी कि निचली अदालत द्वारा जिन उद्धरणों (Citations) का सहारा लिया गया है, वे अस्तित्व में ही नहीं हैं – न तो उद्धरण द्वारा और न ही पक्षकारों के नामों द्वारा। उन्होंने तर्क दिया कि कानून के किसी प्रस्ताव के लिए गैर-मौजूद फैसलों पर आधारित आदेश को रद्द किया जाना चाहिए।
कोर्ट की जांच और ट्रायल जज की रिपोर्ट
दलीलों का संज्ञान लेते हुए, हाईकोर्ट ने पहले ही निचली अदालत से उद्धरणों के संबंध में एक रिपोर्ट मांगी थी। न्यायिक अधिकारी ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें स्वीकार किया गया कि उन्होंने पहली बार एक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस टूल का उपयोग किया था। अधिकारी ने बताया कि उन्हें विश्वास था कि AI द्वारा प्रदर्शित संदर्भ वास्तविक थे और उन्होंने सद्भावना में उन्हें शामिल किया। हालांकि, हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सत्यापन करने पर, उन्हें एहसास हुआ कि उद्धरण “AI टूल द्वारा जनरेट किए गए थे और वास्तविक फैसले नहीं थे।”
न्यायिक अधिकारी ने व्यक्त किया कि गलत उद्धरण देने का कोई इरादा नहीं था और यह गलती पूरी तरह से एक स्वचालित स्रोत पर निर्भरता के कारण हुई। हाईकोर्ट ने भविष्य में अधिक सावधानी बरतने के अधिकारी के आश्वासन को नोट करते हुए रिपोर्ट स्वीकार कर ली।
कोर्ट का विश्लेषण
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के उपयोग पर
जस्टिस तिलहरी ने फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कानूनी क्षेत्र में अनियमित AI उपयोग के जोखिमों पर समर्पित किया। कोर्ट ने कहा कि AI, अपने वर्तमान चरण में, “चेतना, नैतिक तर्क, या साक्ष्य तौलने की क्षमता, या मानव आचरण की बारीकियों की सराहना करने की क्षमता नहीं रखता है।”
कोर्ट ने “भ्रमित” (Hallucinated) या फर्जी उद्धरणों के खतरों को उजागर करने वाले अंतरराष्ट्रीय और घरेलू उदाहरणों का उल्लेख किया:
- वेंकटेश्वरलू बंदला बनाम सॉलिसिटर्स रेगुलेशन अथॉरिटी (इंग्लैंड और वेल्स हाईकोर्ट): जहां फर्जी प्राधिकरण के उद्धरण के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का आह्वान किया गया था।
- फ्रेडरिक आयंडे और अन्य बनाम द लंदन बरो ऑफ हरिंगे (इंग्लैंड और वेल्स हाईकोर्ट): जिसमें नोट किया गया कि काल्पनिक प्राधिकरणों का संदर्भ देना सख्त रूप से अस्वीकार्य है।
- मिस्टर दीपक बनाम हार्ट एंड सोल एंटरटेनमेंट लिमिटेड (बॉम्बे हाईकोर्ट): जहां कोर्ट ने AI-जनित सामग्री को क्रॉस-वेरिफाई करने की जिम्मेदारी पर जोर दिया।
- अन्नया कोचा शेट्टी बनाम लक्ष्मीबाई नारायण सातोस (सुप्रीम कोर्ट): जिसमें नोट किया गया कि हालांकि तकनीक दक्षता बढ़ाती है, लेकिन इसमें सावधानी की आवश्यकता है।
जस्टिस तिलहरी ने कहा:
“जो लोग कानूनी शोध के लिए AI का उपयोग करते हैं, उन्हें इसके आउटपुट की कड़ाई से जांच करनी चाहिए, जिसमें उद्धृत प्राधिकरण भी शामिल हैं… AI सिस्टम ऐसे जवाब दे सकते हैं जो प्रेरक लगते हैं लेकिन तथ्यात्मक या कानूनी रूप से गलत होते हैं।”
कोर्ट ने आगे निर्देश दिया:
“विद्वान निचली अदालतें फैसलों में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस टूल्स का उपयोग करते समय सतर्क और सावधान रहें और न्यायपूर्ण निर्णय लेने के लिए न्यायिक विवेक (Judicial Application of Mind) से कार्य करें, यह सुनिश्चित करते हुए कि निर्णय/आदेश सही कानूनी सिद्धांतों पर आधारित हों।”
आक्षेपित आदेश की वैधता पर
फर्जी उद्धरणों पर निर्भरता के बावजूद, हाईकोर्ट ने यह जांच की कि क्या निर्णय स्वयं – यानी कमिश्नर की रिपोर्ट को रद्द करने से इनकार करना – कानूनी रूप से सही था या नहीं।
कोर्ट ने CPC के आदेश XXVI नियम 10 के तहत कमिश्नर की रिपोर्ट के साक्ष्य मूल्य का विश्लेषण किया। बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ ((1984) 3 SCC 161) और एम.पी. राज्य तिलहन उत्पादक सहकारी संघ मर्यादित बनाम मोदी ट्रांसपोर्ट सर्विस ((2022) 14 SCC 345) सहित स्थापित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा करते हुए, हाईकोर्ट ने दोहराया कि:
- कमिश्नर की रिपोर्ट एक “मंत्रिस्तरीय कार्य” (Ministerial Act) है, न कि “न्यायिक कार्य”।
- रिपोर्ट साक्ष्य का एक टुकड़ा है जिसे अन्य साक्ष्यों के मुकाबले तौला जाना चाहिए।
- यह “गैर-न्यायिक प्रकृति” (Non-adjudicatory) की होती है।
- रिपोर्ट पर आपत्तियों का परीक्षण परीक्षण (Trial) के दौरान जिरह (Cross-examination) के माध्यम से किया जाना चाहिए, न कि केवल मिलीभगत के आरोपों पर रिपोर्ट को शुरू में ही रद्द कर देना चाहिए।
हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत का तर्क – कि रिपोर्ट पर विचार ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए और मिलीभगत के आरोपों के लिए सबूत की आवश्यकता होती है – “पूरी तरह से न्यायसंगत” था और देश के कानून द्वारा समर्थित था।
जस्टिस तिलहरी ने निष्कर्ष निकाला:
“आदेश में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस द्वारा जनरेट किए गए गैर-मौजूद उद्धरणों/फैसलों का केवल उल्लेख आदेश को दूषित नहीं करेगा यदि आदेश में विचार किया गया कानून देश का सही कानून है और मामले के तथ्यों पर सही कानून को सही ढंग से लागू करने में कोई गलती नहीं है।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि आक्षेपित आदेश में कानून या अधिकार क्षेत्र की कोई त्रुटि नहीं है। नतीजतन, सिविल रिवीजन याचिका को बिना किसी लागत के खारिज कर दिया गया।

