उपलब्ध आधारों को पहले न उठाने पर आदेश की अंतिमता को चुनौती नहीं दी जा सकती: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने निर्णय ऋणी की याचिका खारिज की

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी पक्ष के पास पिछले मुकदमे के दौरान कोई तर्क या आधार उपलब्ध था, लेकिन उसने उसे उस समय न्यायालय के समक्ष नहीं उठाया, तो बाद में उस आधार पर पिछले आदेश की अंतिमता (Finality) को चुनौती नहीं दी जा सकती।

न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी की पीठ ने एक निर्णय ऋणी (Judgment Debtor) द्वारा दायर सिविल रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया, जिसने निष्पादन कार्यवाही (Execution Proceedings) में जारी गिरफ्तारी वारंट को चुनौती दी थी। कोर्ट ने माना कि समन्वय पीठ (Coordinate Bench) द्वारा पारित आदेश को उन आधारों पर अस्थिर नहीं किया जा सकता जो पहले से उपलब्ध थे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला येलपु वराह वेंकट शिव सत्यनारायण उर्फ श्रीनु (याचिकाकर्ता) और सिलापरासेट्टी वीर वेंकट शिव सत्यनारायण उर्फ बॉबी (प्रतिवादी) के बीच का है। अतिरिक्त सीनियर सिविल जज, अनाकापल्ली ने 6 दिसंबर, 2016 को एक मूल वाद (O.S. No. 132 of 2013) में याचिकाकर्ता के खिलाफ 6,50,000 रुपये की डिक्री पारित की थी।

डिक्री धारक ने इसके बाद निष्पादन याचिका (E.P. No. 25 of 2019) दायर की। निष्पादन न्यायालय ने 21 अप्रैल, 2022 को यह मानते हुए कि निर्णय ऋणी के पास भुगतान के पर्याप्त साधन हैं लेकिन वह जानबूझकर भुगतान नहीं कर रहा है, उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने का आदेश दिया।

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याचिकाकर्ता ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी (C.R.P. No. 932 of 2022)। हाईकोर्ट ने 31 जनवरी, 2025 को इस याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को शेष राशि का भुगतान करने के लिए नौ महीने का समय दिया था। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि “चूक की स्थिति में, ट्रायल कोर्ट बिना हाईकोर्ट के संदर्भ के याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी के लिए 21.04.2022 के आदेश के साथ आगे बढ़ सकता है।”

जब याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने में विफल रहा, तो निष्पादन न्यायालय ने 31 अक्टूबर, 2025 को फिर से गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया। इसी आदेश को चुनौती देने के लिए वर्तमान याचिका दायर की गई थी।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील श्री पी. राजशेखर ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को प्रिंसिपल सीनियर सिविल जज, अनाकापल्ली द्वारा एक अन्य मामले (I.P. No. 3 of 2014) में 1 फरवरी, 2024 के आदेश के तहत ‘दिवालिया’ (Insolvent) घोषित किया जा चुका है।

उन्होंने प्रोविंशियल इनसॉल्वेंसी एक्ट, 1920 की धारा 28 का हवाला देते हुए कहा कि न्यायनिर्णयन का आदेश याचिका प्रस्तुत करने की तारीख से प्रभावी माना जाता है। यह तर्क दिया गया कि दिवालियापन के आदेश की प्रति निष्पादन न्यायालय के समक्ष पेश की गई थी, लेकिन उस पर विचार नहीं किया गया। वकील ने यह भी स्वीकार किया कि 1 फरवरी, 2024 का दिवालियापन आदेश हाईकोर्ट के समक्ष पिछली याचिका (C.R.P. No. 932 of 2022) की सुनवाई के दौरान नहीं लाया गया था, जिसका फैसला 31 जनवरी, 2025 को हुआ था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी

न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी ने निष्पादन न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि दिवालिया घोषित करने वाला आदेश (1 फरवरी, 2024) हाईकोर्ट की पिछली याचिका के निपटारे (31 जनवरी, 2025) से पहले अस्तित्व में था, लेकिन इसे कोर्ट के संज्ञान में नहीं लाया गया था।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

“इस कोर्ट का मत है कि यदि याचिकाकर्ता को दिवालिया घोषित किया गया था, तो 31.01.2025 का अंतिम आदेश पारित होने से पहले पिछली सिविल रिवीजन याचिका संख्या 932/2022 में इस दलील को उठाया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जो दलील उपलब्ध थी, उसे नहीं उठाया गया।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निष्पादन न्यायालय हाईकोर्ट के पिछले निर्देशों से बाध्य था। प्रोविंशियल इनसॉल्वेंसी एक्ट के आधार पर कार्यवाही को चुनौती देने के प्रयास पर, कोर्ट ने ‘अंतिमता के सिद्धांत’ (Principle of Finality) को लागू किया।

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कोर्ट ने कहा, “31.01.2025 के फैसले से जुड़ी अंतिमता को इस समन्वय पीठ द्वारा उस आधार पर अस्थिर नहीं किया जा सकता जो 31.01.2025 के फैसले के समय उपलब्ध था, लेकिन उस समय उसे उठाया नहीं गया था।”

फैसला

हाईकोर्ट ने पाया कि 31 अक्टूबर, 2025 का आदेश, जिसे चुनौती दी गई थी, याचिकाकर्ता द्वारा भुगतान में चूक करने पर हाईकोर्ट के पिछले निर्देशों के अनुपालन में ही पारित किया गया था। अतः इसमें कोई अवैधता नहीं पाई गई।

याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:

“जैसा कि ऊपर देखा गया है, मुझे वर्तमान सिविल रिवीजन याचिका में चुनौती दिए गए आदेश में कोई अवैधता नहीं मिलती है। इसलिए, वर्तमान याचिका खारिज की जाती है।”

हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पिछले आदेश के संबंध में “कानून के तहत खुले अन्य कदम उठाने, जैसा कि सलाह दी जा सकती है,” की स्वतंत्रता प्रदान की।

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