भरण-पोषण एक निरंतर दायित्व; अन्य वैवाहिक मुकदमों की लंबितता पति के लिए बचाव नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का अधिकार एक “निरंतर और आवर्ती पात्रता” (recurring entitlement) है, जो अन्य संबंधित वैवाहिक कार्यवाहियों की लंबितता या परिणामों से समाप्त नहीं होती है। पति द्वारा दायर एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Case) को खारिज करते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण सामाजिक न्याय का एक उपाय है जिसे बेसहारापन और आवारागर्दी को रोकने के लिए बनाया गया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति वाई. लक्ष्मणा राव द्वारा विजयवाड़ा स्थित फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनाया गया, जिसमें पत्नी और बच्चे को भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

पुनरीक्षणकर्ता (याचिकाकर्ता), चिन्नान किशोर कुमार ने 9 मार्च, 2018 के फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। उस आदेश में उसे अपनी पत्नी (प्रतिवादी संख्या 2) को ₹7,500 और अपने नाबालिग बच्चे (प्रतिवादी संख्या 3) को ₹5,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट का आदेश प्रक्रियात्मक त्रुटियों से भरा था। उसका दावा था कि यह “मुकदमेबाजी का दूसरा दौर” है क्योंकि इससे पहले एक भरण-पोषण का मामला (M.C. No. 144/2017) वापस लिया जा चुका था। उसने यह भी दलील दी कि तलाक (D.O.P. No. 3/2016) और संरक्षकता (G.W.O.P. No. 52/2017) जैसे अन्य मामलों के लंबित रहते हुए नया मामला दर्ज करना केवल उत्पीड़न का जरिया है।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील: श्री एम. वेणु गोपाल ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने केवल मुख्य हलफनामे (Chief Affidavit) के आधार पर भरण-पोषण देकर प्रक्रियात्मक उल्लंघन किया है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिवादी पत्नी ने नकद भुगतान या ‘आदापादुचुकतनम’ (Adapaduchukatnam) के आरोपों के संबंध में कोई दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया था।

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प्रतिवादियों के वकील: विधिक सहायता वकील श्री ए.के. किशोर रेड्डी ने तर्क दिया कि एक पति और पिता होने के नाते याचिकाकर्ता तकनीकी आधार पर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। उन्होंने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य बेसहारापन को रोकना है और दस्तावेजी सबूतों की कमी पत्नी की विश्वसनीय गवाही को कमतर नहीं करती। उन्होंने जोर देकर कहा कि भरण-पोषण का अधिकार स्वतंत्र और आवर्ती प्रकृति का है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने भारत में भरण-पोषण के न्यायशास्त्रीय आधार की जांच की और इसे विवाह की स्थिति से उत्पन्न होने वाला एक “सामाजिक-कानूनी दायित्व” बताया।

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1. भरण-पोषण की प्रकृति पर: न्यायालय ने सविताबेन सोमभाई भाटिया बनाम गुजरात राज्य (2005) का हवाला देते हुए टिप्पणी की:

“भरण-पोषण का उद्देश्य अनैतिकता और बेसहारापन को रोकना तथा महिलाओं और बच्चों की आर्थिक स्थिति में सुधार करना है।”

2. प्रक्रियात्मक तकनीकी पर: न्यायमूर्ति राव ने हलफनामों के उपयोग के संबंध में याचिकाकर्ता के तर्क को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि धारा 125 Cr.P.C. के तहत कार्यवाही “संक्षिप्त प्रकृति” (summary in nature) की होती है, जिसे नागरिक मुकदमों की जटिलताओं के बिना त्वरित राहत देने के लिए बनाया गया है। न्यायालय ने माना कि मौखिक गवाही (PW1) साक्ष्य की सीमा को पूरा करने के लिए पर्याप्त थी।

3. समानांतर कार्यवाही और रेस ज्यूडिकाटा (Res Judicata) पर: हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस दावे को ठुकरा दिया कि पिछले मामले को वापस लेने से वर्तमान मामला बाधित होता है। निर्णय में कहा गया:

“भरण-पोषण का अधिकार कोई एकमुश्त इनाम नहीं है, बल्कि एक निरंतर और आवर्ती पात्रता है, जो दायित्व के प्रत्येक उल्लंघन पर नए सिरे से उत्पन्न होती है, और यह अन्य वैवाहिक कार्यवाहियों की लंबितता से प्रभावित नहीं होती।”

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के मामलों में ‘पूर्व न्याय’ (Res Judicata) का सिद्धांत लागू नहीं होता क्योंकि डिफ़ॉल्ट के प्रत्येक मामले के साथ अधिकार नए सिरे से बनता है।

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4. पति के कर्तव्य पर: शमीमा फारूकी बनाम शाहिद खान (2015) का उल्लेख करते हुए, हाईकोर्ट ने दोहराया कि बेरोजगारी जैसे बहाने एक स्वस्थ और सक्षम पति को उसके कानूनी कर्तव्य से मुक्त नहीं कर सकते। न्यायालय ने कहा कि भरण-पोषण “संवैधानिक सहानुभूति” का एक गतिशील उपकरण है जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 15(3) और 39 के दायरे में आता है।

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने पत्नी के लिए ₹7,500 और बच्चे के लिए ₹5,000 की राशि को याचिकाकर्ता की कमाई क्षमता और प्रतिवादियों की जरूरतों के अनुसार उचित और संतुलित माना। अदालत ने कहा कि इस आदेश में कोई भी अवैधता या अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन नहीं पाया गया है।

परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को बिना किसी लागत के खारिज कर दिया।

  • केस शीर्षक: चिन्नान किशोर कुमार बनाम आंध्र प्रदेश राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल रिविजन केस संख्या: 1009/2022

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