इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC की धारा 306) के मामले में आरोप तय करने के निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली एक आपराधिक निगरानी याचिका (Criminal Revision) को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोप तय करने (Framing of Charge) के चरण में अदालत को विस्तृत कारण दर्ज करने की आवश्यकता नहीं होती है। जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की पीठ ने कहा कि यदि यह “मानने का आधार” (Ground for presuming) है कि आरोपी ने अपराध किया है, तो कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए इतना ही पर्याप्त है और इस प्रारंभिक चरण में सबूतों की विस्तृत जांच (Roving inquiry) की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट अशोक सिंह उर्फ काली सिंह द्वारा दायर एक निगरानी याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिकाकर्ता ने गोरखपुर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (विशेष न्यायाधीश, पी.सी. एक्ट) द्वारा 24 जनवरी 2024 को धारा 306 IPC के तहत आरोप तय करने के आदेश और अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 22 अक्टूबर 2021 को अपराध का संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया और ट्रायल शुरू करने का रास्ता साफ कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष का मामला 2 मार्च 2020 की एक घटना से संबंधित है। जिला अस्पताल, गोरखपुर के एक वार्ड बॉय ने पुलिस को शवगृह में एक शव होने की सूचना दी थी। मृतक की पहचान दीन दयाल सिंह के रूप में हुई, जो याचिकाकर्ता अशोक सिंह का सगा भाई था। मृतक की जेब से एक सुसाइड नोट बरामद हुआ था।
उसी दिन दर्ज की गई प्राथमिकी (FIR) में आरोप लगाया गया कि सुसाइड नोट में मृतक ने अपनी मौत का कारण याचिकाकर्ता द्वारा किया गया उत्पीड़न बताया था। मृतक की मौत ट्रेन से कटने के कारण आई चोटों से हुई थी। जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और मजिस्ट्रेट ने अक्टूबर 2021 में मामले का संज्ञान लिया। इसके बाद, जनवरी 2024 में सत्र न्यायालय ने धारा 306 IPC के तहत आरोप तय किए।
पक्षकारों की दलीलें
निगरानीकर्ता (Revisionist) का पक्ष: याचिकाकर्ता के अधिवक्ता श्री राजीव चड्ढा ने कार्यवाही को चुनौती देते हुए कई आधार प्रस्तुत किए:
- दुष्प्रेरण (Abetment) के तत्व: यह तर्क दिया गया कि IPC की धारा 107 के तहत दुष्प्रेरण के आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद नहीं हैं।
- सुसाइड नोट की विश्वसनीयता: अधिवक्ता ने तर्क दिया कि सुसाइड नोट “प्लांट” किया गया था (साजिश के तहत रखा गया)। उन्होंने बताया कि पहले पैराग्राफ की सिर्फ दो लाइनों के बाद मृतक के कथित हस्ताक्षर हैं, और उसके बाद और भी लिखावट है। इसके अलावा, पहले पैराग्राफ में मृतक के पिता को भी जिम्मेदार ठहराया गया है, जिनकी मृत्यु घटना से चार महीने पहले ही हो चुकी थी।
- फोरेंसिक साक्ष्य: 3 अगस्त 2021 की एक विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) रिपोर्ट का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि संतोषजनक जांच के लिए 10-15 हस्ताक्षरों की आवश्यकता थी, जो उपलब्ध नहीं कराए गए थे।
- विरोधाभासी बयान: अधिवक्ता ने इस बात पर जोर दिया कि मृतक की पत्नी ने शुरुआत में बयान देने से इनकार कर दिया था और पुलिस को दी गई पहली अर्जी में कहा था कि आत्महत्या व्यापार में घाटे के कारण हुई है और परिवार का कोई सदस्य जिम्मेदार नहीं है। बाद में उन्होंने संपत्ति विवाद और उत्पीड़न का आरोप लगाया।
- प्रक्रियात्मक अनियमितता: तारीखों को लेकर एक तकनीकी आपत्ति उठाई गई। चार्जशीट पर 23 अक्टूबर 2021 की तारीख अंकित थी, जबकि मजिस्ट्रेट ने एक दिन पहले यानी 22 अक्टूबर 2021 को संज्ञान ले लिया था।
राज्य (State) का पक्ष: अपर शासकीय अधिवक्ता (A.G.A.) ने याचिका का विरोध करते हुए दलील दी कि:
- सुसाइड नोट और जांच के दौरान दर्ज किए गए गवाहों के बयान याचिकाकर्ता द्वारा उकसाने के कृत्य को दर्शाते हैं।
- आरोप तय करने के चरण में अदालत को विस्तृत कारण बताने की आवश्यकता नहीं है और केवल “गंभीर संदेह” (Grave suspicion) के आधार पर भी आरोप तय किए जा सकते हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
संज्ञान लेने के आदेश पर हाईकोर्ट ने सबसे पहले चार्जशीट और संज्ञान आदेश की तारीखों में विसंगति के मुद्दे को संबोधित किया। जस्टिस शैलेंद्र ने इसे “तारीख लिखने में मानवीय भूल” करार दिया और कहा कि अदालत इतनी अतार्किक नहीं हो सकती कि यह मान ले कि चार्जशीट के बिना ही संज्ञान ले लिया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसी विसंगति से पूरी कार्यवाही दूषित नहीं होती।
आरोप तय करने पर (धारा 227 बनाम 228 Cr.P.C.) अदालत ने Cr.P.C. की धारा 227 (उन्मोचन/Discharge) और धारा 228 (आरोप तय करना) का विस्तृत विश्लेषण किया। न्यायमूर्ति ने कहा:
“धारा 227 और 228 में प्रयुक्त भाषा स्पष्ट है। जहां धारा 227 के तहत आरोपी को डिस्चार्ज करते समय कारणों को रिकॉर्ड करना आवश्यक है; वहीं धारा 228 में जज को आरोप तय करने के लिए अपने कारणों को रिकॉर्ड करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इस चरण में इतना ही पर्याप्त है कि ‘यह मानने का आधार है कि अपराध किया गया है’।”
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (अमित कपूर बनाम रमेश चंद्र और दिनेश तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने दोहराया कि आरोप तय करने के चरण में अदालत का सरोकार सबूत से नहीं बल्कि “मजबूत संदेह” (Strong suspicion) से होता है।
सुसाइड नोट और फोरेंसिक रिपोर्ट पर सुसाइड नोट की सत्यता और हस्ताक्षरों की स्थिति के बारे में उठाई गई आपत्तियों पर अदालत ने कहा कि ये ट्रायल (विचारण) के विषय हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“अदालत इस चरण में यह नहीं मान सकती कि पहले पैराग्राफ के अंत में हस्ताक्षर करने के बाद, मृतक द्वारा आगे कुछ नहीं लिखा जा सकता था… मृतक के पिता की मृत्यु 15.12.2019 को हुई थी, यह तथ्य भी इस चरण में सुसाइड नोट को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।”
हैंडराइटिंग को लेकर विरोधाभासी रिपोर्टों पर जस्टिस शैलेंद्र ने कहा कि सुसाइड नोट की वैधता के बारे में इस चरण में कोई निश्चित राय व्यक्त नहीं की जा सकती। यह ट्रायल कोर्ट का काम है कि वह दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकाले।
निर्णय
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक निगरानी संख्या 1352/2024 को खारिज करते हुए निचली अदालतों के आदेशों को बरकरार रखा।
“माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई उपरोक्त टिप्पणियों के आलोक में, इस न्यायालय का मत है कि संदेह/गंभीर संदेह/धारणा मौजूद थी, जिसने न्यायालय को धारा 306 IPC के तहत आरोप तय करने के लिए बाध्य किया।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल आरोप तय करने के चरण तक सीमित हैं और इसे मामले के गुण-दोष पर राय नहीं माना जाना चाहिए।
केस डीटेल्स (Case Details):
- वाद शीर्षक: अशोक सिंह @ काली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 1352 ऑफ 2024
- कोरम: जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र
- उद्धरण (Citation): 2026:AHC:2274

