S. 106 BNSS | बैंक खाता फ्रीज करने के लिए पुलिस को मजिस्ट्रेट के पूर्व आदेश की आवश्यकता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साइबर क्राइम विभाग के निर्देश पर फ्रीज किए गए बैंक खाते को डिफ्रीज करने की मांग वाली याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 106 (जो पहले सीआरपीसी की धारा 102 थी) के तहत, पुलिस को किसी अपराध से जुड़ी संदिग्ध संपत्ति को जब्त करने के लिए मजिस्ट्रेट से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता मारूफा बेगम, जो कौशांबी जिले के प्राथमिक विद्यालय, सखाधा में शिक्षामित्र के पद पर कार्यरत हैं, ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बैंक ऑफ बड़ौदा को अपना बचत खाता डिफ्रीज करने का निर्देश देने की मांग की थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, 1 सितंबर 2022 को उनके खाते में गुजरात के एक फेडरल बैंक खाते से 35,000 रुपये जमा हुए थे। इसके बाद उनका खाता फ्रीज कर दिया गया। बैंक अधिकारियों ने बताया कि यह राशि मुश्ताक अली नामक व्यक्ति द्वारा ट्रांसफर की गई थी और आनंद साइबर क्राइम ब्रांच, गुजरात पुलिस ने इस लेनदेन के संबंध में खाते को ब्लॉक करने का निर्देश दिया था।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह न तो भेजने वाले को जानती हैं और न ही कथित लेनदेन से उनका कोई सरोकार है। चूंकि यह उनका वेतन खाता है, इसलिए उन्होंने इसे डिफ्रीज करने की प्रार्थना की थी।

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दलीलें

याचिकाकर्ता का पक्ष: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि खाताधारक को धन के स्रोत की जानकारी नहीं थी। उन्होंने अदालत से राशि निकालने की अनुमति देने का अनुरोध किया, यह तर्क देते हुए कि एक सरकारी कर्मचारी (शिक्षामित्र) होने के नाते वेतन खाता फ्रीज होने से उन्हें भारी कठिनाई हो रही है।

प्रतिवादी का पक्ष: इसके विपरीत, बैंक के वकील ने कहा कि खाता साइबर क्राइम विभाग, आनंद (गुजरात) के निर्देशों पर फ्रीज किया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि जांच एजेंसी या सक्षम अदालत के पूर्व अनुमोदन के बिना बैंक खाते को डिफ्रीज नहीं कर सकता, क्योंकि उक्त खाता जांच के तहत “संपत्ति” (Property) माना गया है।

राज्य सरकार के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए बीएनएसएस की धारा 106 (सीआरपीसी की धारा 102) का हवाला दिया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले तीस्ता अतुल सीतलवाड़ बनाम गुजरात राज्य (2018) का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि यदि जांच अधिकारी ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया है, तो खाते को फ्रीज करना कानूनी रूप से उचित है।

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कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

हाईकोर्ट ने पाया कि इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है कि एक संदिग्ध लेनदेन के संबंध में जांच एजेंसियों के निर्देश पर खाता फ्रीज किया गया है। कोर्ट के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या बैंक द्वारा खाता फ्रीज करना उचित था और क्या पुलिस को इसके लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति की आवश्यकता थी।

सुप्रीम कोर्ट के तीस्ता अतुल सीतलवाड़ मामले का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि यदि जांच अधिकारी के पास अपराध के संदेह की ओर इशारा करने वाली सामग्री है, तो वह प्रक्रिया का पालन करते हुए बैंक खातों को वैध रूप से जब्त कर सकता है।

कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए, कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 102 (अब बीएनएसएस की धारा 106) को उद्धृत किया और टिप्पणी की:

“उपरोक्त प्रावधान को पढ़ने से यह स्पष्ट है कि एक पुलिस अधिकारी जांच के दौरान आरोपी व्यक्तियों की संपत्ति को आदेश पारित करके जब्त करने का हकदार है और उसका एकमात्र कर्तव्य संबंधित मजिस्ट्रेट को इस तरह की जब्ती की रिपोर्ट करना है। संपत्ति की जब्ती के लिए मजिस्ट्रेट से पूर्व आदेश लेने का कोई दायित्व पुलिस पर नहीं है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि यदि जांच के दौरान पुलिस इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि संदिग्ध लेनदेन के कारण बैंक खाता फ्रीज किया जाना है, तो वह बैंक को ऐसा करने का निर्देश दे सकती है।

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निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि बैंक ने साइबर क्राइम विभाग के अनुरोध पर खाता फ्रीज करके कानून के अनुसार कार्य किया है।

संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से इनकार करते हुए, कोर्ट ने कहा:

“यदि याचिकाकर्ता फ्रीजिंग से व्यथित है और अपना खाता डिफ्रीज करवाना चाहती है, तो वह कानून के अनुसार उचित राहत के लिए जांच अधिकारियों या सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए स्वतंत्र है…”

तदनुसार, याचिका को निस्तारित कर दिया गया और याचिकाकर्ता को कानून में उपलब्ध उपायों का लाभ उठाने की स्वतंत्रता दी गई।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: मारूफा बेगम बनाम भारत संघ और 5 अन्य
  • केस संख्या: WRIT-C No. 37053 of 2025
  • कोरम: न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी
  • याचिकाकर्ता के वकील: विकास रस्तोगी, अनूप कुमार शर्मा
  • प्रतिवादी के वकील: ए.एस.जी.आई., अनादि कृष्ण नारायण, सी.एस.सी., शैलेश कुमार पांडे

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