इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में इंटीग्रल यूनिवर्सिटी, लखनऊ के गणित प्रवक्ता ग़नी मोहम्मद ख़ान की बर्खास्तगी को “विकृत” बताते हुए रद्द कर दिया है और इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन करार दिया है।
यह फैसला न्यायमूर्ति अताउ रहमान मसूदी और न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की खंडपीठ ने रिट-ए संख्या 2000716/2009, ग़नी मोहम्मद ख़ान बनाम इंटीग्रल यूनिवर्सिटी, लखनऊ व अन्य में सुनाया। यह फैसला 29 नवंबर 2024 को सुरक्षित किया गया था और 1 अप्रैल 2025 को सुनाया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
ग़नी मोहम्मद ख़ान की नियुक्ति 28 अगस्त 2004 को गणित प्रवक्ता के पद पर हुई थी और उन्होंने 1 सितंबर 2004 को कार्यभार ग्रहण किया था। कुछ महीनों बाद, उन्हें अनौपचारिक रूप से सूचित किया गया कि उनकी सेवा समाप्त कर दी गई है। इसका कारण यह बताया गया कि उन्होंने तत्कालीन कुलपति प्रो. एस.डब्ल्यू. अख़्तर की पुत्री निदा फ़ातिमा को आंतरिक मूल्यांकन में कम अंक दिए थे। ग़नी ख़ान ने आरोप लगाया कि इसके प्रतिशोध स्वरूप उनके विरुद्ध कार्रवाई की गई।

हालांकि 29 नवंबर 2004 को उनकी सेवाएं समाप्त की गईं, लेकिन उन्हें इसके बाद भी वेतन मिलता रहा और आधिकारिक रूप से सेवा समाप्ति की मंज़ूरी 4 जनवरी 2005 को दी गई। पहले एक रिट याचिका के बाद यूनिवर्सिटी ने सेवा समाप्ति आदेश वापस ले लिया और ग़नी मोहम्मद ख़ान को बहाल कर दिया गया।
बाद में एक बार फिर अनुशासनात्मक कार्यवाही प्रारंभ की गई और 27 अगस्त 2007 को दोबारा उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। कुलाधिपति ने 13 अक्टूबर 2008 को उनकी अपील खारिज कर दी, जिसके बाद वर्तमान रिट याचिका दायर की गई।
प्रमुख कानूनी मुद्दे
1. निजी विश्वविद्यालय के विरुद्ध रिट याचिका की स्वीकार्यता:
यूनिवर्सिटी ने यह तर्क दिया कि वह एक निजी संस्था है, इसलिए रिट याचिका स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए कहा:
“सेवा समाप्ति और अपील संबंधी आदेश इंटीग्रल यूनिवर्सिटी अधिनियम, 2004 के तहत वैधानिक अधिकारियों द्वारा पारित किए गए हैं… अतः यह रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आता है।”
कोर्ट ने खुर्रम अशरफ़ और St. Mary’s Education Society (2023) 4 SCC 498 के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि वैधानिक शक्तियों से जुड़े निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं।
2. सेवा समाप्ति की प्रकृति – क्या यह सामान्य समाप्ति थी या दंडात्मक:
कोर्ट ने माना कि यद्यपि आदेश में इसे प्रोबेशन के दौरान सेवा समाप्ति बताया गया है, लेकिन वास्तव में यह अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में बर्खास्तगी थी।
“यह प्रोबेशन की सामान्य समाप्ति नहीं है… बल्कि एक दंडात्मक कार्रवाई है, जो जांच के बाद की गई।”
कोर्ट ने शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य [(1974) 2 SCC 831] का हवाला देते हुए कहा कि यदि प्रोबेशनर को कदाचार के आरोप में हटाया जाता है तो संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत उसे वैधानिक सुरक्षा प्राप्त होती है।
प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन
कोर्ट ने जांच प्रक्रिया को गंभीर खामियों से युक्त पाया:
- जांच अधिकारी एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर थे, जिनकी आयु 74 वर्ष से अधिक थी, जबकि विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार वे अयोग्य थे।
- याचिकाकर्ता को पूर्ण दस्तावेज नहीं दिए गए।
- उन्हें गवाहों से जिरह करने की अनुमति नहीं दी गई।
- पर्याप्त समय भी नहीं दिया गया।
- अंतिम जांच में आरोपों के समर्थन में कोई गवाह पेश नहीं किया गया।
कोर्ट ने कहा:
“केवल इस आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि वह अपनी बेगुनाही सिद्ध नहीं कर पाया। दोष साबित करने का दायित्व पहले नियोक्ता का होता है, जिसे जांच के दौरान साक्ष्यों द्वारा सिद्ध करना आवश्यक है।”
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सरोज कुमार सिन्हा [(2010) 2 SCC 772] पर भरोसा करते हुए कहा कि जांच अधिकारी ने निष्पक्ष निर्णायक की भूमिका निभाने में असफलता पाई।
कोर्ट का निष्कर्ष और आदेश
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा:
- 27 अगस्त 2007 का बर्खास्तगी आदेश और 13 अक्टूबर 2008 का अपील खारिज करने का आदेश रद्द किए जाते हैं।
- अनुशासनात्मक जांच प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी, जो असिद्ध आरोपों और वैधानिक आवश्यकताओं की अनदेखी पर आधारित थी।
- यह सेवा समाप्ति नहीं, बल्कि दंडात्मक बर्खास्तगी थी।
अंतिम टिप्पणी में कोर्ट ने कहा:
“यह कहना कि याचिकाकर्ता दोषी है क्योंकि वह अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर पाया, जबकि आरोपों के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं लाया गया—यह सोच ही विकृत है।”
निर्देश:
बर्खास्तगी आदेश को रद्द करने के परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता की सेवा पुनः बहाल की जाती है और वह सभी परिणामी लाभों, जिसमें पूर्ण पिछला वेतन शामिल है, का हकदार होगा। केस की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए, कोर्ट ने विश्वविद्यालय को आदेश दिया कि वह याचिकाकर्ता को ₹50,000/- याचिका की लागत के रूप में अदा करे।
वकील और पक्षकार
याचिकाकर्ता ग़नी मोहम्मद ख़ान की ओर से डॉ. एल.पी. मिश्रा और श्री शरद पाठक ने पक्ष रखा, जबकि इंटीग्रल यूनिवर्सिटी और उसके अधिकारियों (कुलपति व कुलाधिपति सहित) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय भसीन, श्री तनवीर अहमद सिद्दीकी, और श्री शुभम त्रिपाठी सहित अन्य अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा।