इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पक्ष किसी संपत्ति पर वास्तविक रूप से काबिज है, तो उसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 164 और 165 के तहत की जाने वाली कार्यवाही के माध्यम से बेदखल नहीं किया जा सकता। जस्टिस बृज राज सिंह ने कहा कि यद्यपि शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है, लेकिन कुर्की (attachment) की संक्षिप्त कार्यवाही उन मामलों में कानूनी बेदखल प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकती जहाँ कब्जा पहले से ही स्वीकार्य या स्पष्ट हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला ‘इन्दु टंडन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य’ के रूप में सामने आया, जो BNSS की धारा 482 के तहत दायर किया गया था। याचिकाकर्ता इन्दु टंडन, जो एक बुजुर्ग विधवा हैं, ने गोंडा के एडिशनल सेशंस जज (पुनरीक्षण अदालत) द्वारा 1 नवंबर 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। पुनरीक्षण अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट, गोंडा के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसके तहत मोहल्ला गोलागंज स्थित एक दुकान को BNSS की धारा 164 के तहत कुर्क करने का निर्देश दिया गया था।
याचिकाकर्ता का दावा था कि वह अपने दिवंगत पति नारायण किशोर टंडन के माध्यम से इस संपत्ति की स्वामिनी हैं, जिनके पास यह संपत्ति 1946 से थी। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी पक्ष (दिलीप सोनी और अन्य) उनकी बीमारी और बुढ़ापे का फायदा उठाकर दुकान के एक कमरे पर अवैध कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, विपक्षी पक्ष का कहना था कि वे दिवंगत टंडन के समय से ही वहां किराएदार के रूप में ज्वैलरी की दुकान चला रहे हैं।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि सिटी मजिस्ट्रेट का कुर्की का आदेश उचित था क्योंकि पुलिस रिपोर्ट में “कब्जे को लेकर विवाद” और “तनाव” की बात कही गई थी, जिससे किसी अप्रिय घटना की आशंका थी। उन्होंने पवन सिंघानिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केवल सिविल सूट लंबित होने के आधार पर धारा 164 BNSS (जो पुरानी धारा 145 CrPC के समान है) की कार्यवाही नहीं रोकी जानी चाहिए, क्योंकि मजिस्ट्रेट का प्राथमिक कार्य शांति बनाए रखना है।
विपक्षी पक्ष की ओर से अधिवक्ता साइमा खान ने दलील दी कि उनके मुवक्किल बिजली के बिल और पुलिस रिपोर्ट के अनुसार दुकान पर काबिज किराएदार हैं। उन्होंने तर्क दिया कि एक बार जब कब्जा स्वीकार कर लिया जाता है, तो मकान मालिक को बेदखली के लिए सिविल सूट दायर करना चाहिए, न कि धारा 164/165 BNSS का सहारा लेना चाहिए। उन्होंने महाबीरजी मंदिर कमेटी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1992) और वीरेंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2002) के निर्णयों का उल्लेख किया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
अभिलेखों और 3 अगस्त 2024 की पुलिस रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद, हाईकोर्ट ने पाया कि विपक्षी पक्ष वास्तव में दुकान पर किराएदारी का दावा कर रहे थे और वे वहां काबिज थे। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“राज्य प्राधिकारी पक्षों की रक्षा करने के लिए बाध्य हैं, लेकिन यदि वास्तविक कब्जा विपक्षी संख्या 2 और 3 के पास है, तो उन्हें धारा 164/165 BNSS की कार्यवाही द्वारा तब तक बेदखल नहीं किया जा सकता जब तक कि कानून के अनुसार न्यायालय का कोई आदेश न हो।”
कोर्ट ने महाबीरजी मंदिर कमेटी मामले के सिद्धांतों पर बल दिया, जिसमें कहा गया था कि ऐसी कार्यवाही शुरू करने के लिए यह आवश्यक है कि “दोनों पक्ष वास्तविक कब्जे के सवाल पर असहमत हों।” यदि एक पक्ष दूसरे के कब्जे को स्वीकार करता है, तो मजिस्ट्रेट के लिए उचित मार्ग कुर्की के बजाय BNSS की निवारक धाराओं (जैसे 107 या 116) के तहत कार्रवाई करना है।
निर्णय
हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण अदालत के आदेश में कोई अवैधता नहीं पाई। जस्टिस बृज राज सिंह ने निष्कर्ष निकाला कि पुनरीक्षण अदालत ने “सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश को सही ढंग से रद्द किया है।” इसके साथ ही याचिका को खारिज कर दिया गया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि काबिज पक्ष को BNSS की संक्षिप्त कुर्की प्रक्रिया के माध्यम से हटाया नहीं जा सकता।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ये टिप्पणियां केवल इस आवेदन के निपटारे के उद्देश्य से की गई हैं और भविष्य में किसी अन्य प्राधिकारी की कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेंगी।
केस विवरण
- केस का नाम: इन्दु टंडन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रमुख सचिव गृह, लखनऊ व अन्य के माध्यम से
- केस संख्या: APPLICATION U/S 482 No. 10324 of 2025
- बेंच: जस्टिस बृज राज सिंह
- दिनांक: 2 अप्रैल, 2026

