प्रोबेशन पर IAS बने अधिकारियों को राज्य सेवा में अपने जूनियर्स के समान वेतन लाभ पाने का अधिकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि राज्य सिविल सेवा के जो अधिकारी प्रोबेशन पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में शामिल होते हैं, वे अपने ‘लियन’ (ग्रहणाधिकार) की अवधि के दौरान उन सभी वेतन लाभों के हकदार हैं जो राज्य सेवा में उनके जूनियर्स को दिए गए हैं।

मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के आदेश को खारिज करते हुए केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि याचिकाओं को 20 जून 2013 से 67,000-79,000 रुपये के वेतनमान के आधार पर एरियर का भुगतान किया जाए। कोर्ट ने इस राशि पर 6 प्रतिशत ब्याज देने का भी आदेश दिया है।

अदालत के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या ऑल इंडिया सर्विसेज (AIS) में प्रोबेशन पर नियुक्त कोई अधिकारी, जो राज्य सेवा में अपना लियन रखता है, अपने जूनियर्स को मिले वेतन उच्चीकरण (upgradation) का दावा कर सकता है। प्रतिवादियों का तर्क था कि चूंकि याचिकाकर्ता IAS में ‘कन्फर्म’ (स्थायी) नहीं हुए थे और वे AIS नियमों से शासित थे, इसलिए वे इन लाभों के पात्र नहीं हैं।

हाईकोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि भारत सरकार के निर्णयों और प्रासंगिक कार्यालय ज्ञापनों (Office Memoranda) के तहत, एक प्रोबेशनर राज्य सेवा में अपना लियन बरकरार रखता है और AIS में कन्फर्म होने से पहले राज्य सेवा में मिलने वाले सभी लाभों (जैसे सेलेक्शन ग्रेड में कन्फर्मेशन) का हकदार होता है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले के मुख्य याचिकाकर्ता, बादल चटर्जी, उत्तर प्रदेश के 1979 बैच के प्रांतीय सिविल सेवा (PCS) अधिकारी थे। 28 नवंबर 2012 को उन्हें प्रोबेशन पर IAS में शामिल किया गया। जब वे IAS में अपनी प्रोबेशन अवधि पूरी कर रहे थे, तब राज्य सेवा में बने रहे 1979 बैच के उनके जूनियर्स को 20 जून 2013 को 67,000-79,000 रुपये का वेतनमान दिया गया।

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याचिकाकर्ता ने इस आधार पर समानता की मांग की कि उनका PCS पद पर लियन बरकरार था। वे 28 फरवरी 2015 को खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन आयुक्त के रूप में सेवानिवृत्त हुए। कई अभ्यावेदनों के बावजूद उन्हें यह लाभ नहीं दिया गया। इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), इलाहाबाद बेंच का दरवाजा खटखटाया।

CAT ने 23 दिसंबर 2024 को उनके आवेदन (O.A.) को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि याचिकाकर्ता के पास प्रमोशन का लाभ लेने के लिए PCS में वापस जाने का ‘विकल्प’ था और अब वे AIS नियमों के अधीन हैं।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता का पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश पांडे, अधिवक्ता आशीष पाठक, बादल चटर्जी और चंदन शर्मा ने तर्क दिया:

  • 1955 विनियम का क्लॉज 4: AIS में प्रोबेशन पर नियुक्त अधिकारी राज्य सेवा में अपना लियन रखता है और उस सेवा में मिलने वाले सभी लाभों का हकदार होता है।
  • राजेश कुमार श्रीवास्तव मामले से समानता: इसी तरह के तथ्यों वाले मामले में एक IPS अधिकारी, राजेश कुमार श्रीवास्तव को ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट द्वारा समान लाभ दिए गए थे।
  • 1994 का कार्यालय ज्ञापन: यह स्पष्ट करता है कि PCS से IAS में पदोन्नत अधिकारियों की परिलब्धियां किसी भी स्थिति में PCS में बने रहने वाले उनके कनिष्ठ अधिकारियों से कम नहीं होंगी।
  • भेदभाव: ट्रिब्यूनल द्वारा IAS और IPS संवर्ग के बीच किया गया अंतर कृत्रिम और अनुचित है।
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प्रतिवादियों का पक्ष: भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल और अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने तर्क दिया:

  • IAS ज्वाइन करते समय याचिकाकर्ता ने PCS वेतनमान त्याग दिया था।
  • याचिकाकर्ता IAS में कभी कन्फर्म नहीं हुए और प्रोबेशनर के रूप में ही सेवानिवृत्त हुए, इसलिए उन्हें लाभ नहीं मिल सकता।
  • इंडक्शन ‘लेखा परीक्षा’ के अधीन था, जिसे याचिकाकर्ता ने पास नहीं किया।

कोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने ‘इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (अपॉइंटमेंट बाय प्रमोशन) रेगुलेशंस, 1955’ में निहित भारत सरकार के निर्णय के क्लॉज 4 का गहराई से विश्लेषण किया। कोर्ट ने कहा:

“यह प्रावधान स्पष्ट रूप से प्रोबेशन की अवधि के लिए है और इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि राज्य सिविल सेवा से IAS कैडर में आए किसी व्यक्ति को राज्य सिविल सेवा के लाभ केवल कन्फर्मेशन पर ही मिलेंगे। वास्तव में, क्लॉज 4 में प्रयुक्त शब्द ‘कन्फर्मेशन से पहले’ को ‘कन्फर्मेशन पर’ के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।”

राजेश कुमार श्रीवास्तव मामले पर: कोर्ट ने पाया कि IPS (29.06.1965 का ज्ञापन) और IAS (31.10.1966 का ज्ञापन) के लिए नियम बिल्कुल समान हैं। इसलिए, केवल अलग कैडर (IAS बनाम IPS) होने के आधार पर याचिकाकर्ता के साथ भेदभाव करना उचित नहीं है।

लेखा परीक्षा पर: प्रतिवादियों के इस तर्क पर कि याचिकाकर्ता ने विभागीय परीक्षा पास नहीं की, कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई दस्तावेज नहीं लाया गया जिससे यह साबित हो कि विभाग ने कभी परीक्षा आयोजित की हो और याचिकाकर्ता उसमें शामिल न हुआ हो। विभाग द्वारा परीक्षा आयोजित न करना लाभ से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता।

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अधिकारियों के रवैये पर टिप्पणी: पीठ ने अधिकारियों के आचरण की कड़ी आलोचना की:

“हम प्रतिवादियों के उस आचरण की गंभीरता से निंदा करते हैं जिसके तहत याचिकाकर्ता को स्पष्ट रूप से स्वीकार्य लाभों से वंचित किया गया… बिना किसी ठोस कारण के अपने ही विभाग के एक IAS अधिकारी को उनके जूनियर्स से हीन मानना, प्रतिवादियों की ओर से स्पष्ट रूप से ‘लाल फीताशाही’ (red tapism) को दर्शाता है।”

निष्कर्ष और निर्देश

हाईकोर्ट ने दोनों रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए CAT के 23 दिसंबर 2024 के आदेश को रद्द कर दिया।

निर्देश:

  1. प्रतिवादी याचिकाकर्ताओं को 20 जून 2013 से 67,000-79,000 रुपये के वेतनमान के आधार पर वेतन बकाया (Arrears) का भुगतान करें।
  2. सेवानिवृत्ति के बाद के लाभों (Post-retiral benefits) को भी उक्त वेतनमान के आधार पर संशोधित किया जाए।
  3. याचिकाकर्ताओं को बकाया राशि पर 20 जून 2013 से और सेवानिवृत्ति लाभों पर उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि से 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज मिलेगा।
  4. सभी लाभों का भुगतान दो महीने के भीतर किया जाना चाहिए।

केस विवरण

केस टाइटल: बादल चटर्जी बनाम भारत संघ और 2 अन्य (शंकर सिंह बनाम भारत संघ और 2 अन्य के साथ संबद्ध)

केस संख्या: WRIT – A No. 5267 of 2025

कोरम: मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र

याचिकाकर्ता के वकील: राकेश पांडे (वरिष्ठ अधिवक्ता), आशीष पाठक, बादल चटर्जी, चंदन शर्मा

प्रतिवादियों के वकील: ए.एस.जी.आई., मनीष गोयल (ए.ए.जी.), आकांक्षा शर्मा (एस.सी.), विवेक कुमार सिंह 

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