इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि एक शारीरिक रूप से सक्षम पति, जो कुशल श्रमिक (Skilled Labourer) के रूप में कार्य करता है, उसकी प्रतिदिन की आय कम से कम 800 रुपये मानी जाएगी। इस आधार पर उसकी मासिक आय 24,000 रुपये आँकी गई। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए कहा कि पति की शुद्ध आय का 25% हिस्सा भरण-पोषण के रूप में दिया जाना चाहिए और इसी आधार पर पत्नी और नाबालिग बेटी के गुजारा भत्ते में वृद्धि कर दी।
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने पत्नी और उसकी बेटी द्वारा दायर आपराधिक निगरानी याचिका (Criminal Revision) को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। उन्होंने परिवार न्यायालय, मथुरा के उस आदेश को संशोधित कर दिया, जिसमें कुल 5,000 रुपये मासिक भरण-पोषण तय किया गया था। हाईकोर्ट ने इसे “बहुत कम” (Meagre) मानते हुए बढ़ाकर 6,000 रुपये कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याची (पत्नी और नाबालिग बेटी) ने प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, मथुरा के 22 मई, 2024 के एकतरफा फैसले और आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। यह मामला धारा 125 सीआरपीसी के तहत दर्ज किया गया था (वाद संख्या 345/2022)।
निचली अदालत ने पति को निर्देश दिया था कि वह पत्नी को 4,000 रुपये और बेटी को 1,000 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे। याचियों का तर्क था कि वर्तमान महंगाई और जीवन यापन की लागत को देखते हुए यह राशि अपर्याप्त है।
पक्षों की दलीलें
याचियों के वकील ने कोर्ट को बताया कि विपक्षी (पति) ‘रईस ऑटो सर्विस सेंटर एंड स्पेयर पार्ट्स’ नाम से एक ऑटो वर्कशॉप और स्पेयर पार्ट्स की दुकान चलाता है। यह दावा किया गया कि उसकी मासिक आय 50,000 रुपये से अधिक है। अपने दावे के समर्थन में वर्कशॉप की तस्वीरें भी कोर्ट में पेश की गईं।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए विद्वान एजीए (A.G.A.) ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि हालांकि पति एक कुशल मजदूर है और ऑटो वर्कशॉप चलाता है, लेकिन उसकी आय स्थाई नहीं है। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने 5,000 रुपये मासिक तय करके कोई गलती नहीं की है, इसलिए हाईकोर्ट को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष पति की सटीक आय साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया था। वर्कशॉप की तस्वीरों से भी सटीक मासिक आय का पता नहीं चल पा रहा था।
हालाँकि, कोर्ट ने इस बात को स्वीकार किया कि पति एक “कुशल श्रमिक है और एक ऑटो वर्कशॉप भी चलाता है” और वह शारीरिक रूप से पूरी तरह सक्षम है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले रजनेश बनाम नेहा (2021) 2 SCC 324 का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि पत्नी को वित्तीय सहायता प्रदान करना पति का “पवित्र कर्तव्य” है। एक शारीरिक रूप से सक्षम पति इस दायित्व से बच नहीं सकता है और उसे शारीरिक श्रम करके भी पैसा कमाना होगा।
पति की आय का आकलन करते हुए कोर्ट ने कहा:
“ऐसी परिस्थिति में, वर्तमान समय में, न्यायालय की राय में, यदि निगरानीकर्ता (पति), जो एक शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्ति है, को वर्तमान में एक कुशल श्रमिक (Skilled Labourer) माना जाता है, तो वह 800 रुपये प्रतिदिन कमाएगा और उसकी मासिक आय 24,000 रुपये होगी।”
इसके अलावा, कोर्ट ने रजनेश बनाम नेहा और कुलभूषण कुमार (डॉ) बनाम राज कुमारी (1970) 3 SCC 129 के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों पर भरोसा जताया, जिसमें यह निर्धारित किया गया है कि भरण-पोषण भत्ता पति की शुद्ध आय के 25% तक दिया जा सकता है।
आकलित आय के आधार पर गणना करते हुए कोर्ट ने कहा:
“24,000 रुपये का 25% हिस्सा 6,000 रुपये होगा। ऐसी स्थिति में, ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित 5,000 रुपये की कुल भरण-पोषण राशि बहुत कम है और इसे बढ़ाया जाना उचित है।”
फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक निगरानी याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए परिवार न्यायालय के आदेश में संशोधन किया:
- पत्नी: 4,000 रुपये प्रतिमाह (यथावत रखा गया)।
- बेटी: 1,000 रुपये से बढ़ाकर 2,000 रुपये प्रतिमाह किया गया।
- कुल राशि: 6,000 रुपये प्रतिमाह (याचिका दायर करने की तिथि से)।
कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह एरियर (बकाया राशि) का भुगतान 10 समान मासिक किस्तों में करे, जिसकी शुरुआत 5 फरवरी, 2026 से होगी। कोर्ट ने याचियों को यह भी छूट दी कि यदि भविष्य में पति की आर्थिक स्थिति बदलती है, तो वे धारा 127 सीआरपीसी के तहत भत्ता बढ़ाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
केस का विवरण:
- केस टाइटल: श्रीमती सपना और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल रिविजन नंबर 7216 ऑफ 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह
- याची के वकील: मोहम्मद अदनान खान, मोहम्मद इमरान, सैयद सफदर अली काज़मी
- विपक्षी के वकील: आलोक कुमार श्रीवास्तव (जी.ए.), योगेश कुमार

