यदि चश्मदीद गवाह भरोसेमंद हैं तो दोषपूर्ण जांच बरी करने का आधार नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1985 में हुई एक निर्मम हत्या के मामले में दोषी की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति चवन प्रकाश की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि गवाहों के बयानों में मामूली विरोधाभास और पुलिस विवेचना (Investigation) में त्रुटियां बरी होने का आधार नहीं बन सकतीं, बशर्ते चश्मदीद गवाहों की गवाही सुसंगत और विश्वसनीय हो।

हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता सांवरे की सजा को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 149 के तहत बरकरार रखा। कोर्ट ने ‘विधि विरुद्ध जमावड़ा’ (Unlawful Assembly) के सदस्यों के लिए ‘प्रतिनिधि दायित्व’ (Vicarious Liability) के सिद्धांत की पुष्टि की।

मामले की पृष्ठभूमि

यह घटना 7 अप्रैल 1985 की है, जो जिला बस्ती के गजौली गांव में घटित हुई थी। शिकायतकर्ता श्रीमती मुर्ता ने एफआईआर दर्ज कराई थी कि उनके पति, बिदेशी कुर्मी की उस समय हत्या कर दी गई जब वे रात में अपने खलिहान में सो रहे थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मकान के बंटवारे और छत की मरम्मत को लेकर मृतक और आरोपियों—अच्छैबर, उसके बेटे फूलमैन व सांवरे, और राम दास व राजेंद्र—के बीच पुराना विवाद चल रहा था।

आरोप है कि रात करीब 3:00 बजे आरोपी मौके पर पहुंचे। राजेंद्र के पास चाकू था, जबकि अपीलकर्ता सांवरे और अन्य आरोपियों के पास लाठियां थीं। उन्होंने बिदेशी पर हमला किया, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर नौ चोटें पाई गईं, जिनमें फ्रैक्चर और गहरे घाव शामिल थे।

सत्र न्यायाधीश, बस्ती ने 27 मई 1987 को पांचों आरोपियों को हत्या और बलवा करने का दोषी ठहराया था। इसके खिलाफ आरोपियों ने अपील दायर की थी। अपील के लंबित रहने के दौरान आरोपी अच्छैबर, राजेंद्र, राम दास और फूलमैन की मृत्यु हो गई, जिससे उनकी अपील समाप्त (Abate) हो गई। हाईकोर्ट ने केवल जीवित बचे अपीलकर्ता सांवरे की अपील पर सुनवाई की।

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बचाव पक्ष की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील श्री जयप्रकाश नारायण राज ने सजा को चुनौती देते हुए कई तर्क रखे:

  • बयानों में विरोधाभास: यह तर्क दिया गया कि चश्मदीद गवाहों के बयानों में आरोपियों की विशिष्ट भूमिकाओं को लेकर महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं।
  • रोशनी का अभाव: बचाव पक्ष ने कहा कि गवाहों ने टॉर्च होने का दावा किया था, लेकिन जांच अधिकारी (IO) ने टॉर्च का कोई रिकवरी मेमो तैयार नहीं किया। यह भी कहा गया कि घटना के समय हमलावरों को पहचानने के लिए पर्याप्त रोशनी नहीं थी।
  • दूषित विवेचना: बचाव पक्ष ने कहा कि जांच अधिकारी ने आरोपी राजेंद्र के कपड़ों पर खून होने का दावा किया था, लेकिन फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट में खून नहीं मिला, जो यह दर्शाता है कि विवेचना निष्पक्ष नहीं थी।
  • अपीलकर्ता की भूमिका: यह तर्क दिया गया कि सांवरे के पास केवल लाठी थी, जबकि घातक चोटें सह-आरोपी राजेंद्र द्वारा चाकू से पहुंचाई गई थीं।

राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता श्री एस.एन. तिवारी ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि विरोधाभास बहुत मामूली हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यह चांदनी रात थी और पक्षकार एक-दूसरे को जानते थे, इसलिए पहचान में कोई समस्या नहीं थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

खंडपीठ ने सबूतों और कानूनी नजीरों का बारीकी से विश्लेषण किया।

1. गवाहों के बयानों में विसंगति पर: कथित विरोधाभासों पर कोर्ट ने कहा कि मृतक की पत्नी और पड़ोसी स्वाभाविक गवाह (Natural Witnesses) हैं। सुप्रीम कोर्ट के राजस्थान राज्य बनाम कल्की (1981) के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

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“गवाहों के बयानों में कुछ सामान्य विसंगतियां हमेशा होती हैं, भले ही वे कितने भी ईमानदार और सच्चे क्यों न हों। ये विसंगतियां समय बीतने के कारण याददाश्त में कमी या अवलोकन की सामान्य त्रुटियों के कारण होती हैं… महत्वपूर्ण विसंगतियां वे हैं जो सामान्य नहीं होतीं और अभियोजन के मामले की जड़ पर प्रहार करती हैं।”

कोर्ट ने पाया कि गवाहों के बयान मुख्य बिंदुओं पर सुसंगत हैं।

2. त्रुटिपूर्ण विवेचना पर: जांच अधिकारी द्वारा टॉर्च जब्त न करने और फोरेंसिक रिपोर्ट के विरोधाभास पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल विवेचना में खामी के आधार पर आरोपी को बरी नहीं किया जा सकता। सी. मुनिअप्पन बनाम तमिलनाडु राज्य (2010) और एडाकांडी दिनेशन उर्फ ​​पी. दिनेशन बनाम केरल राज्य (2025) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:

“यह न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में है कि वे अभियोजन द्वारा जुटाए गए अन्य सबूतों, जैसे चश्मदीद गवाहों के बयान और मेडिकल रिपोर्ट पर विचार करें। इस कोर्ट का यह लगातार रुख रहा है कि आरोपी केवल अभियोजन एजेंसी द्वारा की गई दोषपूर्ण जांच के आधार पर बरी होने का दावा नहीं कर सकता।”

3. धारा 149 IPC (प्रतिनिधि दायित्व): कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि अपीलकर्ता को बरी कर दिया जाना चाहिए क्योंकि उसके पास लाठी थी और सह-आरोपी के पास चाकू। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि सांवरे उस ‘विधि विरुद्ध जमावड़ा’ का सदस्य था जिसका सामान्य उद्देश्य (Common Object) मृतक को खत्म करना था। कृष्णप्पा बनाम कर्नाटक राज्य (2012) का हवाला देते हुए बेंच ने कहा:

“कोर्ट द्वारा जांचा जाने वाला प्रासंगिक प्रश्न यह है कि क्या आरोपी विधि विरुद्ध जमावड़ा का सदस्य था, न कि यह कि उसने अपराध में सक्रिय रूप से भाग लिया या नहीं।”

4. पहचान पर: कोर्ट ने अपर्याप्त रोशनी की दलील को खारिज कर दिया। बेंच ने नोट किया कि घटना चांदनी रात में हुई थी और पक्षकार रिश्तेदार व पड़ोसी थे। अनवर हुसैन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1981) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“भले ही रोशनी अपर्याप्त हो, एक गवाह उस व्यक्ति को पहचान सकता है जिससे वह अच्छी तरह परिचित है या जिसके साथ उसके करीबी संबंध हैं। यह पहचान उसकी आवाज, चाल-ढाल और शारीरिक बनावट आदि से हो सकती है।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने इस घटना को एक “जघन्य हत्या” करार दिया जहां मृतक पर “बेरहमी से हमला” किया गया था। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष ने अपना मामला संदेह से परे साबित कर दिया है।

बेंच ने कहा, “हमने पीडब्लू-2 (श्रीमती मुर्ता), पीडब्लू-3 (शंकर) और पीडब्लू-4 (राम नरेश) के साक्ष्यों की सावधानीपूर्वक जांच की है और हम पाते हैं कि विद्वान ट्रायल कोर्ट ने उनका सही मूल्यांकन किया है।”

तदनुसार, आपराधिक अपील खारिज (Dismissed) कर दी गई। कोर्ट ने अपीलकर्ता सांवरे का जमानत मुचलका रद्द कर दिया और उसे आजीवन कारावास की सजा काटने के लिए चार सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: अच्छैबर और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस नंबर: आपराधिक अपील संख्या 1565/1987
  • कोरम: न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति चवन प्रकाश

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