एड-हॉक प्रधानाचार्य को पूर्ण वेतन तभी मिलेगा जब प्रबंधन ने बोर्ड को रिक्ति की सूचना दी हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि एड-हॉक (Ad-hoc) रूप से पदोन्नत प्रधानाचार्य या प्रधानाध्यापक को उस पद का वेतन तभी प्राप्त होगा, जब उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अधिनियम, 1982 की धारा 18 के तहत निर्धारित अनिवार्य शर्तों का सख्ती से पालन किया गया हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि प्रबंध समिति (Committee of Management) ने क़ानून के अनुसार बोर्ड को रिक्ति (Vacancy) की सूचना नहीं दी है, तो एड-हॉक नियुक्त प्रधानाचार्य उच्च वेतन का दावा नहीं कर सकते।

मामले की पृष्ठभूमि

यह निर्णय न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने समिता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य तथा इससे जुड़ी अन्य याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया। न्यायालय के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या यूपी इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम, 1921 के विनियमों के तहत एड-हॉक रूप से पदोन्नत वरिष्ठतम शिक्षक प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक के वेतन का हकदार होगा, या फिर यह अधिकार 1982 के अधिनियम की धारा 18 की कड़ी शर्तों के अधीन है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि एड-हॉक प्रधानाचार्यों के वेतन भुगतान का मुद्दा धनेश्वर सिंह चौहान (1980), नर्बदेश्वर मिश्र (1982), और सोलोमन मोरार झा (1985) जैसे पिछली खंडपीठों के निर्णयों और डॉ. जय प्रकाश नारायण सिंह (2014) के पूर्ण पीठ (Full Bench) के फैसले द्वारा पहले ही तय किया जा चुका है।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रभाकर अवस्थी ने तर्क दिया कि भले ही 1982 के अधिनियम की धारा 18 की पूर्व शर्तें पूरी न की गई हों, अस्थायी रिक्ति पर की गई पदोन्नति पदभार ग्रहण करने की तिथि से ही प्रिंसिपल के वेतन का अधिकार देती है। उन्होंने कहा कि अधिनियम की धारा 18(2) जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) पर यह जिम्मेदारी डालती है कि वे प्रबंधन की चूक को देखें।

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इसके विपरीत, राज्य की ओर से अपर महाधिवक्ता कार्तिकेय सरन ने तर्क दिया कि जिन पुराने फैसलों का हवाला दिया जा रहा है, वे 1982 के अधिनियम की धारा 18 में वर्ष 2000 में हुए संशोधन (यूपी अधिनियम संख्या 5/2001) से पहले के हैं। उन्होंने यह भी कहा कि डॉ. जय प्रकाश नारायण सिंह का पूर्ण पीठ का फैसला राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम और उच्च शिक्षा सेवा आयोग अधिनियम से संबंधित था, इसलिए यह इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम के मामलों पर लागू नहीं होता।

न्यायालय का विश्लेषण और टिप्पणियां

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने अपने फैसले में कहा कि 1980, 1982 और 1985 के पुराने फैसले मुख्य रूप से उस समय मौजूद शासनादेशों पर आधारित थे और उनमें 1982 के अधिनियम की संशोधित धारा 18 पर विचार नहीं किया गया था।

1921 के अधिनियम के अध्याय II के विनियम 2(1) के प्रावधान, जो “संस्था में उच्चतम ग्रेड (highest grade) में वरिष्ठतम योग्य शिक्षक” की पदोन्नति की अनुमति देते हैं, की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“संस्था में ‘उच्चतम ग्रेड’ (Highest Grade) शब्दों का अर्थ यह नहीं है कि यह प्रधानाचार्य या प्रधानाध्यापक के पद का ग्रेड होगा। कानून में प्रयुक्त होने के नाते, यह एक शिक्षक के पद पर संस्था में उच्चतम ग्रेड होगा।”

हाईकोर्ट ने 1982 के अधिनियम की धारा 18 का विश्लेषण किया, जो एड-हॉक नियुक्तियों के लिए विशिष्ट शर्तें निर्धारित करती है:

  1. प्रबंधन को धारा 10(1) के अनुसार बोर्ड को रिक्ति की सूचना देनी होगी।
  2. पद वास्तव में दो महीने से अधिक समय तक खाली रहना चाहिए।
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न्यायालय ने कहा कि ये शर्तें अनिवार्य हैं। कोर्ट ने कहा:

“यदि धारा 18 की पूर्व शर्तें, कि प्रबंधन ने रिक्ति को अधिसूचित किया था और यह दो महीने तक खाली रही और एड-हॉक पदोन्नति की गई, पूरी होती हैं, तभी ऐसा एड-हॉक पदोन्नत व्यक्ति प्रधानाचार्य के पद के वेतन का हकदार होगा।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि एड-हॉक रिक्ति को पदोन्नति से भरने और उच्च जिम्मेदारी निभाने के आधार पर उच्च वेतन की मांग करना स्वीकार्य नहीं है यदि वह प्रावधानों के विरुद्ध है।

निर्णय और निर्देश

हाईकोर्ट ने याचिकाओं का निस्तारण करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. संबंधित जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) प्रत्येक मामले के तथ्यों की जांच करेंगे। एड-हॉक पदोन्नत शिक्षक केवल तभी प्रधानाचार्य के वेतन के हकदार होंगे यदि प्रबंधन ने बोर्ड को रिक्ति की सूचना दी थी और पद दो महीने तक खाली रहा था।
  2. जिन मामलों में रिक्ति की सूचना नहीं दी गई थी, वहां एड-हॉक प्रधानाचार्य “प्रधानाचार्य या प्रधानाध्यापक के पद पर वेतन के भुगतान के हकदार नहीं होंगे।”
  3. जिन कॉलेजों ने ऐसी रिक्तियों को अधिसूचित नहीं किया है, उन्हें चार सप्ताह के भीतर ऐसा करने का निर्देश दिया गया है।
  4. यदि शर्तों का पालन न करने के बावजूद एड-हॉक नियुक्त व्यक्ति को प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक का वेतन दिया गया था, तो ऐसा भुगतान “इस निर्णय की तिथि से रोक दिया जाएगा।”
  5. हालांकि, न्यायालय ने राहत देते हुए कहा कि “यदि पहले नियुक्त एड-हॉक प्रधानाचार्य या प्रधानाध्यापक को वेतन का भुगतान पहले ही किया जा चुका है… तो उसकी वसूली (recovery) नहीं की जाएगी।”
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कोर्ट ने यह भी नोट किया कि नए उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन नियमावली, 2023 के तहत एड-हॉक प्रधानाचार्यों या प्रधानाध्यापकों के लिए कोई प्रावधान नहीं है, और 1982 का अधिनियम अब निरस्त हो चुका है।

मामले का विवरण:

  • केस का नाम: समिता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य (और संबद्ध मामले)
  • केस नंबर: रिट – ए संख्या 19185 ऑफ 2025
  • न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी

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